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लौट आया चीता : भारतीय जंगलों में फिर बस रही रफ्तार

The cheetah was once found in large numbers across India’s vast grasslands, semi-arid regions, and open forests. During the Mughal era, cheetahs were utilized for hunting. According to historians, at one point, more than a thousand cheetahs were kept in the court of Emperor Akbar. They were referred to as “hunting leopards” and were considered an integral part of the hunting expeditions of kings and maharajas. However, due to excessive hunting, the destruction of natural habitats, the neglect of grasslands, and a decline in prey species, the cheetah population in India dwindled rapidly. Records indicate that the last three cheetahs were hunted in 1947 in the region that now constitutes present-day Chhattisgarh. Subsequently, in 1952, the Government of India officially declared the cheetah extinct in the country. Today—approximately 70 years later—the return of the cheetah is viewed not merely as the return of a single wildlife species, but as the restoration of India’s lost natural heritage.

 

-उषा रावत 

भारत की बहुचर्चित चीता पुनर्वास परियोजना अब केवल एक वन्यजीव कार्यक्रम नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर संरक्षण विज्ञान, पर्यावरणीय पुनर्स्थापन और अंतरराष्ट्रीय सहयोग का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन चुकी है। लगभग सात दशक पहले भारत से विलुप्त हो चुके चीते को पुनः भारतीय जंगलों में बसाने का यह प्रयास विश्व की सबसे महत्वाकांक्षी वन्यजीव पुनर्स्थापन योजनाओं में गिना जा रहा है।

इतिहास के पन्नों से वापसी

चीता कभी भारत के विशाल घास के मैदानों, अर्ध-शुष्क क्षेत्रों और खुले जंगलों में बड़ी संख्या में पाया जाता था। मुगल काल में चीतों का उपयोग शिकार के लिए किया जाता था। इतिहासकारों के अनुसार बादशाह अकबर के दरबार में एक समय लगभग एक हजार से अधिक चीते रखे गए थे। उन्हें “हंटिंग लेपर्ड” कहा जाता था और राजाओं-महाराजाओं के शिकार अभियानों का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता था। लेकिन अत्यधिक शिकार, प्राकृतिक आवासों का विनाश, घासभूमियों की उपेक्षा और शिकार प्रजातियों की कमी के कारण भारत में चीतों की संख्या तेजी से घटती गई। वर्ष 1947 में वर्तमान छत्तीसगढ़ क्षेत्र में अंतिम तीन चीतों का शिकार किए जाने का उल्लेख मिलता है। इसके बाद 1952 में भारत सरकार ने आधिकारिक रूप से चीते को देश से विलुप्त घोषित कर दिया। आज लगभग 70 वर्ष बाद चीते की वापसी केवल एक वन्यजीव की वापसी नहीं, बल्कि भारत की खोई हुई प्राकृतिक विरासत की पुनर्स्थापना के रूप में देखी जा रही है।

दुनिया में कितने चीते बचे हैं?

चीता दुनिया का सबसे तेज दौड़ने वाला स्थलीय जीव माना जाता है, जो लगभग 100 से 120 किलोमीटर प्रति घंटे की गति प्राप्त कर सकता है। लेकिन इतनी अद्भुत क्षमता वाला यह जीव आज गंभीर संरक्षण संकट का सामना कर रहा है। विश्व स्तर पर वर्तमान में अनुमानतः केवल 7,000 से 7,500 जंगली चीते ही बचे हैं। इनमें से अधिकांश अफ्रीका के नामीबिया, बोत्सवाना, दक्षिण अफ्रीका, तंजानिया और केन्या जैसे देशों में पाए जाते हैं। एशियाई चीते लगभग विलुप्त हो चुके हैं और ईरान में उनकी संख्या बेहद सीमित, लगभग एक दर्जन के आसपास मानी जाती है। यही कारण है कि भारत की चीता परियोजना को वैश्विक संरक्षण समुदाय बेहद गंभीरता और उम्मीद के साथ देख रहा है।

भारत में चीता परियोजना की शुरुआत

चीता परियोजना की औपचारिक शुरुआत सितंबर 2022 में हुई, जब नामीबिया से आठ चीतों को मध्य प्रदेश के कुनो राष्ट्रीय उद्यान में लाया गया। इसके बाद दक्षिण अफ्रीका से 12 और चीते भारत पहुंचे। बाद के चरणों में बोत्सवाना से भी चीतों को लाने की दिशा में सहयोग बढ़ाया गया। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी बड़े मांसाहारी जीव का एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप में स्थानांतरण अत्यंत जटिल और जोखिमपूर्ण प्रक्रिया होती है। जलवायु परिवर्तन, भोजन की उपलब्धता, रोग, क्षेत्रीय संघर्ष और मानव संपर्क जैसी अनेक चुनौतियाँ इसमें शामिल होती हैं। इसके बावजूद भारत की परियोजना ने अपेक्षा से बेहतर परिणाम दिए हैं। वर्तमान में चीतों की कुल संख्या 53 तक पहुंच चुकी है, जिनमें 33 भारत में जन्मे शावक शामिल हैं। यह इस परियोजना की सबसे बड़ी सफलता मानी जा रही है, क्योंकि किसी भी पुनर्वास कार्यक्रम की वास्तविक सफलता स्थानीय परिस्थितियों में प्रजनन और नई पीढ़ी के जीवित रहने पर निर्भर करती है।

पर्यावरणीय दृष्टि से क्यों महत्वपूर्ण है चीता?

विशेषज्ञों के अनुसार चीता केवल एक आकर्षक वन्यजीव नहीं है, बल्कि वह घासभूमि पारिस्थितिकी तंत्र का “फ्लैगशिप प्रजाति” है। अर्थात यदि चीते के लिए सुरक्षित और स्वस्थ आवास विकसित होता है, तो उससे अनेक अन्य वन्यजीवों, पक्षियों और वनस्पतियों को भी लाभ मिलता है। भारत में लंबे समय तक घासभूमियों को अनुपयोगी या बंजर भूमि मानकर उपेक्षित किया गया। जबकि ये क्षेत्र जैव विविधता के अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र हैं। चीता परियोजना ने पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर यह स्थापित किया कि घासभूमियां भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं जितने घने जंगल।चीता जैसे शीर्ष शिकारी जीव पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे हिरण और अन्य शाकाहारी जीवों की संख्या को नियंत्रित करते हैं, जिससे वनस्पतियों का अत्यधिक दोहन नहीं होता और प्राकृतिक संतुलन बना रहता है। स्वस्थ घासभूमियां कार्बन अवशोषण, मिट्टी संरक्षण और जल संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान देती हैं।

चुनौतियां और सीख

परियोजना को कई चुनौतियों का सामना भी करना पड़ा है। कुछ चीतों और शावकों की मृत्यु ने प्रबंधन व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े किए थे। अत्यधिक गर्मी, संक्रमण, रेडियो कॉलर से जुड़ी समस्याएं और प्राकृतिक अनुकूलन जैसी परिस्थितियाँ इसके कारण बनीं। हालांकि वन्यजीव वैज्ञानिकों का कहना है कि किसी भी पुनर्स्थापन कार्यक्रम के प्रारंभिक वर्षों में ऐसी चुनौतियाँ सामान्य मानी जाती हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि चीते भारतीय परिस्थितियों में धीरे-धीरे अनुकूलन कर रहे हैं और उनकी उत्तरजीविता दर वैश्विक मानकों के अनुरूप पाई गई है।

विस्तार की दिशा में बढ़ता भारत

परियोजना का “लैंडस्केप आधारित दृष्टिकोण” इसकी सबसे बड़ी विशेषताओं में शामिल है। केवल एक अभयारण्य में चीतों को सीमित रखने के बजाय मध्य भारत के विस्तृत घास के मैदानों और वन क्षेत्रों को जोड़कर एक बड़े प्राकृतिक परिदृश्य के रूप में विकसित किया जा रहा है।इसी सोच के तहत गांधीसागर वन्यजीव अभयारण्य, नौरादेही वन्यजीव अभयारण्य और गुजरात के बन्नी घासभूमि जैसे क्षेत्रों को भविष्य के संभावित चीता आवास के रूप में विकसित किया जा रहा है। इन क्षेत्रों में शिकार प्रजातियों की संख्या बढ़ाने, मानव हस्तक्षेप कम करने और प्राकृतिक आवासों के संरक्षण पर विशेष कार्य किया जा रहा है।

स्थानीय अर्थव्यवस्था और पर्यटन को भी लाभ

चीता परियोजना के सामाजिक और आर्थिक प्रभाव भी सामने आने लगे हैं। कुनो और आसपास के क्षेत्रों में पर्यटन, स्थानीय रोजगार, गाइड सेवाओं और इको-टूरिज्म गतिविधियों में वृद्धि देखी जा रही है। स्थानीय समुदायों की भागीदारी बढ़ाने और मानव-वन्यजीव संघर्ष कम करने के लिए भी विभिन्न योजनाएँ चलाई जा रही हैं।

भारत के लिए क्यों ऐतिहासिक है यह प्रयास?

यदि चीता परियोजना दीर्घकालिक रूप से सफल होती है, तो भारत दुनिया का वह अनूठा देश बन जाएगा जिसने किसी विलुप्त बड़े मांसाहारी जीव को पुनः प्राकृतिक वातावरण में सफलतापूर्वक स्थापित किया। यह परियोजना केवल चीते को बचाने का प्रयास नहीं, बल्कि भारत की जैव विविधता, पर्यावरणीय संतुलन, घासभूमियों के पुनर्जीवन और भविष्य की पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक धरोहर को सुरक्षित रखने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है।

 

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