हिंदी दिवस पर विशेष : एक दिन की हिंदी

–अरुण श्रीवास्तव देहरादून
हिंदी प्रेमियों को हिंदी दिवस की हार्दिक बधाई। आज मैं पूरे दिन 1440 मिनट हिंदी ही बोलूंगा, और लिखूंगा यही नहीं अंग्रेजी को भी हिंदी में लिखूंगा। आखिर हिंदी का श्राद्ध है जो। वैसे भी जब सरकारी से लेकर प्राइवेट बैंकों व जीवन बीमा निगम तक में हिंदी दिवस या हिंदी पखवाड़ा के बैनर झूलने लगे, कान्वेंट स्कूलों में “गाय हमारी माता है” निबंध प्रतियोगिता आयोजित होने लगे तो समझ लीजिए हिंदी दिवस आउटर पर खड़ा है 14 सितंबर आने ही वाला है। 12 साल में ” घूर के दिन फिरते हैं फिर ये तो हिंदी जिसके लिए हमारे पुरखे नारे लगाते रहे “हिंदी हिंदू हिंदुस्तान”। अब देखिए न हर 364 दिन बाद इठलाती हुई आ जाती है। 364 दिन सोई हिंदी जाग जाती है।
जगह-जगह हिंदी के साहित्यकारों को बुके सॉरी पुष्प गुच्छ देकर सम्मानित किया जाता है। रद्दी की टोकरियों से हिंदी कवियों की सूची से दरबारी और उन नाराज़ फ़ूफ़ानुमा कवियों को बुलाया जाता है जो पिछले साल सम्मानित होने से “बाल-बाल बच गए थे।
आम शहरी का सुबह-सुबह सामना जिससे होता है वो है अखबार। देश में आज़ भी हिंदी बोलने वालों की संख्या सबसे ज़्यादा है सो हिंदी के अखबार भी सबसे ज्यादा हैं, और प्रसार संख्या भी। पर अंग्रेजी अखबारों में वेतन ज्यादा है और काम करने वालों का मान-सम्मान भी। किसी अन्य भाषा के समाचार पत्रों ने नहीं हिंदी पत्रकारिता ने देश को आवाज दी, स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका निभाई, सामाजिक चेतना पैदा की और करोड़ों लोगों तक खबर पहुंचाई। लेकिन आज हिंदी पत्रकारिता को भी अपनी भाषा के लिए प्रमाणपत्र चाहिए। हर साल 30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाते हैं। हिंदी की वकालत करने वाले भी इसका विरोध नहीं करते और “हिंदी हिंदू हिंदुस्तान” का नारा लगाने वाले भी कि हिंदुस्तान में हिंदी पत्रकारिता दिवस क्यों, अंग्रेजी पत्रकारिता दिवस क्यों नहीं? हमारे बचपन में अंग्रेजी हटाओ आंदोलन हुआ था। आंदोलन शुरू करने वाले खत्म हो गए पर अंग्रेजी प्रेम बढ़ता जा रहा है।
दरअसल हम हिंदी बोलने में शर्माने लगे हैं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि हिंदी हमारी मातृभाषा कम और अपराधबोध ज्यादा हो गई है।
हमारे बाप-दादा जिस चीज को पखाना कहते थे, हमारे बच्चे उसे टॉयलेट कहते हैं।
पता नहीं इसमें सफाई किसकी हुई, शब्द की या हमारी मानसिकता की!
हिंदी के साथ हमारा यह प्रेम भी बड़ा विचित्र है।
हम कहते हैं हिंदी हमारी मातृभाषा है लेकिन चाहते हैं कि वो ककहरा बाद में जानें एबीसीडी पहले।
हर साल की तरह इस साल भी हिंदी फिर अगले साल 14 सितंबर का इंतजार करेगी।
सोचिए, जिस भाषा को जीवित रखने के लिए साल में एक दिन दिवस या पखवाड़े की जरूरत पड़ती है, उसकी हालत कितनी “मजबूत” होगी!
वैसे हिंदी को लेकर हमारी स्थिति बड़ी दिलचस्प है। हम हिंदी बोलते हैं, हिंदी में गालियां देते हैं, हिंदी में झगड़ते हैं, हिंदी में प्यार करते हैं और हिंदी में राजनीति भी करते हैं। लेकिन जैसे ही किसी दुकान का बोर्ड लगाना हो, बच्चे का नाम रखना हो या किसी पद का परिचय देना हो, अचानक अंग्रेजी याद आ जाती है। फ़िर उसका क्या करिएगा जिस देश में अंग्रेजी के लिए एक नंबर का बटन दबाने को कहा जाता है और हिंदी के लिए दो नंबर का….
बहरहाल… औरों की तरह हम भी होली, दिवाली, दशहरा, स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस की बधाई-शुभकानाएं हैप्पी में देते उसी तरह हिंदी दिवस हैप्पी हिंदी डे नहीं कहेंगे। आज़ हिंदी में कलेवा कलेवा करेंगे, दोपहर और रात में भोजन ग्रहण करेंगे, हिंदी ओढ़ेंगे, हिंदी बिछाएंगे। आज़ बच्चे को एबीसीडी नहीं “ककहरा” पढ़ाएंगे। वो-वो हिंदी में करेंगे ज़ो-ज़ो पहले अंग्रेजी में किया करते थे। (लेखक के विचार निजी हैं)
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अरुण श्रीवास्तव देहरादून
8218070103.
