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जब हिमवीर सीमांत गांवों के लोगों को भी युद्ध के लिए तैयार करते थे

Established on October 24, 1962, following the Sino-Indian War, the Indo-Tibetan Border Police (ITBP) has evolved into a formidable frontier security force. Beyond guarding the Himalayan borders, ITBP contributed significantly to the 1965 and 1971 Indo-Pakistani wars. This article highlights a lesser-known chapter: ITBP’s training of border villagers, including women, in firearms and self-defence during the 1970s. Drawing on the author’s firsthand experience of a 1972 training camp in Chamoli, Uttarakhand, it explores community participation in national security. The article also celebrates ITBP’s mountaineering achievements, disaster response, gallantry awards, and enduring commitment to safeguarding India’s frontiers.

 

आईटीबीपी के 65वें स्थापना दिवस पर विशेष : 1962 के युद्ध से जन्मे बल की 1971 के युद्ध में भूमिका और सीमांत गांवों में नागरिकों को हथियार चलाने के प्रशिक्षण की अल्पज्ञात कहानी

-जयसिंह रावत-

भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) का नाम सुनते ही हिमालय की बर्फीली चोटियों, दुर्गम दर्रों और हाड़ कंपा देने वाली ठंड में देश की सीमाओं की रक्षा करते हिमवीरों की तस्वीर सामने आती है। लेकिन इस बल का इतिहास केवल सीमा पर पहरा देने तक सीमित नहीं है। एक दौर ऐसा भी था जब आईटीबीपी के जवान सीमावर्ती गांवों में पहुंचकर सामान्य नागरिकों को हथियार चलाने, निशानेबाजी और संभावित शत्रु घुसपैठ की परिस्थितियों में आत्मरक्षा का प्रशिक्षण दिया करते थे। चमोली गढ़वाल के गांवों में ऐसे शिविर आयोजित होते थे। इस लेखक को स्वयं वर्ष 1972 में अपने गांव में आयोजित लगभग दस दिवसीय प्रशिक्षण शिविर में भाग लेने का अवसर मिला था। यह अनुभव उस दौर की याद दिलाता है, जब हिमालय की सुरक्षा में सीमांत आबादी को भी महत्वपूर्ण सहभागी माना जाता था। 24 अक्टूबर 2026 को आईटीबीपी ने अपनी स्थापना के 64 वर्ष पूरे कर 65वां स्थापना दिवस मनाया। इस अवसर पर उसके इतिहास के कुछ ऐसे अध्यायों को याद करना प्रासंगिक है, जिनकी चर्चा सामान्यतः स्थापना दिवस समारोहों में कम होती है। ऐसा भी माना  जाता है कि 1971 के युद्ध में सेना से भी पहले ITBP पूर्वी पाकिस्तान ( बांग्लादेश ) में  घुस चुकी थी. 

1962 के राष्ट्रीय संकट से हुआ जन्म

अक्टूबर 1962 का भारत-चीन युद्ध स्वतंत्र भारत के इतिहास का एक कठिन अनुभव था। इस युद्ध ने हिमालयी सीमाओं की सुरक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की आवश्यकता उजागर की। दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में निरंतर निगरानी, खुफिया सूचनाओं के संकलन और सीमावर्ती आबादी में सुरक्षा की भावना विकसित करने के उद्देश्य से 24 अक्टूबर 1962 को भारत-तिब्बत सीमा पुलिस का गठन किया गया। शुरुआत केवल चार बटालियनों से हुई थी। बाद में संगठन का लगातार विस्तार हुआ। वर्ष 1992 में संसद ने आईटीबीपी अधिनियम पारित किया और 1994 में इसके नियम लागू हुए। वर्ष 2004 में ‘एक सीमा, एक बल’ की नीति के अंतर्गत भारत-चीन सीमा की सुरक्षा का व्यापक दायित्व आईटीबीपी को सौंपा गया। आज लद्दाख के कराकोरम दर्रे से अरुणाचल प्रदेश के जाचेप ला तक लगभग 3,488 किलोमीटर लंबी सीमा की सुरक्षा इसकी प्रमुख जिम्मेदारी है।

1965 और 1971 के युद्धों में पराक्रम

आईटीबीपी की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह रही कि स्थापना के केवल तीन वर्ष बाद ही उसे युद्धकालीन जिम्मेदारियां निभानी पड़ीं। वर्ष 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में इसके जवानों ने पाकिस्तानी घुसपैठियों और पैराट्रूपरों के विरुद्ध तलाशी अभियान चलाए तथा महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की सुरक्षा की। वर्ष 1971 का युद्ध इसके इतिहास का एक और उल्लेखनीय अध्याय है। भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय द्वारा अक्टूबर 2011 में प्रकाशित आधिकारिक आलेख ITBP: A Force Par Excellence के अनुसार, इस युद्ध में आईटीबीपी की दो बटालियनों को श्रीनगर घाटी और पुंछ क्षेत्र में विशेष जिम्मेदारियां सौंपी गई थीं। इनमें घुसपैठ के रास्तों को बंद करना, घुसपैठियों के अड्डों का पता लगाना और उन्हें नष्ट करना शामिल था। इन अभियानों में बल के प्रदर्शन की सराहना की गई थी। ऐसा भी माना  जाता है कि 1971 के युद्ध में सेना से भी पहले ITBP पूर्वी पाकिस्तान ( बांग्लादेश ) में  घुस चुकी थी. 

यह वही युद्ध था, जिसके परिणामस्वरूप बांग्लादेश का जन्म हुआ। पूर्वी मोर्चे पर भारतीय सेना और मुक्ति वाहिनी संघर्ष कर रही थीं, जबकि पश्चिमी मोर्चे की सुरक्षा भी अत्यंत महत्वपूर्ण थी। आईटीबीपी ने पश्चिमी क्षेत्र में अपनी जिम्मेदारियां निभाकर भारत के समग्र युद्ध प्रयासों में योगदान दिया। हालांकि उपलब्ध सरकारी विवरण में मुक्ति वाहिनी को आईटीबीपी द्वारा सीधे प्रशिक्षण देने या उसके साथ संयुक्त अभियान चलाने का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। इसलिए उस संभावित भूमिका की अलग ऐतिहासिक पुष्टि आवश्यक है।

जब गांवों में लगते थे हथियार प्रशिक्षण शिविर

आईटीबीपी के इतिहास का एक लगभग भुला दिया गया अध्याय सीमांत गांवों में नागरिक प्रशिक्षण से जुड़ा है। सत्तर के दशक में चमोली गढ़वाल के गांवों में संभावित युद्ध की परिस्थितियों से निपटने के लिए ग्रामीणों को हथियार चलाने और आत्मरक्षा का प्रशिक्षण दिया जाता था। इस लेखक ने वर्ष 1972 में अपने गांव में आयोजित लगभग दस दिवसीय प्रशिक्षण शिविर में भाग लिया था।शिविर में हथियारों के संचालन, निशानेबाजी और आपात परिस्थितियों में आत्मरक्षा का अभ्यास कराया जाता था। प्रशिक्षण के अंत में गोलीबारी की परीक्षा होती थी। बेहतर प्रदर्शन करने वाले प्रशिक्षुओं को आगे गुरिल्ला प्रशिक्षण के लिए हिमाचल प्रदेश भेजे जाने की व्यवस्था भी थी।विशेष बात यह थी कि महिलाओं को भी संभावित शत्रु घुसपैठ की परिस्थितियों में सावधानी बरतने, हथियार सुरक्षित रखने और आत्मरक्षा के उपायों से परिचित कराया जाता था। प्रशिक्षण का उद्देश्य सीमांत आबादी को संभावित युद्धकालीन परिस्थितियों के प्रति जागरूक और तैयार करना था।

वर्ष 1972 का यह शिविर कोई अकेला आयोजन नहीं था। लेखक की स्मृति के अनुसार, इससे पहले भी गांव में ऐसे शिविर आयोजित हुए थे और बाद में भी उनका सिलसिला जारी रहा। बचपन की स्मृतियों में पीएसी (एसएसएफ) के नाम से याद किए जाने वाले संगठन का एक पुराना प्रशिक्षण शिविर भी दर्ज है, हालांकि उसकी संस्थागत पहचान की पुष्टि आवश्यक है।इस संदर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि 1962 के युद्ध के बाद 1963 में स्थापित विशेष सेवा ब्यूरो, जिसे आज सशस्त्र सीमा बल के नाम से जाना जाता है, का प्रारंभिक उद्देश्य भी सीमांत आबादी में सुरक्षा चेतना और प्रतिरोध क्षमता विकसित करना था। इसलिए उस दौर के विभिन्न संगठनों के नागरिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों का अलग-अलग अभिलेखीय अध्ययन जरूरी है।ये अनुभव बताते हैं कि हिमालय की सीमा सुरक्षा केवल सैन्य चौकियों तक सीमित नहीं थी। सीमांत गांवों के लोगों को भी राष्ट्रीय सुरक्षा की व्यापक तैयारियों में सहभागी बनाने का प्रयास किया जाता था।

जहां प्रकृति भी परीक्षा लेती है

आईटीबीपी की सबसे बड़ी चुनौती उसका कार्यक्षेत्र है। हिमालय में इसकी अनेक चौकियां समुद्रतल से 9,000 से 18,800 फुट तक की ऊंचाई पर स्थित हैं। कुछ क्षेत्रों में तापमान शून्य से 45 डिग्री सेल्सियस नीचे तक गिर जाता है। ऑक्सीजन की कमी, हिमस्खलन, बर्फीले तूफान और दुर्गम रास्ते जवानों की नियमित चुनौतियां हैं।

इन परिस्थितियों में तैनाती से पहले जवानों को पर्वतारोहण, चट्टानों पर चढ़ने, बर्फीले क्षेत्रों में जीवित रहने और पर्वतीय युद्धकला का प्रशिक्षण दिया जाता है। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में चिकित्सा संबंधी चुनौतियों को देखते हुए 17 जुलाई 2009 को लेह में उच्च हिमालयी चिकित्सा प्रशिक्षण संस्थान स्थापित किया गया।आईटीबीपी की पर्वतारोहण उपलब्धियां भी असाधारण रही हैं। मई 1992 में इसके आठ पर्वतारोहियों, जिनमें एक महिला पुलिस अधिकारी भी शामिल थीं, ने एवरेस्ट शिखर पर पहुंचकर इतिहास रचा। बल के पर्वतारोहियों ने कंचनजंघा, नंदादेवी और कामेत सहित अनेक शिखरों पर भारतीय तिरंगा फहराया है। वर्ष 1991 में ब्रह्मपुत्र नदी के लगभग 1,100 किलोमीटर लंबे दुर्गम मार्ग पर जल अभियान भी इसकी उल्लेखनीय उपलब्धि थी।

वीरता के पदकों से सजा इतिहास

आईटीबीपी का आदर्श वाक्य ‘शौर्य, दृढ़ता, कर्मनिष्ठा’ उसके चरित्र को अभिव्यक्त करता है। बल के अधिकारियों और जवानों को दो कीर्ति चक्र, छह शौर्य चक्र, 19 राष्ट्रपति पुलिस वीरता पदक सहित अनेक राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए हैं। इसके कार्मिकों को सात पद्मश्री और 14 तेनजिंग नोर्गे राष्ट्रीय साहसिक पुरस्कार भी मिल चुके हैं। ये संख्याएं पूर्ववर्ती आधिकारिक विवरणों पर आधारित हैं।सीमा सुरक्षा के अतिरिक्त कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियानों, छत्तीसगढ़ में वामपंथी उग्रवाद के विरुद्ध कार्रवाई और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की सुरक्षा में भी आईटीबीपी की भूमिका रही है। उत्तराखंड सहित हिमालयी राज्यों में आपदा राहत एवं बचाव कार्यों के दौरान इसके जवानों ने उल्लेखनीय सेवाएं दी हैं।

सीमांत समाज और हिमवीरों का रिश्ता

आईटीबीपी की भूमिका का एक मानवीय पक्ष सीमावर्ती आबादी के साथ उसका संबंध है। दूरस्थ गांवों में चिकित्सा शिविर, पशु चिकित्सा सहायता, आपदा के समय राहत और स्थानीय लोगों में सुरक्षा का विश्वास विकसित करना इसकी जिम्मेदारियों में शामिल रहा है।आज जब हिमालयी सीमाओं पर सामरिक चुनौतियों के साथ जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं के खतरे बढ़ रहे हैं, तब आईटीबीपी की भूमिका और महत्वपूर्ण हो गई है। जवानों के लिए बेहतर संचार, सड़क संपर्क, चिकित्सा सुविधाएं और आधुनिक उपकरण उपलब्ध कराना राष्ट्रीय आवश्यकता है।

आईटीबीपी के 65वें स्थापना दिवस पर यह याद रखना चाहिए कि 1962 के संकट से जन्मे इस बल ने केवल सीमाओं की रक्षा नहीं की, बल्कि युद्धकालीन जिम्मेदारियां निभाईं, सीमांत नागरिकों को आत्मरक्षा के लिए तैयार किया और आपदाओं में जीवन बचाए। हिमवीरों की गौरवगाथा में उन सीमांत गांवों की स्मृतियां भी शामिल हैं, जहां कभी जवान ग्रामीणों को देश की रक्षा के लिए तैयार किया करते थे।

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About the Author: Jay Singh Rawat is a veteran journalist, author and political analyst with nearly five decades of experience in journalism. He specialises in Uttarakhand’s history, Himalayan affairs, national security, environmental issues and socio-political developments.

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