आपदा/दुर्घटनाब्लॉगविज्ञान प्रोद्योगिकी

वैज्ञानिकों ने व्याख्या कर चमोली आपदा के पीछे की वजह बताई

आकृति : विभिन्न स्टेशनों के बीच तरंग के बीच सहसंबंध, जो न्यूक्लिएशन चरण (कमजोर क्षेत्र उन्नति और पूर्व पृथकता (अलगाव) ) को दर्शाता है, हिमस्खलन जारी होने से एक दिन पहले शुरू हुआ था और पूरी तरह से सहसंबद्ध था। यह देखा गया है कि सभी प्रभावों को पहले (तपोवन) टीपीएन वेधशाला में दर्ज किया गया, जो उद्गम के पास है। वे तरंग के बीच सहसंबंध (ए-डी) नीले बिंदीदार आयत के लिए दर्शाए गए हैं। (सी) नीला अण्डाकार वृत्त दो निकटवर्ती वेधशालाओं में दर्ज कमजोर/छोटे पृथकता या अलगाव को दर्शाता है। (डी) प्रमुख निस्तार/अलगाव (टी1) से ठीक 1 मिनट पहले महत्वपूर्ण अलगाव या कमजोर क्षेत्र उन्नति (टी0) भूकंपीय तरंगों के पूर्ण सहसंबंध के साथ पास के तीन भूकंपीय स्टेशनों में देखा जा सकता है।

The group of 9 scientists analysed the satellite images of the avalanche zone and found that it shows gradual growth of cracks and the joint near the crown of the weak wedge that has controlled the head scarp for the last 5 years. These cracks further started to open up and led to successive advancement of a weak zone near the crown of the wedge failure. The initiation of ice-rock mass avalanche has been recorded as seismic precursors, which were continuously active for 2.30 Hr, before the main detachment took place. Scientists analyzed and verified the seismic signals with field evidence to evaluate the velocity of dynamic flows and associated impacts. Such high-quality seismic data allowed to reconstruct the complete chronological sequence and evaluate effects since the initiation to the advancement of debris flow. The stydy has been published in the journal Scientific Reports.

 

 

उत्तराखंड राज्य के चमोली जिले में बड़े पैमाने पर घातक हिम-चट्टान हिमस्खलन में 200 से अधिक लोगों की जान गई और बड़ा आर्थिक नुकसान हुआ था। एक साल से थोड़ा अधिक समय बाद अब वैज्ञानिक आपदा के कारणों का पता लगाने में सफल रहे हैं।

वैज्ञानिकों ने अध्ययन में पाया कि आपदा आने से पहले यह क्षेत्र भूकंपीय रूप से सक्रिय था। उन्हें रॉक-आइस-पृथकता या अलगाव के पूर्ववर्ती संकेतों का उल्लेखनीय अनुक्रम भी मिला, जो कि स्व-संयोजन या स्व-संगठन के माध्यम से एक नई संरचना के गठन से पहले गतिशील न्यूक्लिएशन चरण कहलाता है।

हिमालय के ग्लेशियरों (हिमनद) के पीछे हटने और अस्थिर ढलानों के साथ संबंधित का पिघलना क्षेत्र में मॉनसून के दौरान बारिश या भूकंप के कारण भूस्खलन हो सकता है। इसके अलावा हिम, बर्फ और चट्टान के हिमस्खलन से दुनिया भर के पहाड़ी इलाकों में लोगों और बुनियादी ढांचे को खतरा हो सकता है। यही कारण है कि क्षेत्र में भूकंप के साथ-साथ ग्लेशियर की स्थिति की निरंतर निगरानी की आवश्यकता है।

वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी (डब्ल्यूआईएचजी) अपनी स्थापना के बाद से इस तरह की आपदा के पीछे जिम्मेदार प्रक्रिया को समझने में सक्रिय रूप से लगा है और हिमालय के ग्लेशियरों के आसपास भूकंपीय स्टेशनों के घने नेटवर्क के साथ महत्वपूर्ण और अनपेक्षित गतिविधियों का पता लगाने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। इस प्रक्रिया के तहत उन्होंने 7 फरवरी 2021 को हुई आपदा के पीछे के कारणों का पता लगाने की भी कोशिश की है।

9 वैज्ञानिकों के समूह ने हिमस्खलन क्षेत्र की उपग्रह छवियों का विश्लेषण किया और पाया कि यह पिछले 5 वर्षों से खड़ी ढाल के निशान को नियंत्रित करने वाले कमजोर कील (पच्चड़) के शिखर के पास दरारें और जोड़ की क्रमिक वृद्धि को दिखाता है। ये दरारें आगे खुलने लगीं और पच्चड़ की विफलता से शिखर के पास एक कमजोर क्षेत्र की क्रमिक उन्नति हुई। बड़ी संख्या में आइस-रॉक हिमस्खलन की शुरुआत को भूकंपीय पूर्ववर्ती के रूप में दर्ज किया गया, जो मुख्य पृथकता के होने से 2.30 घंटे पहले तक लगातार सक्रिय थे। गतिशील प्रवाह और संबंधित प्रभावों के वेग का मूल्यांकन करने के लिए वैज्ञानिकों ने क्षेत्र में साक्ष्य के साथ भूकंपीय संकेतों का विश्लेषण और सत्यापन किया। इस तरह के उच्च-गुणवत्ता वाले भूकंपीय डेटा ने पूर्ण कालक्रम संबंधी नतीजे को फिर से संगठित करने और मलबे के प्रवाह की प्रगति के लिए शुरुआत के बाद से प्रभावों का मूल्यांकन करने को स्वीकार किया। यह अध्ययन साइंटिफिक रिपोर्ट्स जर्नल में प्रकाशित हुआ है।

आकस्मिक बाढ़ का प्रभाव मानव हानि के अलावा आधुनिक संरचनाओं यानी दो जल विद्युत परियोजनाओं, पुलों और सड़कों को बनाए रखने के लिए बहुत अधिक था। बाढ़ की उच्च प्रवाह तीव्रता ने रैनी गांव की स्थायित्व को बिगाड़ दिया। खासकर मॉनसून के समय में यह क्षेत्र भूस्खलन से ग्रस्त है।

भूकंपीय निगरानी प्रणाली मलबे के प्रवाह, भूस्खलन, हिमस्खलन आदि जैसे बड़े पैमाने पर गतिविधियों का पता लगाने के लिए उपयुक्त हैं। बड़ी विफलता से पहले भूकंपीय नेटवर्क द्वारा ऐसी गतिविधियों को देखने की क्षमता क्षेत्र के लिए एक प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली विकसित करने की गुंजाइश प्रदान कर सकती है। एक एकीकृत पूर्व चेतावनी प्रणाली लोगों को ऐसी किसी भी आने वाली आपदा से बचाव के प्रति सचेत कर सकती है। ईडब्ल्यूएस को सीस्मोमीटर (भूकंप सूचक यंत्र का आंतरिक भाग) से भूकंपीय डेटा, स्वचालित जल स्तर रिकॉर्डर से हाइड्रोलॉजिकल डेटा और हिमालय के ग्लेशियर बेसिन के आसपास नेटवर्क के रूप में स्थापित स्वचालित मौसम स्टेशनों से मौसम संबंधी डेटा पर आधारित होना चाहिए।

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