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तारों के विस्फोट से बनी धूल में छिपे हो सकते हैं जीवन की उत्पत्ति के रहस्य

 

भारतीय वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में हुए एक दुर्लभ तारकीय विस्फोट का अध्ययन कर कार्बन, ऑक्सीजन और जटिल कार्बनिक पदार्थों की मौजूदगी का पता लगाया

 

–ज्योति रावत –

 पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत कैसे हुई? जीवन के लिए आवश्यक रासायनिक तत्व और पदार्थ आखिर कहां से आए? क्या इनकी उत्पत्ति का संबंध अरबों किलोमीटर दूर अंतरिक्ष में होने वाले तारों के विस्फोटों से भी हो सकता है? ऐसे प्रश्नों के उत्तर खोजने की दिशा में भारतीय वैज्ञानिकों के एक अध्ययन ने महत्वपूर्ण जानकारी दी है। वैज्ञानिकों ने एक तारे में हुए विस्फोट से पैदा हुई अंतरिक्ष की धूल का अध्ययन कर उसमें कार्बन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन और कुछ जटिल कार्बनिक पदार्थों की मौजूदगी के प्रमाण पाए हैं। ये पदार्थ ग्रहों के निर्माण और जीवन के लिए आवश्यक रासायनिक परिस्थितियां विकसित होने की प्रक्रिया को समझने में सहायक हो सकते हैं।

भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने 23 अगस्त 2022 को इस अध्ययन की जानकारी जारी की थी। यह शोध अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका ‘द एस्ट्रोफिजिकल जर्नल’ में प्रकाशित हुआ था।

चित्र 2 : एमआईडीआई / वीएलटीआई (चेसनेउ ईटी एएल अल. , खगोल विज्ञान और खगोल भौतिकी, 2008) द्वारा देखे गए वी 1280 एससीओ के आसपास परिस्थितिजन्य धूल के आवरण के आकार का विकास।

 

दो तारों की जोड़ी में हुआ अनोखा विस्फोट

इस खोज की कहानी वर्ष 2007 से शुरू होती है। उस समय खगोल वैज्ञानिकों ने पृथ्वी से बहुत दूर वृश्चिक तारामंडल में एक असाधारण चमकदार विस्फोट देखा। वैज्ञानिकों ने इस घटना को ‘वी 1280 स्कॉर्पी’ नाम दिया। यह एक नोवा विस्फोट था।

नोवा को समझने के लिए पहले श्वेत वामन तारे के बारे में जानना जरूरी है। जब सूर्य जैसे अपेक्षाकृत कम या मध्यम द्रव्यमान वाले तारे अपने जीवन के अंतिम चरण में पहुंचते हैं, तो उनकी बाहरी परतें अंतरिक्ष में फैल जाती हैं और भीतर एक अत्यंत घना तथा गर्म अवशेष बच जाता है। इसी अवशेष को श्वेत वामन कहा जाता है।

यदि कोई श्वेत वामन दूसरे तारे के साथ जोड़ी में हो और दोनों पर्याप्त निकट हों, तो वह अपने साथी तारे से गैस खींच सकता है। यह गैस श्वेत वामन की सतह पर जमा होती रहती है। एक समय ऐसा आता है जब अत्यधिक तापमान और दबाव के कारण जमा गैस में अचानक नाभिकीय प्रतिक्रिया शुरू हो जाती है। इससे शक्तिशाली विस्फोट होता है और बड़ी मात्रा में पदार्थ अंतरिक्ष में फैल जाता है। इसी घटना को नोवा कहा जाता है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि सामान्य नोवा विस्फोट में श्वेत वामन तारा पूरी तरह नष्ट नहीं होता। उसकी सतह पर जमा पदार्थ का विस्फोट होता है और तारा बना रहता है।

वर्ष 2007 में दिखाई दिए वी 1280 स्कॉर्पी के विस्फोट ने वैज्ञानिकों को इसलिए विशेष रूप से आकर्षित किया क्योंकि इसके कुछ समय बाद विस्फोट से बाहर निकले पदार्थ के आसपास धूल की मोटी परत बनने लगी।

चित्र 3. धूल- पश्चात (पोस्ट-डस्ट) चरण मॉडल के लिए योजनाबद्ध आरेख (पांडे ईटी एएल. एस्ट्रोफिजिकल जर्नल, 2022)।

राजस्थान की वेधशाला से किया गया अध्ययन

कोलकाता स्थित एसएन बोस राष्ट्रीय मूलभूत विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. आरके दास और उनके सहयोगियों ने राजस्थान की माउंट आबू वेधशाला से इस विस्फोट का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि विस्फोट के लगभग एक महीने बाद तारे के आसपास धूल का घना आवरण बनने लगा था। यह आवरण करीब 250 दिनों तक बना रहा।

वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ा सवाल था कि इतने शक्तिशाली और गर्म विस्फोट के बाद अंतरिक्ष में धूल के कण इतनी जल्दी कैसे बन गए। सामान्यतः तारों के बीच फैले पदार्थ से धूल बनने की प्रक्रिया में लंबा समय लग सकता है, जबकि कुछ नोवा विस्फोटों में केवल 30 से 100 दिनों के भीतर धूल बनने लगती है।

इस रहस्य को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने तारे से निकलने वाले अवरक्त प्रकाश का अध्ययन किया। अवरक्त प्रकाश वह विकिरण है जिसे हमारी आंखें सीधे नहीं देख सकतीं, लेकिन वैज्ञानिक उपकरणों की सहायता से उसके आधार पर अंतरिक्ष में मौजूद गैस, धूल और अन्य पदार्थों की जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

शोधकर्ताओं ने कंप्यूटर की सहायता से 50 हजार से अधिक वैज्ञानिक प्रारूप तैयार किए। इनमें तापमान, गैस का घनत्व, चमक और विभिन्न रासायनिक तत्वों की मात्रा बदलकर यह समझने का प्रयास किया गया कि विस्फोट के बाद किन परिस्थितियों में धूल बनी होगी। इन प्रारूपों की तुलना वास्तविक अवलोकनों से की गई। कई वर्षों के अध्ययन के बाद वैज्ञानिक धूल बनने से पहले और बाद की परिस्थितियों का अनुमान लगाने में सफल हुए।

चित्रा 4. धूल- पश्चात चरण (पोस्ट- डस्ट फेज) में देखे गए काले धराशायी ठोस (ऑब्जर्व्ड ब्लैक डैश्ड सॉलिड) और मॉडल से तैयार (जेनरेटेड) वर्णक्रम (स्पेक्ट्रा) (लाल ठोस रेखा – रेड सॉलिड लाइन ) कालखंड (ईपोच) 4 का एनआईआर वर्णक्रम (स्पेक्ट्रम) (पांडे ईटी एएल . , एस्ट्रोफिजिकल जर्नल, 2022 )।

अंतरिक्ष की धूल में मिले जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण पदार्थ

अध्ययन में वैज्ञानिकों को विस्फोट से निकले पदार्थ में कार्बन, नाइट्रोजन और ऑक्सीजन जैसे तत्वों की मौजूदगी के संकेत मिले। धूल में कार्बन के अत्यंत छोटे कणों के साथ सिलिकेट के अपेक्षाकृत बड़े कण भी पाए गए। सिलिकेट ऐसे पदार्थ हैं जिनमें मुख्यतः सिलिकॉन और ऑक्सीजन होते हैं। पृथ्वी की अनेक चट्टानों और खनिजों में भी सिलिकेट पाए जाते हैं।

इसके अलावा वैज्ञानिकों को ऐसे जटिल कार्बनिक ठोस पदार्थों के संकेत भी मिले जिनकी संरचना में कार्बन आधारित विभिन्न रासायनिक समूह शामिल थे। इस प्रकार के पदार्थ अंतरिक्ष में गैस और धूल के विशाल बादलों की रासायनिक प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकते हैं।

यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन और नाइट्रोजन जैसे तत्व जीवन के रासायनिक आधार का हिस्सा हैं। हालांकि, इन तत्वों या कार्बनिक पदार्थों की मौजूदगी का अर्थ यह नहीं है कि वहां जीवन मौजूद है। इससे केवल यह समझने में सहायता मिलती है कि जीवन के लिए आवश्यक पदार्थ अंतरिक्ष में कैसे बनते और फैलते हैं।

तारों से ग्रहों तक पहुंच सकते हैं रासायनिक पदार्थ

वैज्ञानिकों के अनुसार, तारों के विस्फोट से निकली गैस और धूल धीरे-धीरे अंतरिक्ष में फैलकर वहां पहले से मौजूद पदार्थों में मिल सकती है। यही पदार्थ आगे चलकर नए तारों और ग्रहों के निर्माण में योगदान दे सकते हैं।

हमारा सौरमंडल भी लगभग 4.6 अरब वर्ष पहले गैस और धूल के एक विशाल बादल से बना था। वैज्ञानिक लंबे समय से यह समझने का प्रयास कर रहे हैं कि उस प्रारंभिक बादल में मौजूद विभिन्न रासायनिक तत्व और कार्बनिक पदार्थ किन-किन खगोलीय प्रक्रियाओं से आए थे।

वी 1280 स्कॉर्पी जैसे विस्फोटों का अध्ययन इस प्रश्न का एक हिस्सा समझने में सहायता करता है। इससे पता चलता है कि अंतरिक्ष में अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद धूल और जटिल रासायनिक पदार्थ बन सकते हैं।

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि वी 1280 स्कॉर्पी के विस्फोट से बना धूल का आवरण लगातार फैलता रहेगा और हजारों वर्षों में उसके कण तारों के बीच मौजूद अन्य पदार्थों में मिल जाएंगे। ब्रह्मांड के अरबों वर्षों के इतिहास की तुलना में यह समय बहुत छोटा है।

इस अध्ययन में चिली स्थित विशाल दूरबीनों से प्राप्त अवलोकनों का भी उपयोग किया गया। अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों ने विस्फोट के बाद बने धूल के आवरण के फैलने की गति और आकार में बदलाव का अध्ययन किया। इससे नोवा विस्फोट के आसपास धूल बनने और उसके फैलने की प्रक्रिया को समझने में नई जानकारी मिली।

पृथ्वी पर भी पहुंचती है अंतरिक्ष की धूल

यह जानना रोचक है कि पृथ्वी पर हर दिन अंतरिक्ष से बड़ी मात्रा में सूक्ष्म धूल और अन्य छोटे कण पहुंचते हैं। इनमें से अधिकांश इतने छोटे होते हैं कि सामान्यतः दिखाई नहीं देते। इन कणों का अध्ययन वैज्ञानिकों को सौरमंडल के निर्माण और अंतरिक्ष में पदार्थों के विकास के बारे में जानकारी देता है।

हालांकि, पृथ्वी पर पहुंचने वाली सारी अंतरिक्षीय धूल नोवा विस्फोटों से नहीं आती। इसका बड़ा हिस्सा धूमकेतुओं और क्षुद्रग्रहों जैसे सौरमंडलीय पिंडों से संबंधित होता है।

भारतीय वैज्ञानिकों का यह अध्ययन अंतरिक्ष में धूल बनने की एक विशेष प्रक्रिया को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान है। इससे यह संभावना मजबूत होती है कि तारों के विस्फोट ब्रह्मांड में रासायनिक तत्वों और धूल के वितरण में भूमिका निभाते हैं।

पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति का वास्तविक रहस्य अभी पूरी तरह नहीं सुलझा है। लेकिन ऐसे अध्ययन उस लंबी वैज्ञानिक खोज में महत्वपूर्ण कड़ी जोड़ते हैं, जिसके माध्यम से यह समझने का प्रयास किया जा रहा है कि निर्जीव पदार्थों से जीवन के लिए अनुकूल रासायनिक परिस्थितियां आखिर कैसे विकसित हुईं।

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स्रोत : भारत सरकार का विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, 23 अगस्त 2022; एसएन बोस राष्ट्रीय मूलभूत विज्ञान केंद्र का शोध, द एस्ट्रोफिजिकल जर्नल, 2022।

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