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चंद्रमा पर मिला नया विशाल गड्ढा, भविष्य की मानव बस्तियों के लिए नई चेतावनी

 

728 फीट चौड़े नए गड्ढे ने उठाया सवाल—चंद्रमा पर बनने वाले मानव ठिकानों को अंतरिक्ष से आने वाली चट्टानों और उनके मलबे से कैसे बचाया जाएगा

Robin George Andrews

रॉबिन जॉर्ज एंड्रयूज

चंद्रमा हमें शांत और लगभग अपरिवर्तित दिखाई देता है, लेकिन उसकी सतह लगातार अंतरिक्ष से आने वाले छोटे-बड़े पिंडों की मार झेलती रहती है। क्षुद्रग्रहों और धूमकेतुओं के टुकड़े चंद्रमा से टकराते हैं और उसकी सतह पर नए क्रेटर बनाते रहते हैं। अब एक नए विशाल क्रेटर की खोज ने भविष्य में वहां बनने वाले मानव ठिकानों की सुरक्षा को लेकर वैज्ञानिकों का ध्यान खींचा है।

नासा के अनुसार चंद्रमा पर कम से कम वर्ष 2009 के बाद का सबसे बड़ा नया क्रेटर खोजा गया है। यह करीब 728 फीट चौड़ा है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस आकार का क्रेटर बनाने वाली टक्कर औसतन लगभग 132 वर्ष में एक बार हो सकती है। ऐसी घटनाएं भले ही दुर्लभ हों, लेकिन चंद्रमा पर लंबे समय तक मनुष्य की मौजूदगी की योजना को देखते हुए इनके जोखिम को समझना जरूरी हो गया है।

नासा के लूनर रिकॉनिसेंस ऑर्बिटर से प्राप्त तस्वीरों का अध्ययन करते समय वैज्ञानिकों को यह क्रेटर दिखाई दिया। पुरानी और नई उपग्रह तस्वीरों की तुलना से पता चला कि यह पहले वहां मौजूद नहीं था।

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि करीब 30 से 70 फीट चौड़ा कोई अंतरिक्ष पिंड 2024 के वसंत में तेज गति से चंद्रमा की सतह से टकराया था। इस टक्कर से लगभग 15,500 टन टीएनटी के बराबर ऊर्जा निकली होगी।

इस नए क्रेटर का नाम चंद्र वैज्ञानिक टॉम मैकगेटचिन के नाम पर ‘मैकगेटचिन क्रेटर’ रखा गया है। यह चंद्रमा के पूर्वी किनारे के पास स्थित ‘सी ऑफ क्राइसिस’ के निकट है। इस क्षेत्र में करीब 345 मील तक फैला प्राचीन जमे हुए लावा का मैदान है। क्रेटर की खोज से संबंधित निष्कर्ष ‘साइंस एडवांसेज’ में प्रकाशित दो अध्ययनों में सामने आए हैं।

Before and after views of the impact, showing the L.R.O.’s wide-angle camera view in black and white, with the impact circled, and a thermal camera image, right. The flashing dark blue blip reveals a four-mile-wide “cold spot” around the crater.Credit…NASA Goddard/Intuitive Machines/Robert Wagner; NASA Goddard/UCLA/JHU APL

 

यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड के ग्रहीय भूभौतिकीविद् निकोलस श्मेर के अनुसार आधुनिक समय के संदर्भ में यह असाधारण रूप से बड़ा नया क्रेटर है। न्यू मैक्सिको विश्वविद्यालय के भौतिक विज्ञानी और अंतरिक्ष पिंडों की टक्कर के विशेषज्ञ मार्क बोसलाउ ने भी इस खोज को महत्वपूर्ण बताया है।

इस खोज का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि अमेरिका और चीन दोनों भविष्य में चंद्रमा पर लंबे समय तक मानव उपस्थिति की योजना पर काम कर रहे हैं। आने वाले वर्षों में चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र में ऐसे ठिकाने बनाने की योजनाएं हैं, जहां अंतरिक्ष यात्री कई सप्ताह या महीनों तक रह सकें। ऐसी स्थिति में यह जानना आवश्यक है कि छोटे-बड़े अंतरिक्ष पिंड कितनी बार चंद्रमा से टकराते हैं और उनका प्रभाव कितने बड़े क्षेत्र तक पहुंच सकता है।

पृथ्वी भी लगातार अंतरिक्ष से आने वाले पिंडों का सामना करती है, लेकिन उसका वायुमंडल सुरक्षा कवच की तरह काम करता है। लगभग 30 फीट व्यास तक के बहुत से पिंड वायुमंडल में प्रवेश करते समय धीमे पड़ जाते हैं या जलकर नष्ट हो जाते हैं। बड़े पिंड वायुमंडल में विस्फोट कर शक्तिशाली दबाव तरंगें पैदा कर सकते हैं।

चंद्रमा के पास पृथ्वी जैसा घना वायुमंडल नहीं है। इसलिए वहां छोटे अंतरिक्ष पिंड भी बिना किसी बड़ी बाधा के सतह तक पहुंच सकते हैं। कभी-कभी पुराने रॉकेटों के हिस्से भी उसकी सतह से टकराते हैं, जबकि प्राकृतिक अंतरिक्ष चट्टानों की टक्कर लगातार होती रहती है।

चंद्रमा की निगरानी करने वाले उपग्रहों और पृथ्वी पर स्थित दूरबीनों ने उसकी सतह पर कई बार क्षणिक चमक दर्ज की है। ये चमक अंतरिक्ष पिंडों के टकराने से पैदा होती हैं। उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर वैज्ञानिकों का अनुमान है कि बड़े वाहन के टायर के आकार के पिंड हर वर्ष लगभग 140 ऐसे क्रेटर बना सकते हैं, जिनका व्यास करीब 30 फीट होता है।

किसी चंद्र ठिकाने पर ऐसे पिंड के सीधे गिरने की संभावना बहुत कम होगी, लेकिन इसे पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। इससे भी महत्वपूर्ण खतरा अपेक्षाकृत छोटी चट्टानों से हो सकता है, जो अत्यधिक गति से सतह से टकराती हैं। चंद्रमा पर लंबे समय तक रहने की स्थिति में इस जोखिम को ध्यान में रखकर ही भवनों, उपकरणों और जीवनरक्षक प्रणालियों को तैयार करना होगा।

नए क्रेटर ने एक दूसरे खतरे की ओर भी ध्यान खींचा है। किसी क्षुद्रग्रह को नुकसान पहुंचाने के लिए मानव बस्ती पर सीधे गिरना जरूरी नहीं है। टक्कर के समय चंद्र सतह से बड़ी मात्रा में चट्टानें और धूल उछलती हैं। इसे ‘इजेक्टा’ कहा जाता है। ये चट्टानें मूल क्रेटर से दूर जाकर दोबारा सतह से टकराती हैं और छोटे क्रेटर बना सकती हैं।

Officials named the crater McGetchin, after Tom McGetchin, a lunar scientist, and scientists estimate that it was made between April 11 and May 22, 2024.Credit…NASA Goddard/Intuitive Machines

 

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, लॉस एंजिल्स की शोधार्थी एलिशा झोती के अनुसार टक्कर से उछलने वाले मलबे में अलग-अलग आकार की चट्टानें शामिल होती हैं, जो स्वयं नए क्रेटर बना सकती हैं। ऐसे में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यह मलबा मूल टक्कर वाले स्थान से कितनी दूर तक पहुंच सकता है।

नए मैकगेटचिन क्रेटर के अध्ययन से इसका कुछ उत्तर मिला है। अधिकांश मलबा क्रेटर के आसपास जमा हुआ, लेकिन टक्कर से निकले पदार्थ की धारियां 60 मील से भी अधिक दूरी तक फैली पाई गईं। इनमें बड़ी चट्टानों के साथ बड़ी संख्या में छोटे पत्थर भी शामिल थे। उन्होंने मुख्य टक्कर स्थल से काफी दूर तक चंद्र सतह को प्रभावित किया।

इसका अर्थ है कि भविष्य का कोई चंद्र आधार किसी क्षुद्रग्रह के सीधे निशाने पर न होने के बावजूद पास या दूर हुई बड़ी टक्कर से निकले तेज रफ्तार मलबे की चपेट में आ सकता है। इसलिए केवल सीधे टकराव की संभावना का आकलन पर्याप्त नहीं होगा। वैज्ञानिकों और अभियंताओं को द्वितीयक मलबे के खतरे को भी सुरक्षा योजनाओं में शामिल करना होगा।

एक अन्य समस्या छोटे अंतरिक्ष पिंडों का पहले से पता लगाना है। बड़े क्षुद्रग्रहों की तुलना में कुछ दसियों फीट चौड़ी चट्टानों को टक्कर से काफी पहले पहचानना कठिन होता है। नया क्रेटर बनाने वाला पिंड भी इसी श्रेणी का था। ऐसी वस्तुओं का समय रहते पता न चलने पर उन्हें अंतरिक्ष में ही दूसरी दिशा में मोड़ने के लिए पर्याप्त समय मिलना मुश्किल हो सकता है।

चंद्रमा पर स्थायी या अर्धस्थायी मानव बस्तियां बनाने की योजनाओं के बीच यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है कि वहां सुरक्षा का अर्थ केवल विकिरण, अत्यधिक तापमान और सूक्ष्म उल्कापिंडों से बचाव नहीं होगा। बड़े प्रभावों से निकलने वाले मलबे और छोटे लेकिन तेज गति वाले अंतरिक्ष पिंडों को भी आधारों की संरचना और स्थान के चयन में ध्यान में रखना होगा।

मैकगेटचिन क्रेटर इस बात का नया उदाहरण है कि चंद्रमा भूगर्भीय दृष्टि से भले अपेक्षाकृत शांत दिखाई देता हो, लेकिन उसकी सतह अंतरिक्ष से होने वाली टक्करों के लिए खुली है। भविष्य में मनुष्य यदि वहां लंबे समय तक रहने जा रहा है तो चंद्र बस्तियों की योजना बनाते समय इस जोखिम को भी उतनी ही गंभीरता से समझना होगा।

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