सरकार की नज़र मंदिरों के सोने के भंडारों पर नहीं ?
नयी दिल्ली, 20 मई। देशभर में मंदिरों के स्वर्ण भंडार को लेकर अचानक शुरू हुई चर्चाओं और सोशल मीडिया पर फैली अटकलों ने एक बड़े राष्ट्रीय विमर्श का रूप ले लिया है। पिछले कुछ दिनों में अनेक पोस्ट, वीडियो और कुछ मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया कि केंद्र सरकार मंदिरों में जमा सोने के बदले “स्वर्ण बांड” जारी करने अथवा धार्मिक संस्थाओं के स्वर्ण भंडार के मुद्रीकरण की योजना बना रही है। हालांकि सरकार ने इन दावों को पूरी तरह “झूठा, भ्रामक और निराधार” बताते हुए खारिज कर दिया है।
लेकिन यह विवाद केवल एक सरकारी खंडन तक सीमित नहीं है। इसके पीछे भारत की अर्थव्यवस्था, सोने के प्रति भारतीय समाज की पारंपरिक आस्था, मंदिरों की विशाल संपत्ति और सरकार की पुरानी गोल्ड मोनेटाइजेशन नीतियों का लंबा इतिहास भी जुड़ा हुआ है।
भारत दुनिया के सबसे बड़े स्वर्ण उपभोक्ता देशों में शामिल है। विश्व स्वर्ण परिषद और विभिन्न आर्थिक अध्ययनों के अनुसार भारतीय परिवारों, धार्मिक संस्थाओं और ट्रस्टों के पास सामूहिक रूप से हजारों टन सोना मौजूद है। अनुमान है कि भारतीय घरों और संस्थाओं के पास 25,000 टन से अधिक सोना हो सकता है, हालांकि इसका कोई आधिकारिक राष्ट्रीय आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। इसी कारण समय-समय पर यह बहस उठती रही है कि निष्क्रिय पड़े इस स्वर्ण भंडार को औपचारिक अर्थव्यवस्था से कैसे जोड़ा जाए।
देश के कई बड़े मंदिर—जैसे श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर, तिरुमला वेंकटेश्वर मंदिर, शिरडी साईं बाबा मंदिर और साबरिमला मंदिर वर्षों से अपने विशाल स्वर्ण भंडार और चढ़ावे के कारण चर्चा में रहे हैं। हाल ही में महाराष्ट्र के तुलजाभवानी मंदिर में केवल दो वर्षों के भीतर लगभग 49 किलोग्राम सोना और 662 किलोग्राम चांदी दान में मिलने की खबर भी सामने आई।
विशेषज्ञों का मानना है कि हालिया अफवाहों के पीछे कई आर्थिक और राजनीतिक कारण हो सकते हैं। हाल के महीनों में वैश्विक अस्थिरता और पश्चिम एशिया तनाव के कारण सोने की कीमतों में भारी वृद्धि हुई है। इसी दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी लोगों से अनावश्यक सोना खरीदने से बचने की अपील की थी। इसके बाद सोशल मीडिया पर यह अटकलें तेज हो गईं कि सरकार देश में उपलब्ध निष्क्रिय सोने को आर्थिक संसाधन के रूप में उपयोग करने पर विचार कर सकती है।
दरअसल भारत सरकार पहले भी “गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम” और “सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड” जैसी योजनाएं चला चुकी है। गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम का उद्देश्य घरों और संस्थाओं में पड़े निष्क्रिय सोने को बैंकिंग प्रणाली से जोड़ना था, जबकि सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड योजना के तहत सरकार निवेशकों को भौतिक सोने के बजाय कागजी निवेश का विकल्प देती थी। हालांकि सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड योजना को बाद में महंगी देनदारी और सीमित प्रभाव के कारण बंद कर दिया गया।
यही पृष्ठभूमि वर्तमान अफवाहों को अधिक संवेदनशील बना देती है। धार्मिक संस्थाओं का सोना केवल आर्थिक संपत्ति नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा विषय माना जाता है। ऐसे में मंदिरों के स्वर्ण भंडार को लेकर किसी भी प्रकार की चर्चा तुरंत राजनीतिक और सामाजिक बहस का रूप ले लेती है।
हाल के वर्षों में मंदिरों के स्वर्ण प्रबंधन और सुरक्षा को लेकर विवाद भी सामने आते रहे हैं। केरल के साबरिमला मंदिर में स्वर्ण परतों और आभूषणों में कथित अनियमितताओं की जांच अभी भी चर्चा में है। अदालत की निगरानी में चल रही जांच में स्वर्ण के दुरुपयोग और प्रबंधन संबंधी गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
इसी कारण विशेषज्ञ मानते हैं कि मंदिरों की संपत्ति और स्वर्ण भंडार से जुड़ी किसी भी खबर को लोग अत्यधिक गंभीरता से लेते हैं। सोशल मीडिया पर आधी-अधूरी जानकारी, पुराने दस्तावेज और भ्रामक दावे तेजी से वायरल हो जाते हैं, जिससे भ्रम की स्थिति पैदा होती है।
सरकार ने अब स्पष्ट किया है कि मंदिरों के स्वर्ण भंडार के मुद्रीकरण या उनके बदले स्वर्ण बांड जारी करने जैसी कोई योजना विचाराधीन नहीं है। वित्त मंत्रालय ने कहा है कि ऐसी खबरें पूरी तरह निराधार हैं और नागरिकों को केवल आधिकारिक स्रोतों पर भरोसा करना चाहिए।
