नाना पाटेकर : जिसने पर्दे पर व्यवस्था को ललकारा और जीवन में समाज का दर्द जिया
For decades, Indian cinema dictated that a leading man must possess a handsome face, an alluring persona, and an unmistakable romantic flair. Nana Patekar dismantled this illusion entirely with the sheer force of his craft. He bore the unassuming face of an everyman and spoke with the blistering cadence of an outraged citizen. His personality radiated an unapologetic rawness, standing in stark contrast to the synthetic, manufactured glamour of the film industry. Yet, he carved out a sanctuary in the hearts of audiences, claiming a revered space that eluded many celebrated, conventional superstars. In his performances, he didn’t merely deliver dialogue; he became a vessel for society’s collective angst. He articulated a visceral resistance against injustice and laid bare the profound, agonizing internal conflicts of the human spirit. His passing on October 8 at the age of 75 marks a monumental loss for Indian cinema. With his departure, the industry loses a fiercely original school of acting—a singular style that many may attempt to imitate, but none will ever truly replace.

— जयसिंह रावत —
भारतीय सिनेमा में नायक होने के लिए सुंदर चेहरा, आकर्षक व्यक्तित्व और रोमांटिक अंदाज कभी लगभग अनिवार्य माने जाते थे। नाना पाटेकर ने इस धारणा को अपने अभिनय से ध्वस्त कर दिया। उनका चेहरा आम आदमी का था, बोलने का अंदाज किसी नाराज नागरिक जैसा और व्यक्तित्व में ऐसी अक्खड़ता थी, जो फिल्मी दुनिया के बनावटी आकर्षण से मेल नहीं खाती थी। फिर भी उन्होंने दर्शकों के मन में वह स्थान बनाया, जिसे अनेक लोकप्रिय सितारे भी हासिल नहीं कर सके। उनके अभिनय में केवल संवाद नहीं बोलते थे, बल्कि समाज की बेचैनी, अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध और मनुष्य के भीतर चलने वाला द्वंद्व भी मुखर होता था। आठ अक्टूबर को 75 वर्ष की आयु में उनका निधन भारतीय सिनेमा के लिए इसलिए बड़ी क्षति है कि उनके साथ अभिनय की एक ऐसी मौलिक शैली विदा हुई, जिसकी नकल तो संभव है, लेकिन उसका विकल्प खोजना कठिन होगा।
सामान्य चेहरे की असाधारण यात्रा
एक जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के मुरुड-जंजीरा में जन्मे नाना पाटेकर का वास्तविक नाम विश्वनाथ पाटेकर था। परिवार की आर्थिक कठिनाइयों ने उन्हें किशोरावस्था में ही जीवन के संघर्षों से परिचित करा दिया। मुंबई के सर जे.जे. इंस्टीट्यूट ऑफ एप्लाइड आर्ट में शिक्षा और मराठी रंगमंच से जुड़ाव ने उनकी रचनात्मक प्रतिभा को दिशा दी। रंगमंच उनके लिए अभिनय की पाठशाला साबित हुआ। यहां उन्होंने सीखा कि किसी चरित्र को प्रभावशाली बनाने के लिए ऊंची आवाज या नाटकीय हावभाव आवश्यक नहीं होते। कभी एक दृष्टि, चेहरे की सिकुड़न या संवाद के बीच का मौन भी बहुत कुछ कह सकता है।वर्ष 1978 में गमन से हिंदी फिल्मों में प्रवेश करने वाले नाना को तत्काल लोकप्रियता नहीं मिली। मीरा नायर की चर्चित फिल्म सलाम बॉम्बे! (1988) में भी उन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। वह व्यावसायिक सिनेमा और समानांतर सिनेमा के बीच ऐसी जगह बनाते गए, जहां लोकप्रियता के साथ अभिनय की गंभीरता भी बनी रही।
परिंदा से क्रांतिवीर तक : विद्रोह के अनेक चेहरे
विधु विनोद चोपड़ा की परिंदा (1989) नाना के अभिनय जीवन में निर्णायक मोड़ थी। अपराधी अन्ना की भूमिका में उन्होंने भय और क्रूरता के साथ असुरक्षा तथा मानसिक विचलन का ऐसा मिश्रण प्रस्तुत किया, जिसने हिंदी फिल्मों के खलनायक की स्थापित छवि बदल दी। इस अभिनय के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला .इसके बाद अंगार, तिरंगा, क्रांतिवीर, अग्निसाक्षी, यशवंत, अपहरण और अब तक छप्पन जैसी फिल्मों में उनकी प्रतिभा के अलग-अलग आयाम सामने आए। वर्ष 1994 की क्रांतिवीर विशेष उल्लेखनीय है। प्रताप नारायण तिलक के रूप में नाना ने भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता और राजनीतिक पाखंड के विरुद्ध सामान्य नागरिक के आक्रोश को आवाज दी। यह किरदार उस भारतीय की पीड़ा का प्रतिनिधि बन गया, जो व्यवस्था से नाराज तो है, लेकिन उसे बदलने की शक्ति अपने भीतर तलाश रहा है। इस भूमिका के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। राष्ट्रीय पुरस्कार की आधिकारिक टिप्पणी में भी उनके अभिनय की उस विशेषता को रेखांकित किया गया था, जो सामान्य मनुष्य की सुप्त शक्ति को जागृत करती है।
अभिनय में आक्रोश ही नहीं, करुणा भी
नाना की लोकप्रिय पहचान उनके तीखे संवाद और आक्रामक अभिनय से बनी, लेकिन उनकी कला का वास्तविक विस्तार इससे कहीं अधिक था। अग्निसाक्षी में एक अस्थिर और अधिकारवादी पति का चरित्र हो या खामोशी : द म्यूजिकल में एक संवेदनशील पिता की भूमिका, उन्होंने मानवीय संबंधों के जटिल पक्षों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। अब तक छप्पन में पुलिस अधिकारी साधु आगाशे का उनका अभिनय विशेष रूप से उल्लेखनीय था। यहां कठोरता के साथ नैतिक दुविधा और पेशेगत संवेदनहीनता का द्वंद्व भी दिखाई देता है।मराठी फिल्म नटसम्राट (2016) ने उनके अभिनय को एक अलग ऊंचाई दी। वृद्ध रंगकर्मी गणपतराव बेलवलकर की भूमिका में उन्होंने प्रसिद्धि के बाद उपेक्षा, पारिवारिक विघटन और वृद्धावस्था के अकेलेपन की पीड़ा को जीवंत कर दिया। यह अभिनय याद दिलाता है कि जीवन भर दूसरों का मनोरंजन करने वाला कलाकार भी अंततः एक संवेदनशील मनुष्य होता है।
जब गंभीर अभिनेता ने दर्शकों को हंसाया
नाना की प्रतिभा की व्यापकता का प्रमाण वेलकम (2007) का उदय शेट्टी भी है। जिस अभिनेता को दर्शक क्रोध और विद्रोह के लिए पहचानते थे, उसने हास्य अभिनय में भी अपनी अलग छाप छोड़ी।वेलकम और वेलकम बैक में उनका हास्य बनावटी चुटकुलों पर निर्भर नहीं था। उनकी संवाद अदायगी, चेहरे की गंभीरता और परिस्थितियों से पैदा होने वाला विरोधाभास ही हास्य का स्रोत बन जाता था। प्रकाश झा की राजनीति में उन्होंने सत्ता और राजनीतिक महत्वाकांक्षा की दुनिया का प्रभावशाली चरित्र निभाया। वहीं रजनीकांत अभिनीत तमिल फिल्म काला में उनकी उपस्थिति ने दक्षिण भारतीय सिनेमा तक उनके अभिनय का विस्तार किया।
प्रहार : कैमरे के पीछे भी अपनी दृष्टि
नाना केवल अभिनेता नहीं, निर्देशक और पटकथा लेखक भी थे। वर्ष 1991 में उनके निर्देशन में बनी प्रहार : द फाइनल अटैक सैन्य अनुशासन, राष्ट्रीय कर्तव्य और सामाजिक उदासीनता जैसे विषयों पर केंद्रित थी। इस फिल्म के लिए उन्होंने सैन्य प्रशिक्षण भी प्राप्त किया। भारतीय सेना के प्रति उनका लगाव आगे भी बना रहा और उन्हें प्रादेशिक सेना में मानद अधिकारी का दर्जा मिला।उनकी फिल्मों में व्यवस्था के प्रति असंतोष दिखाई देता था, लेकिन प्रहार में यह प्रश्न भी था कि नागरिक समाज अपने कर्तव्यों के प्रति कितना सजग है।
किसानों के बीच एक अलग नाना
. फिल्मी लोकप्रियता से अलग नाना पाटेकर की एक महत्वपूर्ण पहचान किसानों के सहयोगी की थी। महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और विदर्भ में सूखे तथा किसानों की आत्महत्याओं ने उन्हें विचलित कियावर्ष 2015 में उन्होंने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ ‘नाम फाउंडेशन’ की स्थापना की। इस संस्था ने प्रभावित किसान परिवारों की सहायता, जल संरक्षण और ग्रामीण विकास के कार्यों में योगदान दिया।नाना स्वयं भी खेती से जुड़े रहे। पुणे के निकट अपने फार्महाउस में खेती-बाड़ी, पशुपालन और ग्रामीण जीवन से उनका गहरा संबंध था। फिल्मी चकाचौंध के बजाय साधारण जीवन के प्रति उनका आकर्षण उनकी सार्वजनिक छवि से अलग एक मानवीय पक्ष सामने लाता था. यहां उनके व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण विरोधाभास दिखाई देता है। पर्दे पर अक्सर क्रोध और कठोरता का प्रतिनिधित्व करने वाला अभिनेता वास्तविक जीवन में संकटग्रस्त किसानों के प्रति संवेदनशील था।
उपलब्धियों और विवादों के बीच
नाना पाटेकर का सार्वजनिक जीवन विवादों से अछूता नहीं रहा। उनके व्यवहार और स्वभाव को लेकर समय-समय पर प्रश्न उठे। अभिनेत्री तनुश्री दत्ता द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों ने भी उन्हें विवादों के केंद्र में रखा। इन आरोपों को नाना ने अस्वीकार किया था और पुलिस ने पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने पर मामले में समापन रिपोर्ट दाखिल की थी।किसी कलाकार का मूल्यांकन करते समय उसकी उपलब्धियों के साथ सार्वजनिक जीवन के इन पक्षों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, विभिन्न फिल्मफेयर सम्मान और वर्ष 2013 में प्राप्त पद्मश्री उनके कलात्मक योगदान की औपचारिक स्वीकृति थे। लेकिन उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि दर्शकों के बीच अपनी अलग पहचान कायम करना
एक अभिनेता नहीं, एक अभिनय दृष्टि की विदाई
आठ अक्टूबर 2026 को गोवा स्थित आवास पर नाना पाटेकर अचेत पाए गए। अस्पताल ले जाए जाने के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। चिकित्सकों के अनुसार उनका निधन हृदय गति रुकने से हुआ। उनके निधन के साथ हिंदी और मराठी सिनेमा ने एक ऐसा कलाकार खो दिया, जिसने अभिनय को प्रचलित नायकत्व की सीमाओं से बाहर निकाला। नाना पाटेकर के भीतर अनेक विरोधाभास थे। वह कठोर भी थे और संवेदनशील भी, विद्रोही भी और अनुशासनप्रिय भी। शायद इन्हीं मानवीय जटिलताओं ने उनके किरदारों को विश्वसनीय बनाया। उनकी विरासत केवल फिल्मों, संवादों और पुरस्कारों में नहीं है। वह इस विचार में भी जीवित रहेगी कि सिनेमा का कलाकार समाज से अलग कोई चमकता हुआ चेहरा मात्र नहीं, बल्कि अपने समय के संघर्षों, विसंगतियों और संवेदनाओं का प्रतिनिधि भी हो सकता है। नाना ने पर्दे पर अनेक जीवन जिए, लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान यही रही कि उन्होंने अभिनय में आम आदमी की आवाज को असाधारण शक्ति प्रदान की।

