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कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण :  भारत के उद्योगों को नेट ज़ीरो भविष्य की ओर अग्रसर करना

– PIB Feature-

कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण (CCUS) उत्सर्जन कम करने में कठिन क्षेत्रों से उत्सर्जन घटाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। कार्बन डाइऑक्साइड को अब केवल एक उत्सर्जन के रूप में ही नहीं, बल्कि एक संभावित संसाधन के रूप में भी देखा जा रहा है। CCUS भारत के वर्ष 2070 तक शुद्ध शून्य उत्सर्जन (नेट ज़ीरो) के लक्ष्य को साधने के साथ-साथ औद्योगिक प्रतिस्पर्धा और संसाधन दक्षता को मजबूत कर सकता है। सरकार एक ऐसे इकोसिस्टम को बढ़ावा दे रही है जो अनुसंधान संस्थानों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और निजी उद्योगों को एक साथ लाता है। यह बढ़ता इकोसिस्टम कई राज्यों में संचालित परियोजनाओं, निर्माणाधीन परियोजनाओं और प्रस्तावित पहल तक विस्तृत है। ये प्रयास स्वदेशी CCUS क्षमताओं, कार्बन उपयोग और सुरक्षित कार्बन भंडारण की नींव रख रहे हैं।

 

 

 

CCUS: भारत की नेट ज़ीरो यात्रा में अंतर को पाटना

वर्ष 2070 तक नेट ज़ीरो की ओर भारत की यात्रा के लिए ऊर्जा और औद्योगिक क्षेत्रों में उत्सर्जन में कटौती आवश्यक है। नवीकरणीय ऊर्जा उत्सर्जन को काफी हद तक कम कर सकती है, लेकिन कुछ औद्योगिक प्रक्रियाओं का आसानी से विद्युतीकरण नहीं किया जा सकता। इनमें अत्यधिक उच्च तापमान या कार्बन-आधारित इनपुट की आवश्यकता वाली प्रक्रियाएं शामिल हैं। कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण (CCUS) ऐसे उत्सर्जनों से निपटने के लिए एक अतिरिक्त मार्ग प्रदान करता है। इसके तहत औद्योगिक स्रोतों से कार्बन डाइऑक्साइड को वायुमंडल में छोड़े जाने से पहले ही कैप्चर (एकत्र) कर लिया जाता है। इस कैप्चर की गई कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग उपयोगी कार्यों में किया जा सकता है या इसे जमीन के भीतर सुरक्षित रूप से भंडारित किया जा सकता है। इसलिए CCUS नवीकरणीय ऊर्जा का पूरक बन सकता है और भारत के निम्न-कार्बन औद्योगिक अर्थव्यवस्था में बदलाव कर सकता है।

 

नीति आयोग ने स्टील, सीमेंट, तेल एवं गैस, पेट्रोकेमिकल्स, रसायन और उर्वरक सहित कठिन क्षेत्रों के डीकार्बोनाइजेशन के लिए CCUS को अत्यंत महत्वपूर्ण माना है। ये उद्योग औद्योगिक उत्सर्जन में बड़ा योगदान देते हैं और व्यापक स्तर पर डीकार्बोनाइजेशन हासिल करने में तकनीकी चुनौतियों का सामना करते हैं। CCUS मौजूदा संयंत्रों से उत्सर्जन कम करने में मदद कर सकता है, साथ ही आवश्यक वस्तुओं के निरंतर उत्पादन को बनाए रख सकता है। यह भारत में नई प्रौद्योगिकियों, अवसंरचना और औद्योगिक क्षमताओं को विकसित करने के अवसर भी पैदा कर सकता है। कार्बन कैप्चर को उपयोग और सुरक्षित भंडारण से जोड़कर, यह दृष्टिकोण कई चरणों में उत्सर्जन का समाधान कर सकता है। इस प्रकार CCUS औद्योगिक विकास और आर्थिक संवृद्धि को बनाए रखते हुए भारत के जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने में सहयोग दे सकता है।

 

सृजनशील मस्तिष्क, विज्ञान को उत्प्रेरित करते, प्रौद्योगिकियों को सशक्त बनाते

भारत के उभरते विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार सम्मेलन (ESTIC-2026) का दूसरा संस्करण 27–29 अक्टूबर 2026 तक आयोजित किया जा रहा है। यह कार्यक्रम भारत मंडपम, नई दिल्ली में “क्रिएटिव माइंड्स, कैटलाइजिंग साइंस, एम्पावरिंग टेक्नोलॉजीज” थीम के तहत आयोजित होगा। वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) द्वारा आयोजित ESTIC-2026 उभरते विज्ञान और प्रौद्योगिकी के नए क्षेत्रों को आगे बढ़ाएगा। इनमें कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण (CCUS) जैसी उभरती ऊर्जा प्रौद्योगिकियां शामिल हैं। यह सम्मेलन रणनीतिक सहयोग को गति देगा और भारत के ‘विकसित भारत 2047’ के दृष्टिकोण को बल प्रदान करेगा। 12 विषयगत क्षेत्रों में फैले इस आयोजन में पूर्ण सत्र (प्लेनरी सेशंस), तकनीकी चर्चाएं और प्रदर्शनियां शामिल होंगी। एजेंडा के बारे में अधिक पढ़ें: ESTIC 2026

 

CCUS प्रक्रिया: कैप्चर से भंडारण तक

 

चरण 1: स्रोत पर कार्बन डाइऑक्साइड को कैप्चर करना

 

यह प्रक्रिया उस औद्योगिक संयंत्र से शुरू होती है जहां कार्बन डाइऑक्साइड उत्पन्न होती है। कैप्चर प्रणालियां ईंधन के दहन या औद्योगिक प्रक्रियाओं के दौरान निकलने वाली गैसों से कार्बन डाइऑक्साइड को अलग करती हैं। इसके बाद कैप्चर की गई गैस को शुद्ध, ड्राइ और घने रूप में संपीड़ित (कंप्रेस) किया जाता है, जिसके बाद इसे परिवहन या उपयोग के लिए भेजा जाता है।

चरण 2: कैप्चर से परिवहन तक

 

उपयुक्त दूरी तक कार्बन डाइऑक्साइड के परिवहन के लिए आमतौर पर पाइपलाइनों का उपयोग किया जाता है। जहाज और अन्य परिवहन साधन, विशेष रूप से लंबी दूरी के लिए, लचीलापन प्रदान कर सकते हैं। परिवहन के साधन का चयन दूरी, मात्रा, अवसंरचना और गंतव्य पर निर्भर करता है। इसके बाद कार्बन डाइऑक्साइड को किसी उपयोग संयंत्र (यूटिलाइज़ेशन फैसिलिटी) या भूगर्भीय भंडारण स्थल (जियोलॉजिकल स्टोरेज साइट) पर भेजा जा सकता है।

क्या आप जानते हैं? एक भूगर्भीय भंडारण स्थल ज़मीन के काफी नीचे स्थित एक सुरक्षित स्थान होता है जिसका उपयोग कैप्चर किए गए CO₂ को स्थायी रूप से अलग रखने के लिए किया जाता है। CO₂ का भूगर्भीय भंडारण (जियो-स्टोरेज) एक आशाजनक दृष्टिकोण है जो ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने में मदद कर सकता है।

 

चरण 3: कार्बन उपयोग और स्थायी भंडारण

 

अंतिम चरण में, कैप्चर की गई कार्बन डाइऑक्साइड का या तो उत्पादक उपयोग किया जा सकता है या इसे ज़मीन के नीचे स्थायी रूप से भंडारित किया जा सकता है। इसका उपयोग एन्हांस्ड ऑयल रिकवरी (EOR), खाद्य एवं पेय पदार्थ, यूरिया, ग्रीन मेथनॉल और कंक्रीट जैसे अनुप्रयोगों में किया जा सकता है। स्थायी भंडारण के लिए, कार्बन डाइऑक्साइड को उपयुक्त भूगर्भीय संरचनाओं में गहराई में इंजेक्ट किया जाता है, जिनमें समाप्त हो चुके तेल और गैस के भंडार, गहरे लवणीय जलभृत (डीप सेलाइन एक्विफर्स) और बेसाल्टिक रॉक फॉर्मेशन्स शामिल हैं।

CCUS हब और क्लस्टर मॉडल

भारत का CCUS फ्रेमवर्क साझा अवसंरचना के साथ कई कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जकों को जोड़ने वाले क्षेत्रीय क्लस्टरों और हबों की परिकल्पना करता है। यह मॉडल कार्बन डाइऑक्साइड परिवहन, उपयोग और भंडारण के लिए साझा प्रणालियों को एकीकृत कर सकता है। विभिन्न स्रोतों से कैप्चर की गई कार्बन डाइऑक्साइड को एकत्र करके साझा नेटवर्क के माध्यम से ले जाया जा सकता है। फिर इसे उपयुक्त उपयोग संयंत्रों या भूगर्भीय भंडारण स्थलों पर भेजा जा सकता है। नीति आयोग ने भारत के लिए हब और क्लस्टर दृष्टिकोण को उपयुक्त माना है। यह मॉडल बड़े पैमाने की आर्थिक दक्षता (इकोनॉमीज़ ऑफ़ स्केल) पैदा कर सकता है, अवसंरचना के जोखिमों को कम कर सकता है और कार्बन डाइऑक्साइड की आपूर्ति को संभावित मांग से जोड़ सकता है।

 

विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) का ‘CCUS रोडमैप 2025’ ऐसे क्लस्टरों के लिए संभावित औद्योगिक और भूगर्भीय क्षेत्रों की पहचान करता है। इनमें रिफाइनरियों और रासायनिक उद्योगों के जमावड़े वाला गुजरात तट शामिल है। ओडिशा–झारखंड बेल्ट इस्पात और सीमेंट उद्योगों से जुड़े क्लस्टरों के लिए संभावनाएं प्रस्तुत करता है। पूर्वोत्तर भारत भी अपने तेल और गैस संसाधनों से जुड़े अवसर पेश करता है। ऐसे क्षेत्रीय क्लस्टर उत्सर्जकों, परिवहन अवसंरचना उपयोग संयंत्रों और भंडारण स्थलों को एक मंच पर ला सकते हैं। यह दृष्टिकोण भारत के औद्योगिक परिदृश्य के अनुकूल एक समन्वित CCUS इकोसिस्टम विकसित करने में मदद कर सकता है।

निम्न-कार्बन को गति देता CCUS

भारत के निम्न-कार्बन संक्रमण के लिए ऐसे समाधानों की आवश्यकता है जो आर्थिक विकास के साथ उत्सर्जन में गहरी कटौती को संतुलित कर सकें। CCUS स्रोत पर ही कार्बन डाइऑक्साइड का प्रबंधन करके और इसके पुन: उपयोग के अवसर बनाकर इस अंतर को भरता है। यह नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार का पूरक बनता है और उद्योग, हाइड्रोजन व कार्बन डाइऑक्साइड निष्कासन में नए रास्ते खोलता है।

हार्ड -टू एबेट क्षेत्रों का डीकार्बोनाइजेशन

हार्ड-टू-एबेट क्षेत्र (इस्पात, सीमेंट, रिफाइनरी/रसायन, उर्वरक) अपनी प्रक्रियाओं से सीधे कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित करते हैं। केवल विद्युतीकरण (नवीकरणीय स्रोतों की ओर बदलाव) के माध्यम से इनके उत्सर्जन को समाप्त करना कठिन हो सकता है। इन क्षेत्रों और ताप विद्युत उत्पादन से होने वाला उत्सर्जन 2030 तक लगभग 2,300 मिलियन टन प्रति वर्ष तक पहुंचने का अनुमान है, जिससे इनका कैप्चर और शमन महत्वपूर्ण हो जाता है। CCUS तकनीक निरंतर चल रही औद्योगिक गतिविधियों से होने वाले इन उत्सर्जनों के समाधान का एक सशक्त साधन प्रदान करती है।

क्या आप जानते हैं? ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से उत्पन्न बिजली का उपयोग करके पानी के इलेक्ट्रोलिसिस द्वारा किया जाता है। ब्लू हाइड्रोजन का उत्पादन प्राकृतिक गैस या कोयले को प्राथमिक फीडस्टॉक के रूप में उपयोग करके किया जाता है।

 

निम्न- कार्बन हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था को सक्षम बनाना

कार्बन कैप्चर के साथ कोल गैसीफिकेशन (कोयला गैसीकरण) के माध्यम से ब्लू हाइड्रोजन उत्पादन द्वारा, CCUS भारत के हाइड्रोजन क्षेत्र में परिवर्तन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। यह निम्न-कार्बन हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था विकसित करने के भारत के प्रयासों को गति देता है।

 

कोयला गैसीकरण (कोल गैसीफिकेशन)

 

कोयला गैसीकरण नियंत्रित ताप का उपयोग कर ठोस कोयले को एक स्वच्छ और उपयोगी गैस में परिवर्तित करता है। इस गैस को सिंथेसिस गैस या सिनगैस कहा जाता है। कोयले से इसे बनाने की प्रक्रिया को कोल गैसीफिकेशन कहा जाता है। इसके दो स्थापित तरीके हैं: सरफेस कोल गैसीफिकेशन, जिसमें जमीन के ऊपर गैसीफायरों में खनन किए गए कोयले को संसाधित किया जाता है। अंडरग्राउंड कोल गैसीफिकेशन, जो सीधे भूमिगत परत के भीतर ही कोयले को परिवर्तित करता है। दोनों ही मामलों में, पारंपरिक दहन के विपरीत, कोयला पूरी तरह से जलता नहीं है। इसके बजाय, यह ऑक्सीजन और भाप की सीमित आपूर्ति के साथ प्रतिक्रिया करता है। यह आमतौर पर 800°C और 1,600°C के बीच के उच्च तापमान पर होता है। ये स्थितियां कोयले की जटिल संरचना को सरल गैसों में तोड़ देती हैं।

 

मौजूदा ऊर्जा अवसंरचना को बनाए रखना

अगस्त 2026 तक, भारत की कुल स्थापित विद्युत क्षमता में जीवाश्म ईंधन आधारित स्रोतों की हिस्सेदारी 45.12% थी। स्वच्छ स्रोतों में संक्रमण के दौरान यह मौजूदा अवसंरचना भारत की ऊर्जा प्रणाली का हिस्सा बना रहेगा। इसलिए लंबी अवधि के जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए इन परिसंपत्तियों से होने वाले उत्सर्जन का प्रबंधन महत्वपूर्ण होगा। CCUS मौजूदा थर्मल पावर प्लांटों और उद्योगों को उत्सर्जन घटाने में सक्षम बनाकर इस प्रयास का समर्थन कर सकता है। इस्पात और सीमेंट संयंत्रों को भी संभावित रूप से CCUS प्रणालियों से रेट्रोफिट (सुसज्जित) किया जा सकता है। इससे आवश्यक ऊर्जा और औद्योगिक अवसंरचना के निरंतर संचालन के साथ-साथ कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को कम किया जा सकता है।

 

कार्बन उपयोग

कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण फ्रेमवर्क के तहत, कैप्चर की गई कार्बन डाइऑक्साइड सामग्रियों, ईंधनों, रसायनों और जैविक उत्पादों के लिए कच्चे माल (फीडस्टॉक) के रूप में काम कर सकती है, जिससे कार्बन प्रबंधन और औद्योगिक मूल्य दोनों के रास्ते खुलते हैं। अनुप्रयोगों में कंक्रीट और एग्रीगेट्स जैसी निर्माण सामग्री, सिंथेटिक ईंधन और रसायन, पॉलिमर, भूमिगत कार्बन भंडारण के साथ उन्नत तेल पुनर्प्राप्ति, और बायोफ्यूल सहित एल्गी-बेस्ड उत्पाद शामिल हैं। ये अनुप्रयोग संसाधन दक्षता में सुधार करते हुए सामग्रियों, ईंधनों, रसायनों और जैविक उत्पादों में कार्बन डाइऑक्साइड के उपयोग को विस्तार देते हैं।

कोयला गैसीकरण संयंत्रों में भारत का अपनी तरह का पहला CCU टेस्ट बेड

DST ने अपनी हालिया पहल के तहत आईआईटी दिल्ली – थर्मेक्स लिमिटेड और सीएसआईआर-आईआईसीटी हैदराबाद – भेल (BHEL) के बीच उद्योग-अनुसंधान संघों द्वारा कार्यान्वित किए जाने वाले दो प्रौद्योगिकी परिनियोजन टेस्टबेड्स का समर्थन किया है। इनका उद्देश्य मेथनॉल और डीएमई (DME) उत्पादन के लिए कोल गैसीफिकेशन संयंत्रों में पायलट-स्तरीय प्रदर्शन स्थापित करना है, जिसमें उद्योग एक समाधान प्रदाता के रूप में प्रौद्योगिकी डिजाइनर (ज्ञान भागीदार) के साथ मिलकर थर्मल पावर जैसे हार्ड-टू-एबेट क्षेत्रों में CCU को तैनात करेगा।

 

भारत की पहली एकीकृत CCUS फील्ड प्रयोगशाला

मई 2026 में आईआईटी बॉम्बे में उद्घाटित भारत की पहली एकीकृत CCUS फील्ड प्रयोगशाला कार्बन कैप्चर, उपयोग और स्थायी भूगर्भीय भंडारण को एकल पायलट-स्केल प्लेटफॉर्म पर एक साथ लाती है। यह स्वदेशी संयंत्र गैर-पेयजल का उपयोग करके औद्योगिक उत्सर्जन और परिवेशी वायु से प्रतिदिन 3 टन तक कार्बन डाइऑक्साइड कैप्चर कर सकता है, और इसे उपयोगी कार्बोनेट और बाइकार्बोनेट उत्पादों में परिवर्तित कर सकता है। दक्कन ट्रैप बेसाल्ट संरचनाओं में वैज्ञानिक ड्रिलिंग सुरक्षित और स्थायी कार्बन डाइऑक्साइड भंडारण के लिए भारत की क्षमता का आगे और आकलन करेगी। यह प्रयोगशाला स्वदेशी कार्बन प्रबंधन प्रौद्योगिकियों के विकास और विस्तार के लिए एक राष्ट्रीय परीक्षण स्थल प्रदान करती है, जो नेट ज़ीरो 2070 और कठिन उद्योगों के लिए समाधानों का समर्थन करती है। अधिक पढ़ें: India’s First Integrated CCUS Field Laboratory Facility

 

भारत के CCUS इकोसिस्टम को मजबूत करना

भारत सरकार ने CCUS के विकास को गति देने और उत्सर्जन कम करने के लिए अनुसंधान, नीति और उद्योग तक विस्तृत कई पहल की हैं। ये उपाय वर्ष 2070 तक भारत के नेट ज़ीरो लक्ष्य की नींव को मजबूत करते हैं:

  • केंद्रीय बजट 2026–27, CCUS योजना: फरवरी 2026 में घोषित, वित्त मंत्रालय ने पांच प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों—बिजली, इस्पात, सीमेंट, रिफाइनरी और रसायन-में कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण को बढ़ावा देने के लिए पांच वर्षों में 20,000 करोड़ रुपये आवंटित किए।
  • विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग – CCUS अनुसंधान एवं विकास (R&D) रोडमैप: दिसंबर 2025 में शुरू किया गया यह रोडमैप वाणिज्यिक तत्परता, अभूतपूर्व प्रौद्योगिकियों और सक्षम रूपरेखाओं पर ध्यान केंद्रित करते हुए CCUS अनुसंधान, वित्तपोषण, प्रौद्योगिकी विकास और परिनियोजन के लिए रणनीतिक दिशा प्रदान करता है। Click to Access the DST Roadmap

  • नीति आयोग CCUS नीति रूपरेखा एवं तंत्र: नवंबर 2022 में जारी यह रिपोर्ट हार्ड-टू-एबेट क्षेत्रों के गहरे डीकार्बोनाइजेशन के लिए उत्सर्जन कटौती रणनीति के रूप में CCUS की समीक्षा करती है और इसके परिनियोजन के लिए क्षेत्र-विशिष्ट नीतिगत हस्तक्षेपों की रूपरेखा प्रस्तुत करती है। नीति आयोग की रिपोर्ट के लिए Click to Access NITI Aayog Report
  • राष्ट्रीय CCUS केंद्र: विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के समर्थन से 2022 में आईआईटी बॉम्बे और जेएनसीएएसआर (JNCASR) बेंगलुरु में स्थापित, ये केंद्र CCUS अनुसंधान, प्रौद्योगिकी विकास, पायलट-स्तरीय प्रदर्शन और उद्योग सहयोग पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

 

भारत ने सीमेंट उद्योग के लिए पहला सीसीयू टेस्टबेड क्लस्टर शुरू किया

 

भारत ने 11 मई 2025 को सीमेंट उद्योग के लिए पांच कार्बन कैप्चर और उपयोग (CCU) टेस्टबेड का अपना पहला क्लस्टर शुरू किया। विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के नेतृत्व में, यह पहल सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल के तहत प्रमुख सीमेंट कंपनियों और शीर्ष अनुसंधान संस्थानों को औद्योगिक CCU प्रौद्योगिकियों के विकास और तैनाती के लिए एक साथ लाती है। ये टेस्टबेड कार्बन डाइऑक्साइड कैप्चर और खनिजीकरण (मिनरलाइजेशन) से लेकर कंक्रीट उत्पादों में इसके रूपांतरण तक के अनुप्रयोगों को कवर करते हैं, जो सीमेंट क्षेत्र के डीकार्बोनाइजेशन के लिए व्यावहारिक CCU अनुप्रयोगों को आगे बढ़ाते हैं।

 

स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण और साझेदारी (CETP) और त्वरित CCUS प्रौद्योगिकी (ACT): ये यूरोपीय संघ (EU) और यूरोपीय आयोग (EC) द्वारा वित्तपोषित बहुराष्ट्रीय मंच हैं, जिनमें 30 से अधिक सदस्य देश और 50 फंडिंग एजेंसियां शामिल हैं। DST, भारत ने CCS और CCU के क्षेत्र में 4 बहुपक्षीय संघ परियोजनाओं का समर्थन करने के लिए ACT और CETP जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों में भाग लिया है। ये परियोजनाएं CCUS प्रौद्योगिकियों को उच्चतर TRL (प्रौद्योगिकी तत्परता स्तर) तक ले जाने के लिए प्रमुख अनुसंधान संस्थानों और उद्योगों दोनों को जोड़ती हैं। DST की वर्षवार CCUS यात्रा का विवरण नीचे दिया गया है।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) भारत मिशन इनोवेशन प्लेटफॉर्म के तहत प्राथमिकता वाले स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्रों में सहयोगात्मक अनुसंधान और स्वच्छ ऊर्जा समाधानों को आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभाता है। मार्च 2025 तक, भारत ने मिशन इनोवेशन के तहत 25 CCUS अनुसंधान एवं विकास परियोजनाओं का समर्थन किया है, जिनमें विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के माध्यम से 19 परियोजनाएं और जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) के माध्यम से 6 परियोजनाएं शामिल हैं।

 

भारत की CCU पर गति तेज

अप्रैल 2026 तक, भारत में कई CCU परियोजनाएं संचालित, निर्माणाधीन और प्रस्तावित चरणों में हैं। यह पोर्टफोलियो कई राज्यों में सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों, निजी उद्योगों और शैक्षणिक संस्थानों को एक मंच पर लाता है। ये परियोजनाएं कार्बन उत्सर्जन घटाने, कार्बन के उत्पादक उपयोग और चक्रीय अर्थव्यवस्था (सर्कुलर इकोनॉमी) के अनुप्रयोगों पर केंद्रित हैं।

  • संचालित: तीन परियोजनाएं संचालित हैं, जिनमें मध्य प्रदेश, तमिलनाडु और महाराष्ट्र में एक-एक परियोजना शामिल है।
  • निर्माणाधीन/कार्यान्वयाधीन: छह परियोजनाएं निर्माणाधीन या कार्यान्वयन के चरण में हैं। इनमें आंध्र प्रदेश तीन परियोजनाओं के साथ सबसे आगे है, इसके बाद तेलंगाना में दो और महाराष्ट्र में एक परियोजना है।
  • प्रस्तावित: सोलह परियोजनाएं प्रस्तावित चरण में हैं। असम और ओडिशा चार-चार परियोजनाओं के साथ सबसे आगे हैं, इसके बाद गुजरात और राजस्थान में दो-दो परियोजनाएं हैं। आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा और तमिलनाडु में एक-एक परियोजना प्रस्तावित है।

परियोजनाओं की यह श्रृंखला पूरे भारत में कार्बन प्रबंधन समाधानों की बढ़ती गति को दर्शाती है। यह स्वदेशी कार्बन कैप्चर और उपयोग अनुप्रयोगों के बड़े पैमाने पर विस्तार के लिए एक मजबूत आधार भी प्रदान करती है।

 

भारत के निम्न-कार्बन औद्योगिक भविष्य को आकार देना

भारत की पंचामृत प्रतिबद्धताएं निम्न-कार्बन विकास को गति देने और 2070 तक नेट ज़ीरो प्राप्त करने के लिए एक व्यापक संदर्भ प्रदान करती हैं। CCUS उन क्षेत्रों से उत्सर्जन का समाधान करके एक महत्वपूर्ण तकनीकी आयाम जोड़ता है, जहां उत्सर्जन को पूरी तरह समाप्त करना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। अनुसंधान, प्रौद्योगिकी विकास, वित्तपोषण और प्रदर्शन (डेमोंस्ट्रेशन) तक विस्तृत सरकारी पहल इसके व्यापक स्तर पर क्रियान्वयन की नींव तैयार कर रही हैं। जैसे-जैसे ये प्रयास आगे बढ़ेंगे, CCUS संसाधन दक्षता, औद्योगिक डीकार्बोनाइजेशन और अधिक चक्रीय कार्बन अर्थव्यवस्था के विकास में अहम योगदान दे सकता है।

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