हिम आलय को हिम का टोटा….

The article highlights the alarming decline of snow cover and glacier stability in the Himalayas, often called Earth’s “Third Pole” and Asia’s water tower. Scientific studies warn that reduced snowfall and faster glacier melting are increasing the number of unstable hanging glaciers and glacial lakes, raising the risk of disasters like the 2013 Kedarnath tragedy and the 2021 Rishiganga flood. Reports by Indian and international institutions reveal that snow retention in the Hindu Kush-Himalayan region has fallen sharply due to climate change and rising temperatures. Rapid infrastructure development in fragile mountain zones is further intensifying environmental risks, threatening long-term water security, ecosystems, and human survival across Asia..Jay S. Rawat

–जयसिंह रावत
अपनी विशाल हिमराशि की बदौलत पृथ्वी का तीसरा ध्रुब, बर्फ के रूप में अपने में महासागर जितनी जलराशि धारण करने वालेए एशिया के जलस्तम्भ और मौसम नियंत्रक पर्वतराज हिमालय के सम्मुख बर्फ की कमी की समस्या बढ़ती जा रही है। इस धरती की जिस पर्वत श्रृंखला का नामकरण ही हिम के घर के रूप में हुआ हो उसमें निरन्तर बर्फ की कमी गंभीर चिन्ता का विषय है। यह चिन्ता भी कोई आम नागरिक नहीं बल्कि जाने माने वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थान प्रकट कर रहे हैं, जिसको हमारे नीति नियंताओं, पर्यावरणविदों और आपदा प्रबंधकों को भी बहुत ही गंभीरता से लेना चाहिये। अध्ययनों के अनुसार हिमालय पर हिमपात में कमी के साथ ही बर्फ के जमाव की दर में कमी आ रही है, जिस कारण हैंगिंग ग्लेशियरों और ग्लेशियल लेक ( हिमनद झीलों) की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है। इस परिवर्तन के कारण केदारनाथ और ऋषिगंगा की जैसी भयंकर आपदाओं के संभावनाएं बढ़ते जाने के साथ ही सतलुज -झेलम से लेकर ब्रह्मपुत्र तक हिमनदों पर निर्भर नदियों में जलप्रवाह में कमी की संभवनाएं भी बढ़ गयी है। इससे ऐशिया के मौसम में भी बदलाव की आशंकाएं बढ़ गयी है।
पर्यावरण की संरक्षक संस्था राष्ट्रीय हरित प्राधिकारण (एनजीटी) की मुख्य पीठ ने हाल ही में प्रकाशित इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ सांइंस, बैंगलूरु, इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टैक्नालॉजी, भुवनेश्वर और डीआडीओ के वैज्ञानिकों की ‘‘नेचुरल हैजार्ड’’ जर्नल में छपी साझा रिपोर्ट का उत्तराखण्ड के अलकनन्दा बेसिन में हैंगिंग ग्लेशियरों (लटकते हिमनदो) की बढ़ती संख्या का स्वतः संज्ञान लेते हुये विभिन्न पक्षों को तलब करते हुये अगली तारीख आगामी 6 अगस्त को तय की है। उक्त शोधपत्र के अनुसार उत्तराखंड के अलकनंदा बेसिन में 219 हैंगिंग ग्लेशियरों की पहचान की गई है। दरअसल हैंगिंग ग्लेशियर ऐसे होते हैं जो पहाड़ों की तीखी ढलानों पर लटके हुए रहते हैं और अपने नीचे के आधार के कमजोर होने पर अचानक टूट सकते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान में वृद्धि और वर्षा के स्वरूप में बदलाव से इन ग्लेशियरों की स्थिरता तेजी से कम हो रही है। यही कारण है कि पर्वतीय ढलानों पर अचानक बर्फ या बर्फ-मिश्रित चट्टानों के गिरने की घटनाएँ बढ़ रही हैं, जिनसे विनाशकारी हिमस्खलन और बाढ़ जैसी स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।
काठमाण्डू स्थित इंटरनेशल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवेेलपमेंट (आइसीमोड) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2026 में हिंदू कुश-हिमालय क्षेत्र में बर्फ के जमीन पर टिके रहने की अवधि सामान्य से 27.8 प्रतिशत कम दर्ज की गई है, जो पिछले दो दशकों में सबसे न्यूनतम स्तर है। यह लगातार चौथा वर्ष है जब हिम स्तर सामान्य से नीचे रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि यही प्रवृत्ति जारी रही, तो ग्लेशियल लेक्स की संख्या में वृद्धि के साथ ही भविष्य में नदियों के प्रवाह में भारी कमी आ सकती है, जिससे जल संकट की स्थिति और गहरी हो सकती है। वर्ष 2019 में प्रकाशित इंटरनेशल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की विशेष रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया था कि यदि वैश्विक तापमान वृद्धि को नियंत्रित नहीं किया गया, तो इस सदी के अंत तक हिंदू कुश-हिमालय क्षेत्र के एक-तिहाई से अधिक ग्लेशियर समाप्त हो सकते हैं। इसी प्रकार वर्ष 2021 में प्रकाशित ‘‘विश्व मौसम संगठन’’ की रिपोर्ट में हिमालयी क्षेत्रों में औसत तापमान वृद्धि को वैश्विक औसत से अधिक बताया गया, जो ग्लेशियरों के तेज पिघलाव का प्रमुख कारण बन रहा है।
हिमालय में बढ़ते खतरों का सबसे स्पष्ट उदाहरण वर्ष 2021 की 7 फरबरी की चमोली जिले की ऋषिगंगा – धौलीगंगा आपदा रही है। उस घटना में ऋषिगंगा और धौलीगंगा घाटियों में अचानक आई बाढ़ ने भारी तबाही मचाई थी। बाद में वैज्ञानिक अध्ययनों से यह निष्कर्ष निकला कि यह आपदा संभवतः एक चट्टान और ग्लेशियर के संयुक्त टूटने से उत्पन्न हुई थी। इसी तरह वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा में भी अत्यधिक वर्षा, ग्लेशियर झील के फटने और भूस्खलन के संयुक्त प्रभाव ने हजारों लोगों की जान ले ली थी। इन घटनाओं ने यह सिद्ध कर दिया है कि हिमालयी क्षेत्रों में छोटे-छोटे भू-परिवर्तन भी बड़े पैमाने की आपदाओं का रूप ले सकते हैं। पर्यावरण विज्ञानियों के अनुसार हिमालयी क्षेत्रों में मानव गतिविधियों का बढ़ता दबाव इस संकट को और जटिल बना रहा है। पिछले दो दशकों में तीर्थस्थलों, पर्यटन केंद्रों और सीमा क्षेत्रों में सड़कों, भवनों तथा अन्य बुनियादी ढांचे का तेजी से विस्तार हुआ है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि कई सीमान्त जिला चमोली के संवेदनशील क्षेत्रों, जैसे बद्रीनाथ, माणा और हनुमान चट्टी, में निर्माण गतिविधियाँ उन स्थानों तक पहुँच गई हैं, जो भूस्खलन और हिमस्खलन की दृष्टि से अत्यधिक जोखिम वाले माने जाते हैं। जब ऐसे क्षेत्रों में प्राकृतिक अस्थिरता और मानव दबाव एक साथ बढ़ते हैं, तो आपदाओं की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।भारतीय वैज्ञानिक संस्थानों द्वारा किए गए अध्ययनों में यह पाया गया है कि गंगा बेसिन के कई ग्लेशियर पिछले तीन दशकों में औसतन 10 से 30 मीटर प्रति वर्ष की दर से पीछे हट रहे हैं। यह दर पहले की तुलना में कहीं अधिक है। ‘इंडियन इंस्टिट्यूट आफ संाइंस’ तथा अन्य संस्थानों के संयुक्त अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि ग्लेशियरों के पीछे हटने से उनकी संरचना कमजोर हो रही है और सहायक ग्लेशियर मुख्य ग्लेशियर से अलग होकर अस्थिर ‘हैंगिंग ग्लेशियर’ का रूप ले रहे हैं।
इसके साथ ही ग्लेशियर झीलों की संख्या और आकार में भी वृद्धि देखी जा रही है। नेपाल और भूटान सहित पूरे हिमालय क्षेत्र में पिछले दो दशकों में ग्लेशियर झीलों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इन झीलों के अचानक फटने की घटनाएँ, जिन्हें ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड कहा जाता है, बड़े पैमाने पर विनाश का कारण बन सकती हैं। उत्तराखंड में 2013 के बाद से कई नई झीलों की पहचान की गई है, जिनमें से कई को उच्च जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है। हिमालयी बर्फ और ग्लेशियर पिघलाव से हिंदू कुश-हिमालय क्षेत्र की नदियों के कुल प्रवाह का लगभग 23 प्रतिशत हिस्सा प्राप्त होता है। यदि बर्फ की मात्रा लगातार घटती रही, तो प्रारंभिक वर्षों में बाढ़ की घटनाएँ बढ़ सकती हैं, लेकिन दीर्घकाल में नदियों का जल स्तर घट सकता है। इससे कृषि, जलविद्युत उत्पादन और पेयजल आपूर्ति पर गहरा प्रभाव पड़ेगा।
हिमालय में घटती बर्फ और अस्थिर ग्लेशियरों की स्थिति केवल एक पर्यावरणीय समस्या नहीं है, बल्कि यह मानव अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न बनती जा रही है। आज जो संकेत वैज्ञानिक रिपोर्टों और न्यायिक कार्रवाइयों के रूप में सामने आ रहे हैं, वे भविष्य के संभावित संकट की स्पष्ट चेतावनी हैं। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में हिमालयी क्षेत्र ही नहीं, बल्कि उससे जुड़े विशाल भूभाग को भी गंभीर जल और पर्यावरणीय संकट का सामना करना पड़ सकता है। यही कारण है कि आज की सावधानी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण ही कल की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकते हैं।
