मानसून और चारधाम यात्रा की दोहरी चुनौती: उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन को लेकर सरकार अलर्ट
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“रिस्पांस टाइम सबसे महत्वपूर्ण, लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं” — मदन कौशिक
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गर्भवती महिलाओं से लेकर ट्रेकर्स और पशुधन तक के लिए विशेष तैयारी के निर्देश
देहरादून, 11 मई। उत्तराखंड में आगामी मानसून सीजन और अपने चरम की ओर बढ़ रही चारधाम यात्रा को देखते हुए राज्य सरकार ने आपदा प्रबंधन तंत्र को पूरी तरह सतर्क मोड में रहने के निर्देश दिए हैं। आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास मंत्री मदन कौशिक ने सोमवार को उत्तराखण्ड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (यूएसडीएमए) में आयोजित उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में स्पष्ट कहा कि प्रदेश के लिए आने वाले महीने अत्यंत संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी प्रकार की शिथिलता न केवल जनजीवन बल्कि चारधाम यात्रा, पर्यटन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और राज्य की आपदा प्रतिक्रिया क्षमता पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है।
बैठक में राज्य के सभी जनपदों, पुलिस प्रशासन, एसडीआरएफ, स्वास्थ्य, पशुपालन, लोक निर्माण, मौसम विभाग, वन विभाग और अन्य रेखीय विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया। बैठक का मुख्य उद्देश्य मानसून अवधि के दौरान संभावित भूस्खलन, बादल फटने, बाढ़, सड़क अवरोध, जलभराव, संक्रामक रोगों और पर्वतीय क्षेत्रों में आपदा जोखिमों से निपटने के लिए व्यापक रणनीति तैयार करना था।
चारधाम यात्रा और मानसून: उत्तराखंड के लिए सबसे कठिन समय
मंत्री मदन कौशिक ने कहा कि उत्तराखंड में मानसून का समय हमेशा से आपदाओं की दृष्टि से सबसे कठिन रहा है। इसी अवधि में राज्य में चारधाम यात्रा भी अपने चरम पर रहती है, जिससे लाखों श्रद्धालु और पर्यटक पहाड़ी मार्गों पर होते हैं। ऐसे में किसी भी प्राकृतिक आपदा की स्थिति में राहत और बचाव कार्य अत्यधिक चुनौतीपूर्ण हो जाते हैं।
उन्होंने कहा कि केदारनाथ, बदरीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री मार्गों सहित अनेक संवेदनशील क्षेत्रों में भूस्खलन और सड़क बाधित होने की घटनाएं हर वर्ष सामने आती हैं। इसलिए सभी विभागों को “24×7 अलर्ट मोड” में रहने के निर्देश दिए गए हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि किसी भी आपदा की सूचना मिलते ही राहत एवं बचाव दल बिना समय गंवाए घटनास्थल के लिए रवाना हों।
उन्होंने कहा, “आपदा प्रबंधन में सबसे महत्वपूर्ण तत्व रिस्पांस टाइम है। यदि शुरुआती घंटे प्रभावी ढंग से संभाल लिए जाएं तो बड़ी जनहानि को रोका जा सकता है।”
नालों और नालियों की सफाई के लिए विशेष अभियान
बैठक में शहरी बाढ़ और जलभराव को गंभीर समस्या बताते हुए मंत्री ने नगर निकायों और संबंधित विभागों को मानसून शुरू होने से पहले कम से कम दो बार नालों और नालियों की सफाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि देहरादून, हरिद्वार, ऋषिकेश, हल्द्वानी और अन्य शहरी क्षेत्रों में हर वर्ष भारी बारिश के दौरान जलभराव की समस्या सामने आती है।
उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि जल निकासी व्यवस्था की नियमित निगरानी की जाए और जहां आवश्यकता हो वहां अतिरिक्त ड्रेनेज लाइनें विकसित की जाएं। मंत्री ने कहा कि थोड़ी सी प्रशासनिक लापरवाही शहरी बाढ़ को जन्म दे सकती है।
राहत एवं बचाव उपकरण पूरी तरह तैयार रखने के निर्देश
बैठक में आपदा से निपटने के लिए आवश्यक उपकरणों की उपलब्धता पर विशेष जोर दिया गया। मंत्री ने निर्देश दिए कि हाई कैपेसिटी पम्प, मोटर बोट, लाइफ जैकेट, रस्सियां, सैटेलाइट फोन, वायरलेस सिस्टम और अन्य रेस्क्यू उपकरण पूरी तरह कार्यशील स्थिति में रखे जाएं।
उन्होंने पुलिस, एसडीआरएफ और एनडीआरएफ को विशेष रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में पूर्व तैनाती करने के निर्देश दिए। साथ ही जिलाधिकारियों से कहा गया कि वे अपने-अपने जिलों में संवेदनशील स्थानों की सूची अपडेट रखें और वहां आवश्यक संसाधन पहले से उपलब्ध कराएं।
उत्तराखंड में पिछले वर्षों के अनुभवों का हवाला देते हुए अधिकारियों ने बताया कि कई बार भारी बारिश के दौरान संचार व्यवस्था ठप होने से राहत कार्य प्रभावित होते हैं। इसी को देखते हुए इस बार वैकल्पिक संचार तंत्र पर भी जोर दिया जा रहा है।
खाद्यान्न, ईंधन और गैस का पर्याप्त भंडारण सुनिश्चित करने के निर्देश
बैठक में सलाहकार समिति, आपदा प्रबंधन विभाग के उपाध्यक्ष विनय कुमार रुहेला ने सभी जिलाधिकारियों को निर्देश दिए कि मानसून अवधि के दौरान आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता प्रभावित न होने पाए।
उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में अक्सर सड़कें बंद होने से खाद्यान्न, दवाइयां, पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की आपूर्ति प्रभावित हो जाती है। इसलिए अग्रिम रूप से पर्याप्त भंडारण सुनिश्चित किया जाए ताकि किसी भी आपदा या मार्ग अवरोध की स्थिति में आम जनता को कठिनाई न हो।
विशेष रूप से चारधाम यात्रा मार्गों और दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में राशन, ईंधन और चिकित्सा सामग्री के भंडारण पर जोर दिया गया।
स्वास्थ्य सेवाओं को 24 घंटे तैयार रखने के निर्देश
मंत्री मदन कौशिक ने स्वास्थ्य विभाग को चारधाम मार्गों और आपदा संभावित क्षेत्रों में विशेष मेडिकल पोस्ट स्थापित करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि इन स्थानों पर पर्याप्त संख्या में चिकित्सक, पैरामेडिकल स्टाफ, एम्बुलेंस और जीवनरक्षक दवाइयां उपलब्ध रहनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि मानसून के दौरान जलजनित रोगों, डायरिया, वायरल संक्रमण और संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए स्वास्थ्य विभाग को पहले से दवाइयों का भंडारण कर सतर्क रहना होगा।
बैठक में यह भी निर्देश दिए गए कि दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी बढ़ाई जाए और आवश्यकता पड़ने पर मोबाइल मेडिकल यूनिट्स की तैनाती की जाए।
गर्भवती महिलाओं का पहले से तैयार होगा डेटा
आपदा प्रबंधन बैठक में एक महत्वपूर्ण निर्णय गर्भवती महिलाओं को लेकर भी लिया गया। मंत्री ने निर्देश दिए कि मानसून अवधि में प्रसव संभावित महिलाओं का पूर्व डेटा संकलित किया जाए और उनके लिए निकटतम स्वास्थ्य केंद्रों का चिन्हीकरण किया जाए।
उन्होंने कहा कि अक्सर भारी बारिश और भूस्खलन के कारण ग्रामीण क्षेत्रों का संपर्क टूट जाता है, जिससे गर्भवती महिलाओं को समय पर अस्पताल पहुंचाने में कठिनाई आती है। ऐसी स्थिति से बचने के लिए पूर्व तैयारी अत्यंत आवश्यक है।
स्वास्थ्य विभाग को निर्देश दिए गए कि जोखिम वाले गांवों की सूची तैयार कर वहां विशेष निगरानी रखी जाए।
पशुधन बचाने के लिए बनेगी विशेष क्यूआरटी
बैठक में ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुधन की भूमिका को ध्यान में रखते हुए पशुपालन विभाग को विशेष निर्देश दिए गए। मंत्री मदन कौशिक ने कहा कि आपदा की स्थिति में पशुओं के उपचार और बचाव के लिए विशेष क्विक रिस्पांस टीम (क्यूआरटी) गठित की जाएं।
उन्होंने कहा कि पहाड़ी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में लोग पशुपालन पर निर्भर हैं और आपदा के दौरान पशुधन की हानि सीधे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है। इसलिए पशुओं के लिए चारा, दवाइयों और उपचार सुविधाओं की भी अग्रिम व्यवस्था की जाए।
ट्रेकर्स की सुरक्षा के लिए बनेगी एसओपी
उत्तराखंड में तेजी से बढ़ रही ट्रेकिंग गतिविधियों को देखते हुए मंत्री ने ट्रेकर्स की सुरक्षा को लेकर भी गंभीर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि राज्य में एक व्यापक ट्रेकिंग पॉलिसी तैयार की जाए और ट्रेकर्स की सुरक्षा हेतु विस्तृत एसओपी (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर) बनाई जाए।
उन्होंने निर्देश दिए कि ट्रेकिंग पर जाने वाले प्रत्येक व्यक्ति का पूरा विवरण संबंधित एजेंसियों और यूएसडीएमए के पास उपलब्ध होना चाहिए। ट्रेकर्स के पास जीपीएस उपकरण, संचार संसाधन और अन्य सुरक्षा उपकरण अनिवार्य रूप से हों।
उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में मौसम अचानक बदलता है और कई बार ट्रेकर्स रास्ता भटक जाते हैं। ऐसी स्थिति में उनकी लोकेशन ट्रैक कर त्वरित सहायता पहुंचाने की व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए।
नदियों के चैनलाइजेशन और ड्रेजिंग पर विशेष जोर
बैठक में नदियों में बढ़ती सिल्ट और उसके कारण बाढ़ के खतरे पर भी चर्चा हुई। मंत्री ने कहा कि मानसून से पहले नदियों का चैनलाइजेशन और ड्रेजिंग हर हाल में किया जाए।
उन्होंने कहा कि नदियों में जमा सिल्ट के कारण जलधाराएं अवरुद्ध हो जाती हैं और भारी बारिश के दौरान बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। उन्होंने वन विभाग और सिंचाई विभाग को समन्वय बनाकर कार्य करने के निर्देश दिए।
मंत्री ने यह भी कहा कि वन क्षेत्रों में ड्रेजिंग कार्य में यदि कोई तकनीकी या प्रशासनिक बाधा आ रही हो तो शासन स्तर पर उसका तत्काल समाधान निकाला जाए।
उत्तराखंड में आपदा का पुराना इतिहास
उत्तराखंड प्राकृतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील राज्य माना जाता है। वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा, 2021 की ऋषिगंगा त्रासदी, चमोली आपदा, लगातार हो रहे भूस्खलन, बादल फटने और सड़क धंसने की घटनाओं ने राज्य की संवेदनशीलता को कई बार उजागर किया है।
विशेषज्ञों के अनुसार हिमालयी क्षेत्र में अनियंत्रित निर्माण, जलवायु परिवर्तन, अत्यधिक वर्षा और नदी तटों पर अतिक्रमण जैसी गतिविधियां आपदा जोखिम को और बढ़ा रही हैं। मानसून के दौरान पहाड़ी जिलों में सड़क बाधित होना, बिजली और संचार सेवाएं ठप होना आम समस्या बन चुकी है।
इसी पृष्ठभूमि में राज्य सरकार इस बार पहले से अधिक सतर्क दिखाई दे रही है। प्रशासन का प्रयास है कि आपदा की स्थिति में त्वरित प्रतिक्रिया, बेहतर समन्वय और आधुनिक तकनीक के माध्यम से नुकसान को कम किया जा सके।
मौसम विभाग ने भी जारी किया अलर्ट
बैठक में मौसम विभाग के निदेशक डॉ. सीएस तोमर ने भी आगामी मानसून को लेकर प्रारंभिक जानकारी साझा की। अधिकारियों के अनुसार इस वर्ष भी कई जिलों में सामान्य से अधिक वर्षा होने की संभावना है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक वर्षा की घटनाएं बढ़ रही हैं, जिससे अचानक बाढ़ और भूस्खलन का खतरा पहले से अधिक गंभीर हो गया है।
सभी विभागों को समन्वय के साथ काम करने के निर्देश
बैठक के अंत में मंत्री मदन कौशिक ने कहा कि आपदा प्रबंधन केवल एक विभाग का कार्य नहीं है, बल्कि यह सभी विभागों की साझा जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक समन्वय, त्वरित निर्णय क्षमता और जमीनी स्तर पर सतर्कता ही आपदा से होने वाले नुकसान को कम कर सकती है।
उन्होंने सभी जिलाधिकारियों और अधिकारियों को निर्देश दिए कि वे नियमित मॉक ड्रिल आयोजित करें, संवेदनशील क्षेत्रों का निरीक्षण करें और जनता को भी आपदा से बचाव के प्रति जागरूक करें।
बैठक में सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विनोद कुमार सुमन, आईजी कुमाऊं ऋद्धिम अग्रवाल, आईजी गढ़वाल राजीव स्वरूप, आईजी फायर सुनील मीणा, यूकाडा के सीईओ आशीष चौहान, डीजी हेल्थ डॉ. शिखा जंगपांगी सहित अनेक वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।
