उत्तर प्रदेश में इतिहास और राजनीति का मेल नज़र आने लगा
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–बद्री नारायण-
भारतीय लोकतंत्र की राजनीति में अब अतीत केवल बीती हुई स्मृति नहीं रह गया है। वह वर्तमान के राजनीतिक कुरुक्षेत्र में सक्रिय रूप से संघर्ष कर रहा है। इतिहास के नायक, राजा, योद्धा और लोकनायक अतीत के पन्नों से निकलकर आज की राजनीतिक लड़ाइयों का हिस्सा बन रहे हैं। ऐतिहासिक आख्यानों और जनस्मृतियों के निरंतर पुनर्निर्माण तथा पुनर्व्याख्या के माध्यम से राजनीतिक और सामाजिक समूह इन्हें चुनावी तथा वैचारिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। इतिहास और राजनीति का यह मेल विशेष रूप से उत्तर प्रदेश की राजनीति में स्पष्ट दिखाई देता है।
साल 2027 के विधानसभा चुनावों की आहट के साथ राजनीतिक दल अपनी-अपनी सामाजिक और चुनावी रणनीतियों को तेज़ कर चुके हैं। हाल ही में बरेली में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने 1857 के विद्रोह के दलित नायक वीरा पासी की प्रतिमा का अनावरण किया। उन्हें भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के वीर सेनानी के रूप में प्रस्तुत करते हुए कांग्रेस ने दलित और वंचित समुदायों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने का प्रयास किया।
इसी प्रकार एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने बहराइच की एक सभा में गाज़ी मियाँ के साहस और शौर्य का उल्लेख किया। उन्होंने मुस्लिम पहचान और ऐतिहासिक स्मृति को राजनीतिक रूप से सक्रिय करने का प्रयास किया। लोकमान्यता के अनुसार गाज़ी मियाँ, जिनका वास्तविक नाम सैयद सालार मसूद था, 11वीं शताब्दी में बहराइच आए थे, जहाँ उनका युद्ध महाराजा सुहेलदेव से हुआ और वे मारे गए। आज भी उनकी दरगाह आस्था का प्रमुख केंद्र है।
ओवैसी के इस बयान पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने महाराजा सुहेलदेव को विदेशी आक्रमणकारियों के विरुद्ध संघर्ष करने वाले महान योद्धा के रूप में प्रस्तुत किया और कहा कि गाज़ी मियाँ का महिमामंडन राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध है। उन्होंने कलाकारों, शिक्षण संस्थानों और सांस्कृतिक संगठनों से सुहेलदेव और अन्य स्थानीय नायकों पर आधारित रचनाएँ विकसित करने का भी आह्वान किया।
औपनिवेशिक अभिलेखों और लोकपरंपराओं के अनुसार महाराजा सुहेलदेव भर समुदाय से जुड़े थे, जो आज उत्तर प्रदेश के वंचित समुदायों में गिना जाता है। दिलचस्प बात यह है कि पासी समुदाय भी सुहेलदेव को अपना पूर्वज मानता है। दूसरी ओर, बहराइच स्थित गाज़ी मियाँ की दरगाह पर हर वर्ष देशभर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुँचते हैं। इस प्रकार यह स्थल केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि ऐतिहासिक स्मृति और राजनीतिक विमर्श का भी महत्वपूर्ण स्थान बन गया है।
इसी तरह लखनऊ में बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच राजा बिजली पासी की विरासत को लेकर प्रतिस्पर्धा देखी जा रही है। दोनों दल उनकी ऐतिहासिक और प्रतीकात्मक पहचान को अपने-अपने राजनीतिक हितों के अनुरूप इस्तेमाल करना चाहते हैं। समाजवादी पार्टी ब्राह्मण मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए महर्षि परशुराम की छवि को भी लगातार उभारती रही है।
इतिहास अब केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं रहा। भूले-बिसरे मध्यकालीन नायक, राजा और योद्धा आज राजनीतिक दलों द्वारा पहचान की राजनीति और चुनावी समर्थन जुटाने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं।
समकालीन राजनीति में ऐतिहासिक प्रतीकों का बढ़ता उपयोग भारतीय लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े करता है। अब इतिहास के पात्र केवल अतीत के विषय नहीं रह गए हैं, बल्कि वे सामूहिक स्मृति, सामाजिक पहचान और राजनीतिक लामबंदी के साधन बन चुके हैं। जब विभिन्न राजनीतिक दल अलग-अलग ऐतिहासिक आख्यानों को अपने हित में प्रस्तुत करते हैं, तो अतीत के अनसुलझे विवाद और स्मृतियाँ वर्तमान राजनीति में नए तनाव पैदा कर सकती हैं।
पश्चिमी समाजों में इतिहास और स्मृति महत्वपूर्ण अवश्य हैं, लेकिन उन्हें आमतौर पर चुनावी हथियार के रूप में कम इस्तेमाल किया जाता है। वहीं चीन और दक्षिण कोरिया जैसे कई एशियाई देशों में इतिहास राष्ट्रीय प्रेरणा और सांस्कृतिक दर्शन का आधार अधिक है, न कि रोज़मर्रा की चुनावी राजनीति का।
भारत जैसे समाज में अतीत कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होता; वह वर्तमान में जीवित रहता है और सामूहिक पहचान का आधार बनता है। इसलिए इतिहास के साथ संतुलित, संवेदनशील और रचनात्मक व्यवहार आवश्यक है। आने वाले वर्षों में पहचान की राजनीति के कारण चुनावों में इतिहास की भूमिका और बढ़ सकती है। लेकिन यदि इसका उपयोग केवल राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिए किया गया, तो इससे सामाजिक विभाजन और गहरा हो सकता है।
‘विकसित भारत’ की यात्रा तभी अधिक सुगम होगी जब इतिहास और पहचान राजनीतिक हथियार बनने के बजाय साझा विरासत, बौद्धिक संवाद और सामूहिक प्रेरणा का स्रोत बनें।
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— बद्री नारायण : : कुलपति, टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (टीआईएसएस), मुंबई
