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काम बोलता है, भाषा नहीं

—गोविंद प्रसाद बहुगुणा

आप कोई भी भाषा बोलिए, कितने ही लच्छेदार भाषण दीजिए, लेकिन जब तक आपके भीतर किसी जरूरतमंद के प्रति सहज करुणा और सहानुभूति नहीं है और आप उसकी सहायता के लिए हाथ नहीं बढ़ाते, तब तक लोगों से की गई आपकी ‘मन की बात’ ढोंग से अधिक कुछ नहीं। वह एकालाप तो हो सकता है, संवाद नहीं।

किसी संत ने ठीक ही कहा है कि दयालुता और सहायता ऐसी भाषा है, जिसे अंधे भी देख सकते हैं और बहरे भी सुन सकते हैं। इस भाषा में शब्द नहीं, आपका काम बोलता है।

भारत की आम जनता भी भाषणों से अधिक काम की यही भाषा समझती है। वह आपकी बात तभी समझेगी, जब आप उसके दुख-दर्द को समझेंगे और उसके जीवन को बेहतर बनाने के लिए सच्चे मन से कोई सार्थक और ठोस प्रयास करेंगे। अन्यथा प्रचार केवल शोर बनकर रह जाता है—भाषा नहीं। वह ऐसा अप्रिय शोर है, जिसका लोगों के जीवन से कोई संवाद नहीं बनता।

इससे बहुत फर्क नहीं पड़ता कि आपकी राजभाषा क्या है। पहले इस ‘राज’ को समझिए कि जनता के मन तक पहुंचने की असली भाषा क्या है। उसकी पीड़ा को समझना, जरूरत के समय उसके साथ खड़ा होना और बिना दिखावे के उसकी सहायता करना ही वह भाषा है, जिसे किसी अनुवाद की जरूरत नहीं पड़ती।

गांधीजी के जीवन से जुड़ा एक प्रसंग इसी बात को बहुत सरलता से समझाता है। जेल में उनके साथ एक अफ्रीकी कैदी था। गांधीजी उसकी भाषा नहीं समझते थे और वह गांधीजी की भाषा नहीं जानता था। लेकिन जब गांधीजी ने उसके घाव साफ किए और उन पर मरहम-पट्टी की, तो दोनों के बीच भाषा की दीवार अपने आप गिर गई। वह कैदी उनका मित्र बन गया।

यही मनुष्य की सबसे पुरानी और सबसे विश्वसनीय भाषा है—करुणा, सहानुभूति और सेवा की भाषा। इसमें बड़े शब्दों, लंबे भाषणों या भारी-भरकम नारों की जरूरत नहीं होती।

आखिरकार आदमी यह नहीं याद रखता कि आपने उससे किस भाषा में क्या कहा था; वह यह याद रखता है कि जरूरत के समय आपने उसके लिए क्या किया था।

इसलिए भाषा से पहले काम को बोलने दीजिए। क्योंकि शब्दों को समझने के लिए भाषा जाननी पड़ती है, लेकिन करुणा और सहायता को समझने के लिए केवल मनुष्य होना ही काफी है।

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