केशव गंगाधर तिलक की एक बाल स्मृति


— जी.पी. बहुगुणा
गत 23 जुलाई को लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की जयंती थी। उनका मूल नाम केशव गंगाधर तिलक था।
हम अपने स्कूल के दिनों में प्रतिवर्ष तिलक जयंती मनाते थे। हमारे प्रधानाचार्य श्री हीराबल्लभ थपलियाल तथा सभी अध्यापक उनके जीवन और कृतित्व पर विस्तार से प्रकाश डालते थे। मेरे चाचाजी श्री सुन्दरलाल बहुगुणा भी तिलक के व्यक्तित्व एवं विचारों पर बड़े गंभीर ढंग से चर्चा किया करते थे। वे इतिहास के प्रवक्ता और अत्यंत अध्ययनशील व्यक्ति थे।
भगवद्गीता का अध्ययन लोकमान्य तिलक के जीवन का अभिन्न अंग था। यह संस्कार उन्हें अपने पिता गंगाधर तिलक से मिला था। गंगाधर जी ने अपने बेटे और बेटी के लिए एक रोचक नियम बनाया था। जो भी बच्चा गीता का एक श्लोक कंठस्थ करके सुनाता, उसे दो पैसे का पुरस्कार मिलता। केशव प्रतिदिन दस श्लोक याद कर अपने पिता को सुनाते और पुरस्कार में मिले पैसों से मूंगफली तथा चना खरीदते थे। उनकी बहन, जो खेल-कूद में अधिक रुचि रखती थीं, एक भी श्लोक याद नहीं कर पाती थीं। जब वह अपने भाई से मूंगफली मांगतीं, तो केशव हँसते हुए कहते, “एक दाना भी नहीं दूँगा। पहले एक श्लोक सुनाओ, फिर दूँगा। आलसी कहीं की!”
मांडले जेल में रहते हुए भी लोकमान्य तिलक ने समय का सदुपयोग आत्मचिंतन और गीता के अध्ययन में किया। वहीं उन्होंने अपनी स्मृति के आधार पर ‘गीता रहस्य’ की रचना आरंभ की। इसका मूल ग्रंथ उन्होंने मराठी भाषा में लिखा।
अंत में, ‘गीता रहस्य’ के प्रारंभ में समर्पण स्वरूप लिखे गए उनके संस्कृत श्लोक प्रस्तुत हैं—
श्रीगीतार्थः क्व गम्भीरः व्याख्यातः कविभिः पुरा।
आचार्यैश्च बहुधा क्व मेऽल्पविषया मतिः॥
तथापि चापलादस्मि वक्तुं तं पुनरुद्यतः।
शास्त्रार्थान् संमुखीकृत्य प्रयत्नैर्नव्यैर्यथोचितैः॥
तमार्याः श्रोतुमर्हन्ति कार्याकार्यदिदृक्षवः।
एवं विज्ञाप्य सुजनान् कालिदासाक्षरैः प्रियैः॥
बालो गंगाधरिश्चाहं तिलकान्वयजो द्विजः।
महाराष्ट्रे पुण्यपुरे वसन् शाण्डिल्यगोत्रभृत्॥
समर्पये ग्रन्थमिमं श्रीशाय जनतात्मने।
अनेन प्रीयतां देवो भगवान् पुरुषः परः॥
