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पृथ्वी पर जीवन कैसे शुरू हुआ? चार अरब वर्षों के इतिहास के तीन अनसुलझे रहस्य

 

 

पहला जीव कहाँ पैदा हुआ? साधारण कोशिकाओं ने जटिल जीवन का रूप कैसे लिया? और करोड़ों वर्षों तक सूक्ष्म जीवों तक सीमित रहने वाला जीवन अचानक विशाल प्राणियों के रूप में कैसे विकसित होने लगा? आधुनिक विज्ञान ने पृथ्वी के इतिहास के अनेक रहस्य सुलझाए हैं, लेकिन जीवन की उत्पत्ति और उसके विकास से जुड़े इन तीन बुनियादी सवालों पर वैज्ञानिकों की खोज अब भी जारी है।

 

मूल लेख : विलियम जे. ब्रॉड, केनेथ चांग और कार्ल ज़िमर

पृथ्वी पर जीवन की विविधता जितनी अद्भुत है, उसकी उत्पत्ति की कहानी उससे भी अधिक रहस्यमयी है। एक ओर आँखों से दिखाई न देने वाले सूक्ष्म जीव हैं तो दूसरी ओर विशालकाय नीली व्हेल, हाथी, घने जंगल, रंग-बिरंगे पक्षी और मनुष्य जैसे बुद्धिमान प्राणी। आकार, बनावट, व्यवहार और जीवनशैली में इतना अंतर होने के बावजूद इन सभी के बीच एक गहरा जैविक संबंध है। यह संबंध डीएनए और आरएनए जैसे आनुवंशिक अणुओं का है, जिनके माध्यम से जीवन की विशेषताएँ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचती हैं।

वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी पर आज मौजूद सभी जीवों की वंशावली को बहुत पीछे तक खोजा जाए तो उनका संबंध किसी एक अत्यंत प्राचीन साझा पूर्वज से जुड़ता है। वैज्ञानिक भाषा में इसे ‘लास्ट यूनिवर्सल कॉमन एंसेस्टर’ अर्थात अंतिम सार्वभौमिक साझा पूर्वज या ‘लूका’ कहा जाता है। यह कोई मनुष्य या आधुनिक अर्थों में विकसित जीव नहीं था, बल्कि प्रारंभिक जीवन का एक अत्यंत प्राचीन प्रतिनिधि था।

लेकिन यह साझा पूर्वज स्वयं कैसे अस्तित्व में आया? निर्जीव रसायनों से ऐसी व्यवस्था कैसे बनी जो ऊर्जा ग्रहण कर सके, अपनी प्रतिकृति बना सके और आगे चलकर असंख्य प्रकार के जीवों को जन्म दे सके?

यही वह सवाल है जिसका निश्चित उत्तर विज्ञान के पास आज भी नहीं है।

पृथ्वी लगभग 4.54 अरब वर्ष पहले अस्तित्व में आई थी। जीवन के शुरुआती प्रमाण अरबों वर्ष पुराने हैं, लेकिन जीवन के जन्म की वास्तविक घटना का कोई प्रत्यक्ष अभिलेख उपलब्ध नहीं है। उस समय की परिस्थितियों को समझने के लिए वैज्ञानिक प्राचीन चट्टानों, जीवाश्मों, रासायनिक प्रक्रियाओं और आधुनिक सूक्ष्म जीवों का अध्ययन करते हैं। इन अध्ययनों से जीवन के विकास की एक व्यापक तस्वीर उभरती है, लेकिन उसमें अभी भी अनेक खाली स्थान हैं।

विशेष रूप से तीन घटनाएँ ऐसी हैं जिन्होंने पृथ्वी पर जीवन की दिशा ही बदल दी। पहली, निर्जीव पदार्थों से जीवन का जन्म; दूसरी, साधारण कोशिकाओं से जटिल कोशिकाओं का विकास; और तीसरी, सूक्ष्म जीवों की दुनिया से विशाल बहुकोशिकीय प्राणियों का उदय।

पहला रहस्य : चार अरब वर्ष पहले जीवन ने पहली साँस कहाँ ली?

कल्पना कीजिए कि हम समय में चार अरब वर्ष पीछे पहुँच गए हैं। उस समय पृथ्वी आज जैसी हरी-भरी और जीवन से भरी हुई नहीं थी। उसका वातावरण, महासागर और भूगर्भीय परिस्थितियाँ आज से बहुत अलग थीं। धरती पर न जंगल थे, न पशु-पक्षी और न मनुष्य। ऐसे वातावरण में जीवन का पहला बीज कहाँ और कैसे पड़ा होगा?

इस प्रश्न पर वैज्ञानिक मुख्यतः दो संभावनाओं पर विचार करते रहे हैं। पहली संभावना यह है कि जीवन की शुरुआत पृथ्वी की सतह पर मौजूद किसी गर्म तालाब या उथले जलाशय में हुई। दूसरी संभावना के अनुसार जीवन का जन्म समुद्र की अथाह गहराइयों में स्थित गर्म जलस्रोतों के आसपास हुआ।

सतह पर जीवन की उत्पत्ति की परिकल्पना का इतिहास चार्ल्स डार्विन तक जाता है। वर्ष 1871 में डार्विन ने संभावना व्यक्त की थी कि किसी छोटे गर्म तालाब में अमोनिया, फॉस्फोरस और अन्य रासायनिक पदार्थों के साथ प्रकाश, ऊष्मा तथा बिजली जैसी ऊर्जा के स्रोतों ने ऐसे जटिल अणुओं को जन्म दिया होगा, जिनसे आगे चलकर जीवन विकसित हुआ।

इस विचार को बाद में ‘आदिम रासायनिक मिश्रण’ की परिकल्पना के रूप में प्रसिद्धि मिली।

वर्ष 1953 में अमेरिकी वैज्ञानिक स्टेनली मिलर ने इस संभावना की प्रयोगशाला में जाँच की। उन्होंने पानी, मीथेन, अमोनिया और हाइड्रोजन जैसी गैसों को एक बंद उपकरण में रखकर उसमें बिजली की चिंगारियाँ पैदा कीं। उद्देश्य था पृथ्वी के प्रारंभिक वातावरण में बिजली चमकने जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करना।

कुछ ही दिनों में इस मिश्रण में अमीनो अम्ल बनने लगे। ये वही रासायनिक पदार्थ हैं जिनसे प्रोटीन का निर्माण होता है और जो जीवित कोशिकाओं के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।

यह प्रयोग विज्ञान के इतिहास में एक बड़ी उपलब्धि माना गया। पहली बार प्रयोगशाला में दिखाया गया कि जीवन के लिए आवश्यक कुछ कार्बनिक अणु निर्जीव पदार्थों से प्राकृतिक रासायनिक प्रक्रियाओं के माध्यम से बन सकते हैं।

हालाँकि, इस प्रयोग ने जीवन पैदा नहीं किया था। उसने केवल यह दिखाया था कि जीवन के कुछ बुनियादी निर्माण खंड प्राकृतिक परिस्थितियों में बन सकते हैं।

बाद में वैज्ञानिकों ने प्रारंभिक पृथ्वी के वातावरण की रासायनिक संरचना पर नए सवाल उठाए। इससे मिलर के प्रयोग की वास्तविक परिस्थितियों से समानता को लेकर बहस शुरू हुई। इसी बीच उल्कापिंडों में भी अमीनो अम्ल मिलने लगे। इससे यह संभावना सामने आई कि जीवन के लिए आवश्यक कुछ रसायन अंतरिक्ष से भी पृथ्वी पर पहुँचे होंगे।

क्या समुद्र की गहराइयों में छिपा है जीवन का जन्मस्थान?

जीवन की उत्पत्ति की दूसरी महत्वपूर्ण परिकल्पना वर्ष 1977 की एक खोज से मजबूत हुई। प्रशांत महासागर की गहराइयों का अध्ययन कर रहे वैज्ञानिकों को समुद्र तल पर ऐसे गर्म जलस्रोत मिले, जहाँ पृथ्वी के भीतर से गर्म पानी और विभिन्न रसायन निकल रहे थे।

इन जलस्रोतों के आसपास जीवन की एक बिल्कुल अलग दुनिया मौजूद थी। वहाँ ऐसे जीव पाए गए जो सूर्य के प्रकाश पर निर्भर नहीं थे। वे अपनी ऊर्जा उन रासायनिक प्रक्रियाओं से प्राप्त कर रहे थे जिनका संबंध समुद्र तल से निकलने वाले पदार्थों से था।

यह खोज अत्यंत महत्वपूर्ण थी, क्योंकि तब तक पृथ्वी पर अधिकांश जीवन की ऊर्जा का अंतिम स्रोत सूर्य को माना जाता था।

वैज्ञानिकों ने विचार किया कि यदि समुद्र की गहराइयों में सूर्य के प्रकाश के बिना जीवन संभव है तो क्या प्रारंभिक जीवन भी ऐसी ही परिस्थितियों में पैदा हुआ होगा?

समुद्र तल के गर्म जलस्रोत जीवन की उत्पत्ति के लिए अनुकूल हो सकते थे। वहाँ लगातार रासायनिक ऊर्जा उपलब्ध थी। खनिज पदार्थों की उपस्थिति जटिल रासायनिक प्रतिक्रियाओं को बढ़ावा दे सकती थी। साथ ही समुद्र की गहराइयाँ पृथ्वी की प्रारंभिक सतह पर पड़ने वाले तीव्र विकिरण और अंतरिक्ष से आने वाले पिंडों के प्रभाव से अपेक्षाकृत सुरक्षित रही होंगी।

हाल के अध्ययनों ने इस संभावना को और मजबूत किया है। जर्मनी के हेनरिक हेन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के नेतृत्व में किए गए शोध में निकल, कोबाल्ट और पैलेडियम जैसी धातुओं की संभावित भूमिका पर ध्यान दिया गया। ये धातुएँ रासायनिक उत्प्रेरक के रूप में काम करके जीवन के शुरुआती चयापचय तंत्रों के विकास में सहायक रही होंगी।

दूसरी ओर, सतह पर जीवन की उत्पत्ति के पक्ष में भी नए प्रमाण सामने आए हैं। वर्ष 2009 में मैनचेस्टर विश्वविद्यालय के रसायनज्ञ जॉन सदरलैंड ने दिखाया कि सूर्य की पराबैंगनी ऊर्जा कुछ ऐसे रासायनिक निर्माण मार्गों को संभव बना सकती है जिनसे जीवन के लिए आवश्यक अणु बनते हैं। ऑस्ट्रेलिया के प्राचीन खनिज भंडारों के अध्ययन ने भी गर्म स्थलीय जलस्रोतों की संभावित भूमिका की ओर संकेत किया है।

एरिजोना विश्वविद्यालय की विकासवादी जीवविज्ञानी जोआना मासेल का मानना है कि संभव है दोनों परिकल्पनाओं में कुछ सच्चाई हो। जीवन की उत्पत्ति किसी एक स्थान तक सीमित न रही हो। अलग-अलग परिस्थितियों में जीवन जैसी रासायनिक व्यवस्थाएँ स्वतंत्र रूप से विकसित हुई हों और उनमें से कुछ ही आगे टिक सकी हों।

इस प्रकार पहला रहस्य अभी कायम है। विज्ञान यह समझने के करीब पहुँच रहा है कि जीवन के लिए आवश्यक पदार्थ कैसे बन सकते हैं, लेकिन निर्जीव रसायनों ने पहली जीवित व्यवस्था का रूप कैसे लिया, यह प्रश्न अब भी अनुत्तरित है।

दूसरा रहस्य : दो अरब वर्ष पहले साधारण जीवन अचानक जटिल कैसे बन गया?

पृथ्वी पर जीवन के प्रारंभिक इतिहास का बहुत बड़ा हिस्सा सूक्ष्म जीवों का इतिहास है। अरबों वर्षों तक जीवन मुख्यतः ऐसी छोटी कोशिकाओं के रूप में मौजूद रहा जिनकी आंतरिक संरचना अपेक्षाकृत सरल थी।

लेकिन लगभग दो अरब वर्ष पहले जीवन के विकास में एक असाधारण परिवर्तन हुआ। ऐसी कोशिकाएँ अस्तित्व में आईं जो पहले की कोशिकाओं से कहीं अधिक बड़ी, व्यवस्थित और जटिल थीं।

इन्हें यूकेरियोटिक कोशिकाएँ कहा जाता है।

आज मनुष्य, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे और कवक जैसे जीव इन्हीं कोशिकाओं से बने हैं। इसलिए इनका विकास पृथ्वी के जैविक इतिहास की सबसे निर्णायक घटनाओं में गिना जाता है।

साधारण जीवाणु कोशिका और यूकेरियोटिक कोशिका के बीच अंतर समझना महत्वपूर्ण है। सामान्य जीवाणुओं में डीएनए किसी अलग झिल्ली से घिरे केंद्रक में बंद नहीं होता। इसके विपरीत यूकेरियोटिक कोशिका में एक सुव्यवस्थित केंद्रक होता है, जहाँ आनुवंशिक सामग्री सुरक्षित रहती है।

इसके अलावा यूकेरियोटिक कोशिकाओं में माइटोकॉन्ड्रिया जैसे विशेष अंगक होते हैं, जो ऊर्जा उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कोशिका के भीतर पदार्थों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाने और उसकी आकृति बनाए रखने की भी जटिल व्यवस्था होती है।

सवाल यह है कि इतनी व्यवस्थित कोशिका बनी कैसे?

जब दो अलग जीवों ने मिलकर जीवन की नई दिशा बनाई

आधुनिक शोध से इस रहस्य का एक महत्वपूर्ण सुराग मिला है।

पिछले कुछ वर्षों में वैज्ञानिकों ने सूक्ष्म जीवों के एक समूह की पहचान की है जिन्हें ‘असगार्ड आर्किया’ कहा जाता है। इन जीवों में कुछ ऐसी विशेषताएँ मौजूद हैं जो यूकेरियोटिक कोशिकाओं से मिलती-जुलती हैं, हालाँकि इनमें वास्तविक केंद्रक और माइटोकॉन्ड्रिया नहीं होते।

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि आधुनिक जटिल कोशिकाओं के पूर्वज असगार्ड जैसे प्राचीन सूक्ष्म जीवों से संबंधित रहे होंगे।

एक प्रमुख परिकल्पना के अनुसार, लगभग 2.25 अरब वर्ष पहले किसी असगार्ड जैसे सूक्ष्म जीव और एक जीवाणु के बीच ऐसी साझेदारी विकसित हुई जिसने जीवन की दिशा बदल दी।

इस संबंध में जीवाणु मेजबान कोशिका के भीतर रहने लगा। वह ऊर्जा उत्पादन में योगदान देने लगा और धीरे-धीरे दोनों के बीच इतनी गहरी जैविक निर्भरता बन गई कि वे एक संयुक्त व्यवस्था के रूप में विकसित होने लगे।

लंबे विकासवादी काल में भीतर रहने वाला जीवाणु माइटोकॉन्ड्रिया में बदल गया। यही माइटोकॉन्ड्रिया आज हमारी कोशिकाओं में ऊर्जा उत्पादन का महत्वपूर्ण केंद्र है।

इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक ‘अंतःसहजीवन’ कहते हैं।

यह विचार इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि विकास केवल प्रतिस्पर्धा और प्राकृतिक चयन की कहानी नहीं है। कभी-कभी दो अलग जीवों के बीच सहयोग भी विकास की नई संभावनाओं का रास्ता खोल सकता है।

लेकिन पूरी कहानी अभी स्पष्ट नहीं हुई है।

वैज्ञानिक अब भी यह समझने का प्रयास कर रहे हैं कि कोशिका के केंद्रक जैसी जटिल संरचना कैसे बनी। विभिन्न जीवों के जीन किस क्रम में एक-दूसरे के साथ जुड़े? और यदि सूक्ष्म जीवों के बीच ऐसी साझेदारियाँ संभव थीं तो जटिल यूकेरियोटिक कोशिकाओं की उत्पत्ति इतनी दुर्लभ घटना क्यों प्रतीत होती है?

क्या इसके लिए असाधारण परिस्थितियों की आवश्यकता थी? या पृथ्वी के प्राचीन इतिहास में ऐसे अनेक प्रयोग हुए जो बाद में विलुप्त हो गए?

इन प्रश्नों के उत्तर अभी खोजे जा रहे हैं।

फिर भी एक बात स्पष्ट है। जटिल कोशिकाओं के विकास के बिना आज की जैव विविधता की कल्पना करना कठिन होता। समुद्र के विशाल जीवों से लेकर वर्षावनों के वृक्षों और मानव मस्तिष्क तक, जीवन की असंख्य उपलब्धियों की बुनियाद इसी परिवर्तन में छिपी है।

तीसरा रहस्य : 58 करोड़ वर्ष पहले जीवन का आकार अचानक इतना बड़ा क्यों होने लगा?

जीवन के विकास का तीसरा रहस्य संभवतः सबसे अधिक चौंकाने वाला है।

जटिल कोशिकाओं के अस्तित्व में आने के बाद भी पृथ्वी पर विशाल जीवों का संसार तुरंत विकसित नहीं हुआ। लगभग एक अरब वर्षों तक जीवन का अधिकांश हिस्सा सूक्ष्म स्तर पर ही बना रहा।

पृथ्वी के इतिहास की इस लंबी अवधि को कुछ वैज्ञानिक अनौपचारिक रूप से ‘बोरिंग बिलियन’ अर्थात ‘उबाऊ अरब वर्ष’ कहते हैं।

इसका अर्थ यह नहीं कि उस दौरान विकास पूरी तरह रुक गया था। बल्कि यह कि बाद के युगों की तुलना में बड़े और जटिल जीवों का विकास अपेक्षाकृत सीमित दिखाई देता है।

फिर लगभग 72 करोड़ वर्ष पहले पृथ्वी के पर्यावरण में अत्यंत व्यापक परिवर्तन शुरू हुए।

ग्रह ने ऐसे भीषण हिमयुगों का सामना किया जिनके दौरान बर्फ का विस्तार अत्यंत निम्न अक्षांशों तक पहुँच गया। कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी लगभग पूरी तरह बर्फ से ढक गई थी।

इस अवस्था को ‘स्नोबॉल अर्थ’ अर्थात हिमगोल पृथ्वी कहा जाता है।

कल्पना कीजिए, आज के नीले ग्रह की जगह अंतरिक्ष से एक विशाल सफेद बर्फीला गोला दिखाई दे रहा हो। महासागरों के बड़े हिस्से बर्फ से ढके हों और सूर्य का प्रकाश समुद्री जीवन तक पहुँचने में कठिनाई महसूस कर रहा हो।

ऐसी परिस्थितियों में जीवन का अस्तित्व ही संकट में पड़ सकता था।

लेकिन आश्चर्यजनक रूप से जीवन समाप्त नहीं हुआ।

इन व्यापक हिमाच्छादन घटनाओं के बाद पृथ्वी पर जैविक विकास का एक नया अध्याय शुरू हुआ। बड़े आकार और जटिल संरचना वाले जीवों के प्रमाण अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे।

जब समुद्रों में पहली बार दिखाई देने लगे बड़े जीव

लगभग 63.5 करोड़ वर्ष पहले शुरू हुए और लगभग 54 करोड़ वर्ष पहले समाप्त हुए भूवैज्ञानिक काल को एडियाकरन काल कहा जाता है।

इस अवधि में पृथ्वी पर ऐसे जीव दिखाई देने लगे जिनकी बनावट पहले के सूक्ष्म जीवों से बिल्कुल अलग थी।

कनाडा के न्यूफाउंडलैंड क्षेत्र में स्थित मिस्टेकन पॉइंट जैसे स्थानों से मिले जीवाश्म इस प्राचीन संसार की झलक प्रस्तुत करते हैं।

इनमें कुछ जीव समुद्र तल पर फैले ताड़ के पत्तों जैसे दिखाई देते थे। कुछ गोलाकार थे और कुछ की आकृति शंकु जैसी थी। कई जीव इतने बड़े थे कि उन्हें बिना किसी सूक्ष्मदर्शी के आसानी से देखा जा सकता था।

यह पृथ्वी के इतिहास में जीवन के आकार और संरचना में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन था।

लेकिन यह परिवर्तन क्यों हुआ?

क्या पिघलते हिमनदों ने जीवन को नई ऊर्जा दी?

कनाडा की क्वींस यूनिवर्सिटी के भूवैज्ञानिक गाइ नारबोन के अनुसार, हिमयुगों की समाप्ति ने महासागरों में पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाई होगी।

उनका तर्क है कि विशाल हिमनद जब चट्टानों पर आगे बढ़ते हैं तो उन्हें तोड़ते और घिसते हैं। हिमनदों के पिघलने पर इन चट्टानों से निकले खनिज और अन्य पदार्थ नदियों तथा जलधाराओं के माध्यम से समुद्रों तक पहुँच सकते हैं।

इन पोषक तत्वों ने समुद्री शैवाल और प्रकाश संश्लेषण करने वाले अन्य जीवों की वृद्धि को बढ़ावा दिया होगा। परिणामस्वरूप ऑक्सीजन की उपलब्धता बढ़ी होगी और अधिक ऊर्जा की आवश्यकता वाले बड़े जीवों का विकास संभव हुआ होगा।

हार्वर्ड विश्वविद्यालय के जीवाश्म विज्ञानी एंड्रयू नॉल भी ऑक्सीजन की भूमिका को महत्वपूर्ण मानते हैं, लेकिन वे इसके पीछे एक अलग भूवैज्ञानिक प्रक्रिया की संभावना देखते हैं।

उनके अनुसार, पृथ्वी की विवर्तनिक गतिविधियों में परिवर्तन से विशाल पर्वत शृंखलाओं का निर्माण हुआ होगा। इन पर्वतों के अपरदन से फॉस्फोरस जैसे पोषक तत्व महासागरों तक पहुँचे होंगे।

फॉस्फोरस समुद्री जीवन के लिए महत्वपूर्ण तत्व है। इसकी उपलब्धता बढ़ने से प्रकाश संश्लेषण करने वाले जीवों का विस्तार हुआ होगा और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र में बड़े बदलाव आए होंगे।

इसी दौरान शिकारी जीवों का विकास भी एक निर्णायक कारण बना हो सकता है।

जब कुछ जीव दूसरे जीवों को खाने लगे तो शिकार बनने वाले जीवों पर अपने बचाव के लिए नए तरीके विकसित करने का दबाव बढ़ा होगा। आकार बढ़ाना, शरीर की संरचना बदलना और सुरक्षा के नए साधन विकसित करना इसी विकासवादी प्रतिस्पर्धा का हिस्सा रहे होंगे।

इस प्रकार समुद्री जीवन में एक तरह की विकासवादी होड़ शुरू हुई होगी।

क्या ऑक्सीजन ही इस परिवर्तन की असली वजह थी?

हालाँकि, सभी वैज्ञानिक इस व्याख्या से सहमत नहीं हैं।

दक्षिणी डेनमार्क विश्वविद्यालय के भू-रसायनविद् डोनाल्ड कैनफील्ड का मानना है कि एडियाकरन काल में ऑक्सीजन के स्तर में हुए परिवर्तनों की व्याख्या अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।

उनके अध्ययन के अनुसार, उस समय वायुमंडल में ऑक्सीजन की मात्रा आज की तुलना में काफी कम रही होगी। उनका अनुमान है कि यह वर्तमान स्तर के लगभग 4 से 10 प्रतिशत के बराबर रही होगी।

इसलिए केवल ऑक्सीजन की वृद्धि को बड़े जीवों के विकास का निर्णायक कारण मान लेना जल्दबाजी हो सकती है।

कैंब्रिज विश्वविद्यालय के जीवाश्म जीवविज्ञानी निक बटरफील्ड तो इस पूरी कहानी को एक अलग दृष्टिकोण से देखते हैं।

उनकी परिकल्पना के अनुसार, जटिल जीवों का विकास भीषण हिमयुगों के बाद शुरू होने के बजाय उनसे पहले ही प्रारंभ हो गया होगा।

संभव है कि इन जीवों ने समुद्री खाद्य शृंखलाओं और कार्बन चक्र में इतने बड़े परिवर्तन किए हों कि पृथ्वी की जलवायु पर उनका गहरा प्रभाव पड़ा हो। वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड के हटने और अन्य प्रक्रियाओं के कारण वैश्विक शीतलन को बढ़ावा मिला हो।

इस दृष्टिकोण में हिमयुग जीवन के विस्तार का कारण नहीं, बल्कि पहले से बदल रहे जैविक संसार का एक संभावित परिणाम भी हो सकते हैं।

यह एक विचारोत्तेजक परिकल्पना है, लेकिन इसे अंतिम वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।

जीवन का इतिहास : जितने उत्तर मिले, उतने नए प्रश्न खड़े हुए

पृथ्वी पर जीवन की लगभग चार अरब वर्ष लंबी कहानी में एक बात बार-बार सामने आती है। प्रकृति में परिवर्तन हमेशा एक समान गति से नहीं होते। कभी बहुत लंबे समय तक परिस्थितियाँ अपेक्षाकृत स्थिर दिखाई देती हैं और कभी कुछ महत्वपूर्ण घटनाएँ विकास की दिशा बदल देती हैं।

जीवन की उत्पत्ति, जटिल कोशिकाओं का विकास और बड़े बहुकोशिकीय जीवों का उदय ऐसी ही तीन घटनाएँ हैं।

इनके बारे में वैज्ञानिकों ने अनेक महत्वपूर्ण खोजें की हैं। प्रयोगशालाओं में जीवन के लिए आवश्यक अणुओं के बनने की संभावनाएँ सामने आई हैं। समुद्र की गहराइयों में ऐसे पारिस्थितिक तंत्र मिले हैं जो सूर्य के प्रकाश के बिना भी फल-फूल सकते हैं। सूक्ष्म जीवों के आनुवंशिक अध्ययन से जटिल कोशिकाओं की उत्पत्ति के संकेत मिले हैं। प्राचीन चट्टानों और जीवाश्मों ने यह समझने में मदद की है कि पृथ्वी के पर्यावरण और जीवन के विकास के बीच कितना गहरा संबंध रहा है।

फिर भी यह कहना संभव नहीं है कि वैज्ञानिक जीवन की उत्पत्ति का रहस्य पूरी तरह सुलझा चुके हैं।

एक और महत्वपूर्ण प्रश्न इस पूरी खोज से जुड़ा है। यदि पृथ्वी पर निर्जीव पदार्थों से जीवन उत्पन्न हो सकता था, तो क्या ब्रह्मांड के अन्य ग्रहों या उपग्रहों पर भी ऐसा हुआ होगा?

अब तक पृथ्वी ही एकमात्र ऐसा ज्ञात ग्रह है जहाँ जीवन की उपस्थिति की पुष्टि हुई है। लेकिन अन्य ग्रहों, मंगल और बर्फ से ढके समुद्री उपग्रहों की खोज ने इस संभावना को वैज्ञानिक अनुसंधान का महत्वपूर्ण विषय बना दिया है।

जीवन के इतिहास का सबसे बड़ा आकर्षण शायद इसी अनिश्चितता में छिपा है। हम जानते हैं कि पृथ्वी पर जीवन अस्तित्व में आया, विकसित हुआ और अंततः इतना जटिल बन गया कि उसका एक रूप, मनुष्य, आज अपनी ही उत्पत्ति का रहस्य खोज रहा है।

जिस प्रकृति ने अरबों वर्षों में जीवन को जन्म दिया, उसी जीवन का एक हिस्सा आज यह जानने की कोशिश कर रहा है कि उसकी शुरुआत आखिर हुई कैसे।

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संपादकीय टिप्पणी : यह लेख द न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित विलियम जे. ब्रॉड, केनेथ चांग और कार्ल ज़िमर की विज्ञान संबंधी सामग्री का हिंदी रूपांतरण एवं संपादित प्रस्तुतीकरण है।

 

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