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कैप्टन लक्ष्मी सहगल : स्वतंत्रता संग्राम का अमर सितारा

– अनन्त आकाश

इतिहास के आकाश में कुछ सितारे ऐसे होते हैं, जो कभी अस्त नहीं होते। उनकी चमक समय की सीमाओं को पार कर पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहती है। आजाद हिंद फौज की वीरांगना कैप्टन लक्ष्मी सहगल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का ऐसा ही एक अमर सितारा थीं। उन्होंने न केवल ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, बल्कि उस दौर में महिला सशक्तीकरण की ऐसी मिसाल प्रस्तुत की, जब महिलाओं के लिए सामाजिक बंधनों को तोड़कर सार्वजनिक जीवन में आगे बढ़ना भी आसान नहीं था। एक साहसी स्वतंत्रता सेनानी, कुशल चिकित्सक, प्रतिबद्ध राजनीतिक कार्यकर्ता और संवेदनशील समाजसेवी के रूप में उनका जीवन देश और समाज के प्रति अटूट समर्पण की प्रेरक गाथा है।

प्रारंभिक जीवन : बचपन से ही सेवा और राष्ट्रप्रेम के संस्कार

24 अक्टूबर 1914 को मद्रास (वर्तमान चेन्नई) में जन्मी लक्ष्मी स्वामीनाथन का पालन-पोषण ऐसे परिवार में हुआ, जहाँ राष्ट्रवाद, सामाजिक न्याय और जनसेवा के संस्कार गहराई से रचे-बसे थे। उनके पिता एस. स्वामीनाथन प्रतिष्ठित अधिवक्ता थे, जबकि माता अम्मू स्वामीनाथन स्वतंत्रता आंदोलन और महिला अधिकारों के लिए सक्रिय थीं। पारिवारिक वातावरण ने लक्ष्मी के व्यक्तित्व में बचपन से ही अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने और समाज के कमजोर वर्गों की सहायता करने की भावना विकसित की।

प्रतिभाशाली लक्ष्मी ने 1938 में मद्रास मेडिकल कॉलेज से चिकित्सा की उपाधि प्राप्त की और बाद में स्त्री रोग एवं प्रसूति चिकित्सा में प्रशिक्षण लिया। चिकित्सा उनके लिए केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि मानव सेवा का माध्यम थी। वर्ष 1940 में वे सिंगापुर पहुँचीं, जहाँ उन्होंने भारतीय प्रवासी मजदूरों, विशेषकर गरीब महिलाओं के उपचार के लिए चिकित्सालय शुरू किया। यहीं से उनके जीवन ने एक नया मोड़ लिया और वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अंतरराष्ट्रीय अभियान से जुड़ गईं।

आजाद हिंद फौज : महिलाओं के सैन्य नेतृत्व का ऐतिहासिक अध्याय

वर्ष 1943 में नेताजी सुभाषचंद्र बोस के सिंगापुर आगमन ने दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा प्रदान की। लक्ष्मी स्वामीनाथन नेताजी के विचारों और भारत को सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से स्वतंत्र कराने के संकल्प से गहराई से प्रभावित हुईं। नेताजी से उनकी मुलाकात के बाद आजाद हिंद फौज में महिलाओं की एक स्वतंत्र सैन्य इकाई के गठन का मार्ग प्रशस्त हुआ। इस इकाई का नाम 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की महान वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की स्मृति में **’रानी झाँसी रेजिमेंट’** रखा गया।

कैप्टन लक्ष्मी को इस रेजिमेंट के संगठन और नेतृत्व की जिम्मेदारी सौंपी गई। उन्होंने सिंगापुर तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के अन्य क्षेत्रों में रहने वाली भारतीय मूल की महिलाओं को संगठित किया। इनमें अनेक युवतियाँ ऐसे परिवारों से थीं, जिनका सैन्य जीवन से कोई संबंध नहीं था। फिर भी देश की स्वतंत्रता के लिए उन्होंने कठोर सैन्य प्रशिक्षण स्वीकार किया। रेजिमेंट में सैकड़ों महिलाओं की भर्ती हुई और आगे चलकर इसका विस्तार हुआ। भारतीय महिलाओं को संगठित सैन्य प्रशिक्षण और नेतृत्व प्रदान करने का यह अपने समय का अत्यंत साहसिक और ऐतिहासिक प्रयोग था।

लक्ष्मी सहगल को बाद में कर्नल का पद भी प्राप्त हुआ, किंतु वे जनमानस में हमेशा ‘कैप्टन लक्ष्मी’ के नाम से प्रसिद्ध रहीं। वर्ष 1943 में गठित अस्थायी आजाद हिंद सरकार में उन्हें महिला मामलों का दायित्व भी सौंपा गया। इस प्रकार वे स्वतंत्रता संघर्ष के सैन्य और राजनीतिक, दोनों मोर्चों पर सक्रिय रहीं।

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान रानी झाँसी रेजिमेंट की महिलाओं ने सैन्य प्रशिक्षण, चिकित्सा सहायता तथा युद्धकालीन परिस्थितियों में विभिन्न जिम्मेदारियाँ निभाईं। यद्यपि रेजिमेंट को व्यापक स्तर पर प्रत्यक्ष युद्ध में भाग लेने का अवसर नहीं मिला, लेकिन उसकी स्थापना ने महिलाओं की क्षमता और भूमिका को लेकर प्रचलित धारणाओं को चुनौती दी। युद्ध के अंतिम चरण में कैप्टन लक्ष्मी ब्रिटिश सेना की हिरासत में आ गईं। वर्ष 1946 में उनकी रिहाई हुई। उस समय तक आजाद हिंद फौज के सैनिकों के प्रति देशभर में व्यापक जनसमर्थन पैदा हो चुका था।

स्वतंत्रता के बाद : राजनीति और जनसंघर्षों में सक्रिय भूमिका

भारत की स्वतंत्रता के बाद भी कैप्टन लक्ष्मी का संघर्ष समाप्त नहीं हुआ। उन्होंने राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ सामाजिक और आर्थिक समानता को भी आवश्यक माना। वर्ष 1947 में आजाद हिंद फौज के अधिकारी प्रेम कुमार सहगल से विवाह के बाद वे कानपुर में बस गईं। यहाँ उन्होंने चिकित्सा सेवा के साथ सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी जारी रखी।

वर्ष 1971 में वे भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) से जुड़ीं। मजदूरों, किसानों, महिलाओं और समाज के वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए उन्होंने निरंतर आवाज उठाई। वे अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की संस्थापक सदस्यों में शामिल रहीं और संगठन की उपाध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया। महिलाओं की शिक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता, समान अधिकार और सामाजिक न्याय उनके सार्वजनिक जीवन के प्रमुख सरोकार रहे।

वर्ष 2002 में कैप्टन लक्ष्मी सहगल ने चार वामपंथी दलों के संयुक्त उम्मीदवार के रूप में राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ा। उनका मुकाबला डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम से था। चुनाव में पराजय के बावजूद उनकी उम्मीदवारी का विशेष राजनीतिक और प्रतीकात्मक महत्व था। वे राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने वाली भारत की पहली महिला नहीं थीं; उनसे पहले भी महिला उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतर चुकी थीं। फिर भी स्वतंत्रता संग्राम की एक वरिष्ठ सेनानी और आजीवन जनसेवा के लिए समर्पित महिला का सर्वोच्च संवैधानिक पद के लिए चुनाव लड़ना भारतीय लोकतंत्र की एक उल्लेखनीय घटना थी।

जनसेवा : अंतिम समय तक गरीबों और पीड़ितों के साथ

कैप्टन लक्ष्मी सहगल का व्यक्तित्व राजनीति और स्वतंत्रता संग्राम की सीमाओं से कहीं अधिक व्यापक था। उन्होंने जीवनभर चिकित्सा को मानवता की सेवा का माध्यम बनाए रखा। कानपुर में उनका चिकित्सालय गरीबों, श्रमिकों और जरूरतमंद महिलाओं के लिए आशा का केंद्र बना रहा। आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों का उपचार वे अत्यंत कम शुल्क पर या निःशुल्क करती थीं।

वर्ष 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान भारत आए शरणार्थियों की सहायता के लिए उन्होंने चिकित्सा और राहत कार्यों में भाग लिया। वर्ष 1984 की भोपाल गैस त्रासदी के बाद भी वे पीड़ितों की सहायता के लिए सक्रिय हुईं। सांप्रदायिक हिंसा, प्राकृतिक आपदाओं और मानवीय संकटों के समय जरूरतमंदों के साथ खड़ा होना उनके जीवन का स्थायी संकल्प था।

उनके लिए देशभक्ति का अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति प्राप्त करना नहीं था। वे मानती थीं कि स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी, जब समाज के कमजोर वर्गों को सम्मान, समान अवसर और न्याय मिलेगा। यही कारण था कि स्वतंत्रता प्राप्ति के दशकों बाद भी उनका जीवन आम लोगों की समस्याओं और संघर्षों से जुड़ा रहा।

देश के प्रति उनके असाधारण योगदान को मान्यता देते हुए भारत सरकार ने वर्ष 1998 में उन्हें देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान **पद्म विभूषण** से अलंकृत किया। यह सम्मान उनके स्वतंत्रता संग्राम, चिकित्सा सेवा और सामाजिक कार्यों में लंबे योगदान की राष्ट्रीय स्वीकृति था।

एक प्रेरक जीवन का अवसान, लेकिन विचारों की अमर विरासत

23 जुलाई 2012 को 97 वर्ष की आयु में कानपुर में कैप्टन लक्ष्मी सहगल का निधन हो गया। जीवन के अंतिम वर्षों तक वे सामाजिक सरोकारों से जुड़ी रहीं। निधन के बाद उनकी इच्छा के अनुरूप उनका शरीर चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान के लिए दान कर दिया गया। यह उनके जीवनभर के सेवा-संकल्प का अंतिम और अत्यंत प्रेरक उदाहरण था।

कैप्टन लक्ष्मी सहगल का जीवन इस सत्य को स्थापित करता है कि नेतृत्व की वास्तविक पहचान पद, प्रतिष्ठा या सत्ता से नहीं, बल्कि साहस, संवेदना और त्याग से होती है। जिस दौर में महिलाओं की भूमिका को सीमित दायरों में देखा जाता था, उस समय उन्होंने सैकड़ों महिलाओं को सैन्य प्रशिक्षण के लिए प्रेरित किया और उन्हें राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम की सक्रिय भागीदार बनाया। उन्होंने यह सिद्ध किया कि देश की स्वतंत्रता और समाज के निर्माण में महिलाओं की भूमिका किसी भी दृष्टि से पुरुषों से कम नहीं है।

उनके जीवन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने स्वतंत्रता को केवल राजनीतिक परिवर्तन नहीं माना। उनके लिए आजादी का वास्तविक अर्थ था—भय, अभाव, शोषण, भेदभाव और अन्याय से मुक्ति। इसी विचार को उन्होंने अपने सैन्य जीवन, राजनीतिक संघर्ष और चिकित्सा सेवा में समान रूप से जिया।

आज, जब महिला सशक्तीकरण, सामाजिक समानता और मानवीय अधिकारों की चर्चा होती है, तब कैप्टन लक्ष्मी सहगल का जीवन और भी प्रासंगिक दिखाई देता है। वे उन असंख्य महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं, जो सामाजिक बंधनों को तोड़कर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाना चाहती हैं।

उनकी जयंती हमें याद दिलाती है कि सच्ची अमरता स्मारकों और प्रतिमाओं में नहीं, बल्कि उन आदर्शों में निहित होती है, जो आने वाली पीढ़ियों को बेहतर समाज बनाने की प्रेरणा देते हैं। कैप्टन लक्ष्मी सहगल ऐसी ही अमर विभूति थीं, जिनकी संघर्षशीलता, देशभक्ति और मानव सेवा की विरासत भारतीय इतिहास में सदैव उज्ज्वल बनी रहेगी।

 

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