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जनरल खण्डूड़ी, राजनीति के दलदल का कमल

-गोविंद प्रसाद बहुगुणा-

उत्तराखंड के शिरोमणि, मेजर जनरल, अति विशिष्ट सेवा मेडल से अलंकृत, भूतपूर्व केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री एवं उत्तराखंड के भूतपूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी जी भी बिदा हो गये । यह दुखद घटना तो है ही लेकिन सभी देहधारियों की अंतिम यही गति होती है किन्तु कुछ ऐसी विभूतियां भी होती हैं जिनकी यश कीर्ति को मृत्यु नहीं हर सकती ,वे अमर रहते हैं , उनमें खण्डूड़ी जी भी एक हैं। वे बहुत ईमानदार आदमी थे।
मुझे याद आ रहा है आज से लगभग दो दशक पहले की एक घटना, जब मैं अपनी पत्नी के साथ बेंगलुरु के सुदूर देहात में स्थित श्री श्री रविशंकर जी के Art of Living Foundation में एक सप्ताह रुके थे , वहां प्रातःकालीन भ्रमण के दौरान हमारा परिचय महाराष्ट्र से पधारे एक सेवानिवृत्त चीफ इंजीनियर से हुआ था, उन्हें जब पता लगा कि हम उत्तराखंड के हैं तो उन्होंने कहा अरे आपके खंडूड़ी जी ने तो भूतल परिवहन मंत्री के रूप में शानदार काम किया है वे बहुत ईमानदार और शालीन व्यक्ति हैं, वे तो फौज के भी चीफ इंजीनियर रहे उनके साथ काम करने में हमें मजा आया।इसी तरह मेरी मुलाक़ात चेन्नई प्रवास के समय भी एक हाउसिंग सोसायटी में आयोजित गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में पधारे एक सेवानिवृत्त अधिकारी से हुई जो Controller General of Defense Accounts (CGDA) के पद से सेवानिवृत हुए थे ,उनसे औपचारिक परिचय के बाद एक दिन फिर शाम को मैं जब परिसर के भीतर ही घूम रहा था तो उन्होंने मुझे देखा- अरे Sir आप यहीं रहते हैं -आपने बताया कि आप उत्तराखंड से हैं, वहां के मुख्यमंत्री जनरल खण्डूड़ी जी मेरे अच्छे दोस्त हैं। उनकी खूबी यह है कि वे बेहद ईमानदार और सज्जन व्यक्ति हैं -मैं साल दो साल में उत्तराखंड में जब जाता हूँ ,उनसे जरूर मिलता हूँ — उनके ममुख से यह प्रशंसा सुनकर मुझे लगा कि जैसे कि वे मेरी ही तारीफ़ कर रहे हैं —

फिर देहरादून के रेलवे स्टेशन का एक संक्षिप प्रसंग सुनाने का लोभ मैं नहीं छोड़ सकता – ,मैं किसी को See Off करने शाम को स्टैशन गया था, तो वहां पर उसी समय मुख्यमंत्री खण्डूड़ी जी पहुंचे , मैंने देखा उनके साथ सिर्फ दो सिपाही उन्हें छोड़ने आये थे, कोई लाव लश्कर उनके साथ नहीं था I वे ट्रेन से उस दिन नैनीताल जा रहे थे I मैंने यों ही उन्हें देखकर प्रणाम किया , वे मेरे पास आये -अपनी जिंदगी में किसी मुख्यमंत्री ने मुझसे हाथ मिलाने में संकोच नहीं किया -पूछा कैसे हैं आप और फिर अपने आरक्षित डिब्बे के दरवाजे से उन दोनों सिपाहियों को हाथ हिलाकर Bye Bye किया –ऐसे सरल मिजाज के थे वे –
उनके परिवार की कोई कहानी नहीं यहाँ कहूंगा लेकिन कहे बिना भी नहीं रह सकता -उत्तरकाशी का कीर्ति Govt Inter College की इमारत ,मसूरी के घनानंद सरकारी इंटर कॉलेज ,हमारे गांव के निकट नाकुरी बगीचे की धर्मशाला और हमारे गांव के पास नदी के ऊपर बना लकड़ी का पुल उन्हीं के पूर्वजों का बनाया हुआ था –और हाँ वे भी उसी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के छात्र रहे जहाँ मैं भी कभी पढता था ….पहाड़ के ऐसे सच्चे हितेषी महापुरुष को मेरी भावपूर्ण श्रद्धांजलि निवेदित -GPB

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