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गोबर और जैविक कचरे से बनने वाली गैस को बढ़ावा, उपभोक्ताओं पर मामूली असर

नई दिल्ली, 29 अगस्त। गोबर, फसलों के बचे हुए हिस्सों और अन्य जैविक कचरे से बनाई जाने वाली संपीड़ित बायोगैस (सीबीजी) के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने इसकी खरीद कीमत बढ़ाई है। यह गैस प्राकृतिक गैस और सीएनजी के विकल्प के रूप में इस्तेमाल की जा सकती है। सरकार का कहना है कि उत्पादकों को अधिक कीमत मिलने के बावजूद इसका बोझ सीधे सीएनजी वाहन चालकों और घरों में पाइप से गैस इस्तेमाल करने वाले उपभोक्ताओं पर नहीं पड़ेगा।

सीबीजी को आसान भाषा में कचरे से तैयार होने वाला स्वच्छ ईंधन कहा जा सकता है। गोबर, पराली, कृषि अवशेष, खाद्य और दूसरे जैविक कचरे को विशेष संयंत्रों में सड़ाकर पहले बायोगैस बनाई जाती है। इस गैस को साफ कर उसमें मीथेन की मात्रा बढ़ाई जाती है और फिर दबाव देकर सीबीजी तैयार की जाती है। इसका इस्तेमाल वाहनों के ईंधन सहित प्राकृतिक गैस के विकल्प के रूप में किया जा सकता है।

हाल में यह आशंका जताई गई थी कि सीबीजी की संशोधित कीमत से सीएनजी और घरेलू पीएनजी महंगी हो सकती है। सरकार ने इस आकलन को भ्रामक बताते हुए स्पष्ट किया है कि सीबीजी उत्पादकों को मिलने वाली खरीद कीमत और आम उपभोक्ता द्वारा चुकाई जाने वाली गैस की खुदरा कीमत को एक मानना सही नहीं है।
मौजूदा व्यवस्था में सीबीजी उत्पादकों को मिलने वाली कीमत सीएनजी के खुदरा बिक्री मूल्य के 85 प्रतिशत से जुड़ी है। इसके आधार पर यह करीब 1,478 रुपये प्रति एमएमबीटीयू बैठती है। गोबर्धन योजना के तहत अब सीबीजी की कीमत 2,110 रुपये प्रति एमएमबीटीयू निर्धारित की गई है। इस लिहाज से उत्पादकों को मिलने वाली कीमत में करीब 43 प्रतिशत की वृद्धि दिखाई देती है।
हालांकि, यह पूरी बढ़ी हुई राशि उपभोक्ताओं से नहीं वसूली जाएगी। सरकार सीबीजी के लिए 10 रुपये प्रति किलोग्राम की वहनीयता सहायता देगी। 95 प्रतिशत मीथेन वाले सीबीजी के लिए यह सहायता लगभग 215 रुपये प्रति एमएमबीटीयू के बराबर होगी। इसे घटाने के बाद गैस व्यवस्था पर सीबीजी की प्रभावी लागत करीब 1,895 रुपये प्रति एमएमबीटीयू रह जाएगी। इस तरह मौजूदा 1,478 रुपये की तुलना में वास्तविक प्रभावी वृद्धि करीब 28 प्रतिशत होगी।
इसका अर्थ भी यह नहीं है कि सीएनजी या घरेलू पीएनजी के दाम 28 प्रतिशत बढ़ जाएंगे। इसकी वजह गैस की मूल्य निर्धारण व्यवस्था है। सीबीजी को उसी खरीद मूल्य पर सीधे उपभोक्ताओं को नहीं बेचा जाता, बल्कि इसकी लागत घरेलू स्तर पर उत्पादित दूसरी प्राकृतिक गैस के साथ मिलाकर एक बड़े गैस पूल में बांटी जाती है।
पहले सीबीजी की लागत मुख्य रूप से सीएनजी और घरेलू पीएनजी के लिए आवंटित सीमित एपीएम गैस पर वितरित होती थी। नई व्यवस्था में इसे घरेलू गैस के ऐसे व्यापक आधार पर बांटा जाएगा, जो पहले के मुकाबले करीब ढाई से तीन गुना बड़ा होगा। सरकार का दावा है कि इसी कारण किसी एक सीएनजी या घरेलू पीएनजी उपभोक्ता पर अतिरिक्त लागत का प्रभाव बेहद मामूली रहेगा।
नई मूल्य व्यवस्था का उद्देश्य सीबीजी उद्योग को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाना भी है। सीबीजी गोबर, कृषि अवशेष, जैविक कचरे और अन्य अपशिष्ट से तैयार होने वाला अपेक्षाकृत स्वच्छ ईंधन है। इसके उत्पादन को बढ़ावा मिलने से प्राकृतिक गैस के आयात पर निर्भरता कम करने, कचरे के उपयोग और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आय के नए अवसर पैदा करने में मदद मिल सकती है।
इस प्रकार सरकार ने नई व्यवस्था में उत्पादकों को बेहतर कीमत देने के साथ उपभोक्ताओं को मूल्य वृद्धि से बचाने का प्रयास किया है। सरकार की वहनीयता सहायता और लागत को बड़े गैस पूल में बांटने की व्यवस्था के कारण सीबीजी उत्पादकों को तो सीधा लाभ मिलेगा, लेकिन आम सीएनजी और घरेलू पीएनजी उपभोक्ताओं की जेब पर इसका असर सीमित रहने का अनुमान है।

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