आस्था ने बनाई अपनी राह, बिना सरकारी सहारे होमकुंड पहुंची नंदा बड़ीजात

सरकार और राजजात समिति के रुख के बावजूद हजारों श्रद्धालुओं ने पूरी की कठिन यात्रा, सुविधाओं की कमी ने उठाए कई सवाल
–हरेंद्र बिष्ट की रिपोर्ट-
थराली/नंदाधाम कुरूड़, 21 सितम्बर। न सरकार की चली और न ही नंदा राजजात समिति के झंडाबरदारों की। चली तो उन हजारों नंदा भक्तों की, जिन्हें अपनी आराध्य नंदा पर अटूट आस्था थी। इन श्रद्धालुओं को न राजनीति से कोई लेना-देना था और न किसी आर्थिक लाभ की चाह। उनकी एक ही अभिलाषा थी—12 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद माता नंदा की कैलाश विदाई के साक्षी बनना। तमाम बाधाओं के बावजूद वे इसमें सफल भी हुए। यात्रा को विफल करने के लिए चमोली प्रशासन को भी गुमराह किया गया।
लोगों का मानना है कि इस कठिनतम यात्रा को मिली आशातीत सफलता के बाद इस जात (यात्रा) पर जबरन चिपकाया गया सामंती “राज” शब्द शायद ही आगे चल पाएगा।

बिना सरकारी सहयोग के प्रतिदिन मीलों लंबे और दुर्गम पैदल रास्तों, नालों और गदेरों को पार करते हुए श्रद्धालु नंदा-भगवती के जयकारों के साथ यात्रा के अंतिम लक्ष्य होमकुंड तक पहुंचे। वहां माता नंदा की कैलाश विदाई की धार्मिक प्रक्रिया अपनी आंखों से देखकर वे स्वयं को धन्य मान रहे हैं। श्री नंदादेवी बड़ीजात यात्रा-2026 में शामिल श्रद्धालुओं ने यह भी साबित किया कि दृढ़ आस्था और संकल्प के आगे कठिनाइयां छोटी पड़ सकती हैं।
कई मायनों में 2026 की यह बड़ीजात लंबे समय तक याद की जाएगी। यात्रा पूरी करने वाले श्रद्धालु आने वाली पीढ़ियों को इसके खट्टे-मीठे अनुभव सुनाएंगे। वे बताएंगे कि किस तरह पर्याप्त सरकारी सुविधाओं के अभाव में अपने संसाधनों और हौसले के बल पर उन्होंने इस ऐतिहासिक देवयात्रा को पूरा किया।

अब जब यात्रा अपने अंतिम पड़ावों की ओर है, तब राज्य सरकार के रुख और राजजात समिति द्वारा उच्च हिमालय में प्रतिकूल मौसम, सड़कों एवं पैदल मार्गों की दुर्दशा तथा निर्जन पड़ावों पर आवास, भोजन, पेयजल, शौचालय और दूसरी बुनियादी सुविधाओं की कमी को लेकर पूर्व में जताई गई आशंकाओं पर चर्चा होना स्वाभाविक है। इस सबके बीच यात्रियों को इस बात का संतोष भी है कि उन्होंने कठिन परिस्थितियों में यात्रा पूरी की और मौसम ने उनका भरपूर साथ दिया।
पिछली राजजात यात्राओं से जुड़े लोगों के अनुसार 1987, 2000 और 2014 में यात्रियों को प्रतिकूल मौसम का सामना करना पड़ा था। इसके विपरीत इस बार उच्च हिमालय में अधिकांश समय खुले और खुशगवार मौसम ने श्रद्धालुओं को रोमांचित कर दिया। वेदनी से रूपकुंड और होमकुंड तक हिमालय का ऐसा साफ स्वरूप देखकर यात्री अभिभूत रहे।
2026 से 2027 हुई राजजात, लेकिन बड़ीजात नहीं रुकी
पिछले दो-तीन वर्षों से श्री नंदादेवी राजजात-2026 को हिमालयी सचल महाकुंभ के रूप में आयोजित करने की तैयारियों और प्रचार ने देश-विदेश के नंदा भक्तों का ध्यान इस यात्रा की ओर खींचा था। राजजात का दिनपट्टा बसंत पंचमी को नौटी से जारी किया जाना प्रस्तावित था, लेकिन इससे कुछ दिन पहले राजजात समिति ने कर्णप्रयाग में पत्रकार वार्ता कर यात्रा को 2026 के बजाय 2027 में आयोजित करने की बात कही।
समिति की ओर से मलमास, यात्रा के सितंबर में उच्च हिमालयी क्षेत्रों तक पहुंचने और उस दौरान संभावित बर्फबारी सहित कई कारण बताए गए। अचानक लिए गए इस फैसले से नंदा भक्तों में निराशा फैल गई। श्रद्धालुओं की ओर से पुनर्विचार की मांग के बावजूद राजजात समिति 2027 में यात्रा कराने के निर्णय पर कायम रही।
इधर नंदा सिद्धपीठ कुरूड़ से बड़ीजात समिति ने बसंत पंचमी पर अपना दिनपट्टा जारी कर यात्रा की तैयारियां जारी रखीं। बड़ीजात समिति कुरूड़ यात्रा को सफल बनाने में जुटी रही। अंततः दशोली, बंड, ज्वाल्पा सहित विभिन्न क्षेत्रों की देव डोलियां, छंतोलियां और चौसिंगा खांडू यात्रा में आगे बढ़े।
परगना बधाण की राजराजेश्वरी नंदा देवी की डोली वेदनी में लोकजात संपन्न करने के बाद छह माह के प्रवास के लिए देवराड़ा-थराली लौट गई। इसके विपरीत दशोली, बंड और ज्वाल्पा की डोलियों के साथ बड़ी संख्या में छंतोलियां, चौसिंगा खांडू और श्रद्धालु वेदनी से आगे बढ़े। कठिन उच्च हिमालयी निर्जन पड़ावों को पार करते हुए वे होमकुंड पहुंचे और वहां बड़ीजात की धार्मिक परंपराएं संपन्न की गईं। खास बात यह भी रही कि बधाण की डोली के साथ वेदनी तक पहुंचे अनेक श्रद्धालु वहां से बड़ीजात में शामिल होकर होमकुंड तक गए।
यात्रा मार्ग पर खराब रास्तों, उफनते नालों-गदेरों तथा निर्जन पड़ावों पर पेयजल, शौचालय और चिकित्सा जैसी बुनियादी सुविधाओं के अभाव के बावजूद जिस संख्या में श्रद्धालु उच्च हिमालय पहुंचे, उसने यात्रा को विशिष्ट बना दिया। बड़ी संख्या में यात्रियों ने अपने संसाधनों पर निर्भर रहते हुए यात्रा पूरी की।
बताया जा रहा है कि 2000 और 2014 की राजजात में सरकारी स्तर पर व्यापक व्यवस्थाओं के बावजूद उच्च हिमालयी क्षेत्र तक पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की संख्या भी लगभग इसी स्तर की थी। हालांकि 2026 की बड़ीजात में यात्रियों की वास्तविक संख्या का आधिकारिक आंकड़ा सामने आना अभी बाकी है। इस बार सरकारी स्तर पर यात्रा का प्रचार नहीं हुआ, फिर भी श्रद्धालुओं की भारी भागीदारी ने नंदा के प्रति लोकआस्था की गहराई को उजागर किया।
निर्जन पड़ावों पर शौचालय और पानी तक का अभाव
बड़ीजात ने उच्च हिमालय में स्वच्छता और बुनियादी व्यवस्थाओं को लेकर गंभीर सवाल भी खड़े किए हैं। कुरूड़ से यात्रा शुरू होने के बाद ग्रामीण क्षेत्रों और कस्बों में स्थानीय लोगों की मदद से यात्रियों को काफी हद तक शौचालय जैसी सुविधाएं मिलती रहीं, लेकिन उच्च हिमालय पहुंचते ही स्थिति बदल गई।
गैरोलीपातल, वेदनी बुग्याल, आली बुग्याल, पातरनचौनियां, कैलवाविनायक, बगुवावासा, जामुन डाली, लाटा खोपड़ी और तातड़ा जैसे निर्जन क्षेत्रों में हजारों यात्रियों के पहुंचने के बावजूद पर्याप्त अस्थायी शौचालय उपलब्ध नहीं थे। ऐसे में महिला और पुरुष यात्रियों को खुले में शौच के लिए मजबूर होना पड़ा। इससे संवेदनशील बुग्यालों और उच्च हिमालयी पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका भी पैदा हुई।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के स्वच्छ भारत अभियान के तहत खुले में शौच से मुक्ति के लक्ष्य के संदर्भ में भी यह स्थिति सवाल खड़े करती है। कई पड़ावों पर पर्याप्त पेयजल व्यवस्था नहीं होने के कारण यात्रियों को दूर स्थित प्राकृतिक स्रोतों, नालों और गदेरों से पानी लाना पड़ा।
अब 2026 की यात्रा टालने के कारणों पर उठ रहे सवाल
बड़ीजात के निर्विघ्न अंतिम चरण में पहुंचने और अधिकांश श्रद्धालुओं के वापसी मार्ग पर निकल जाने के बाद अब यह सवाल भी उठ रहा है कि 2026 की प्रस्तावित राजजात को 2027 तक टालने के पीछे बताए गए कारणों का पुनर्मूल्यांकन होगा या नहीं।
राजजात समिति ने मौसम, बर्फबारी और अन्य परिस्थितियों को आधार बनाकर यात्रा स्थगित करने का निर्णय लिया था। दूसरी ओर बड़ीजात उन्हीं उच्च हिमालयी क्षेत्रों से गुजरते हुए होमकुंड तक पहुंच गई। इस बार मौसम भी अपेक्षाकृत अनुकूल रहा। हालांकि किसी एक वर्ष के अनुकूल मौसम को भविष्य की परिस्थितियों का निश्चित आधार नहीं माना जा सकता, फिर भी श्रद्धालु यह जानना चाहते हैं कि 2026 की यात्रा स्थगित करने के निर्णय के पीछे कौन-कौन से प्रशासनिक, धार्मिक और व्यावहारिक कारण निर्णायक रहे थे। अब नौटी और कांसवा की राजजात के अस्तित्व का ही सवाल खड़ा हो गया है। नंदा भक्तो का दावा है कि किसी जमाने में बड़ी जात के नाम से ही यह यात्रा चलती थी लेकिन सामंतवाद को जिंदा रखने के लिए यात्रा को राजजात नाम दिया गया। राजगद्दी टेहरी चली गयी और सैकड़ों सालों में राजाओं की लाखों संतानें जहां तहां बस गयीं।
पुलिस-प्रशासन के व्यवहार की यात्रियों ने की सराहना
यात्रा के अंतिम चरण में प्रशासनिक सक्रियता बढ़ी और पुलिस, प्रशासन तथा एसडीआरएफ के जवान बड़ीजात और लोकजात मार्ग पर सक्रिय दिखाई दिए। सीमित संसाधनों के बीच अधिकारियों और जवानों ने यात्रियों की सहायता की।
श्रद्धालुओं के अनुसार पुलिस, प्रशासन और एसडीआरएफ के जवानों का व्यवहार सहयोगपूर्ण और आत्मीय रहा। कठिन यात्रा के अंतिम चरणों में उनकी मौजूदगी से यात्रियों को राहत मिली। इस कारण व्यवस्थागत कमियों पर सवाल उठाने वाले श्रद्धालुओं ने भी मौके पर तैनात अधिकारियों, पुलिसकर्मियों और बचाव दलों के प्रयासों की सराहना की।
कुल मिलाकर नंदादेवी बड़ीजात-2026 केवल एक धार्मिक यात्रा बनकर नहीं रह गई। इसने एक ओर हिमालयी समाज की नंदा के प्रति गहरी आस्था और श्रद्धालुओं के असाधारण संकल्प को सामने रखा, तो दूसरी ओर उच्च हिमालयी धार्मिक यात्राओं के प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता, सुरक्षा और सरकार तथा परंपरागत यात्रा समितियों की भूमिका से जुड़े कई ऐसे सवाल छोड़ दिए हैं, जिन पर यात्रा समाप्त होने के बाद गंभीर मंथन जरूरी होगा।
