खतरनाक कुत्तों को मारने की अनुमति नहीं, लोगों को बिना डर जीने का अधिकार भी जरूरी : सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली, 20 मई। सुप्रीम कोर्ट ने आवारा और खतरनाक कुत्तों के बढ़ते हमलों पर सुनवाई करते हुए कहा है कि लोगों को भयमुक्त और सुरक्षित जीवन जीने का अधिकार है, लेकिन इसके नाम पर आवारा कुत्तों को अंधाधुंध मारने की अनुमति नहीं दी जा सकती। अदालत ने स्पष्ट किया कि रेबीज से संक्रमित, लाइलाज बीमारी से पीड़ित अथवा अत्यधिक आक्रामक और खतरनाक कुत्तों को कानून के तहत मानवीय तरीके से मृत्यु दी जा सकती है, लेकिन सामान्य आवारा कुत्तों को मारना संविधान और पशु संरक्षण कानूनों के खिलाफ होगा।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया की पीठ ने देशभर में बढ़ती कुत्ता काटने की घटनाओं पर चिंता जताते हुए कहा कि इन घटनाओं से आम नागरिकों, विशेषकर बच्चों और बुजुर्गों में भय का वातावरण बन रहा है। अदालत ने कहा कि नागरिकों का सुरक्षित जीवन और सार्वजनिक स्वास्थ्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना पशुओं के प्रति संवेदनशीलता।
‘डार्विन का सिद्धांत’ वाला दौर नहीं लौट सकता
सुनवाई के दौरान पीठ ने टिप्पणी की कि यदि कुत्तों के हमलों की घटनाओं को नहीं रोका गया तो समाज फिर “डार्विन के सिद्धांत वाले युग” की ओर लौट सकता है, जहां केवल ताकतवर ही जीवित रह पाएंगे। अदालत ने कहा कि सभ्य समाज में राज्य की जिम्मेदारी है कि वह बच्चों, महिलाओं, बुजुर्गों और कमजोर नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे।
पीठ ने कहा कि अस्पतालों, स्कूलों, सार्वजनिक स्थलों और रिहायशी इलाकों में लोगों को लगातार डर के माहौल में नहीं रखा जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि यदि प्रशासन अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रहता है तो नागरिकों का जीवन और स्वास्थ्य दोनों खतरे में पड़ जाएंगे।
नसबंदी और टीकाकरण कार्यक्रम पर सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पिछले कई वर्षों से चल रहे पशु जन्म नियंत्रण (एबीसी) कार्यक्रम को प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया गया, जिसके कारण आवारा कुत्तों की संख्या लगातार बढ़ती गई। अदालत ने कहा कि यदि नसबंदी और टीकाकरण योजनाओं को समय पर और वैज्ञानिक तरीके से लागू किया गया होता तो स्थिति इतनी गंभीर नहीं बनती।
पीठ ने विभिन्न राज्यों के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि देश में हर वर्ष लाखों लोग कुत्तों के काटने का शिकार हो रहे हैं। कई मामलों में छोटे बच्चों को गंभीर चोटें आई हैं और कुछ मामलों में मौतें भी हुई हैं। अदालत ने कहा कि यह केवल पशु कल्याण का विषय नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और नागरिक सुरक्षा का गंभीर प्रश्न है।
अस्पतालों और स्कूलों के आसपास विशेष सतर्कता
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और स्थानीय निकायों को निर्देश दिया कि अस्पतालों, स्कूलों, बस अड्डों और भीड़भाड़ वाले सार्वजनिक स्थलों के आसपास आवारा कुत्तों की समस्या पर तत्काल प्रभाव से कार्रवाई की जाए। अदालत ने कहा कि स्थानीय प्रशासन को ऐसे क्षेत्रों में विशेष निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी।
लावारिस कुत्तों को हटाने वाले आदेश में बदलाव से इनकार
पीठ ने लावारिस कुत्तों को सार्वजनिक स्थलों से हटाने संबंधी अपने नवंबर 2025 के आदेश में किसी भी प्रकार का बदलाव करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि लोगों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और इस उद्देश्य से जारी निर्देशों को कमजोर नहीं किया जा सकता।
साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आवारा कुत्तों के साथ क्रूरता नहीं होनी चाहिए। भारतीय पशु कल्याण बोर्ड द्वारा जारी दिशा-निर्देशों और मानक संचालन प्रक्रिया का पालन करते हुए ही कार्रवाई की जाए।
याचिकाएं खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने उन याचिकाओं को भी खारिज कर दिया जिनमें आवारा कुत्तों को हटाने संबंधी आदेशों में ढील देने की मांग की गई थी। अदालत ने कहा कि नागरिकों की सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और बच्चों के जीवन की रक्षा सर्वोच्च दायित्व है तथा प्रशासन को इस दिशा में प्रभावी कदम उठाने होंगे।
