‘बेहद मजबूत धातुओं की कटाई होगी आसान, भारतीय वैज्ञानिकों ने विकसित किया विशेष सुरक्षात्मक लेप’

Indian scientists at Hyderabad-based ARCI, under the Department of Science and Technology, have developed advanced nanocomposite coatings that significantly improve the durability of tools used to machine extremely strong, heat-resistant alloys. Widely employed in aircraft engines, power plants and aerospace equipment, these alloys are notoriously difficult to cut. The newly developed titanium- and chromium-based coatings reduce tool wear and improve machining efficiency. Tests demonstrated tool-life improvements ranging from 60 percent to over 200 percent, depending on the alloy and coating combination. This breakthrough promises lower manufacturing costs, reduced machine downtime and greater efficiency in India’s advanced engineering industries
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हैदराबाद के वैज्ञानिकों की महत्वपूर्ण उपलब्धि, धातु काटने वाले औजारों की कार्यक्षमता और उम्र में 200 प्रतिशत से अधिक वृद्धि संभव
-आदित्य सिंह –
हवाई जहाजों के इंजन, अंतरिक्ष यान, बिजली उत्पादन संयंत्र और पेट्रोकेमिकल उद्योगों में इस्तेमाल होने वाले अनेक महत्वपूर्ण पुर्जे साधारण लोहे या इस्पात से नहीं बनाए जा सकते। इन मशीनों को अत्यधिक तापमान, दबाव और घर्षण के बीच लगातार काम करना पड़ता है। इसके लिए विशेष मिश्र धातुओं का उपयोग किया जाता है, जिन्हें वैज्ञानिक भाषा में ‘सुपरएलॉय’ कहा जाता है। ये धातुएं जितनी मजबूत और टिकाऊ होती हैं, इन्हें काटना और मनचाहा आकार देना उतना ही कठिन होता है। अब भारतीय वैज्ञानिकों ने इस समस्या का महत्वपूर्ण समाधान खोज निकाला है।भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत हैदराबाद स्थित अंतरराष्ट्रीय उन्नत चूर्ण धातुकर्म एवं नवीन सामग्री अनुसंधान केंद्र (एआरसीआई) के वैज्ञानिकों ने विशेष नैनोकंपोजिट सुरक्षात्मक लेप विकसित किए हैं। इनके प्रयोग से सुपरएलॉय को काटने वाले औजारों की कार्यावधि में 200 प्रतिशत से अधिक वृद्धि दर्ज की गई है। यह उपलब्धि विमानन, ऊर्जा और उन्नत विनिर्माण उद्योगों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
आखिर सुपरएलॉय क्या हैं?
सुपरएलॉय ऐसी विशेष मिश्र धातुएं हैं, जिन्हें अत्यधिक गर्मी, दबाव और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मजबूती बनाए रखने के लिए विकसित किया जाता है। इनमें मुख्यतः निकल, कोबाल्ट अथवा लोहे के साथ क्रोमियम, टाइटेनियम, टंगस्टन और एल्युमिनियम जैसे तत्व निश्चित अनुपात में मिलाए जाते हैं।साधारण इस्पात अत्यधिक गर्म होने पर अपनी मजबूती खोने लगता है, जबकि विशेष सुपरएलॉय लगभग एक हजार डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक तापमान पर भी उपयोगी यांत्रिक गुण बनाए रख सकते हैं। इनमें जंग और रासायनिक क्षरण का प्रतिरोध करने की भी क्षमता होती है।इनका एक महत्वपूर्ण गुण ‘क्रीप प्रतिरोध’ है। लगातार ऊंचे तापमान और दबाव के कारण धातुओं में धीरे-धीरे स्थायी विकृति आने लगती है। इस प्रक्रिया को क्रीप कहते हैं। सुपरएलॉय इस विकृति का प्रभावी प्रतिरोध करते हैं। इसीलिए इनका उपयोग उन मशीनों में किया जाता है, जिनकी मामूली खराबी भी गंभीर दुर्घटना का कारण बन सकती है।

जेट इंजन में क्यों जरूरी हैं ये धातुएं?
आधुनिक जेट इंजन सुपरएलॉय के महत्व का सबसे अच्छा उदाहरण हैं। विमान का इंजन बाहर से हवा खींचकर उसे संपीड़ित करता है। इसके बाद ईंधन के साथ उसका दहन होता है और अत्यधिक गर्म गैसों का प्रवाह विमान को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक बल उत्पन्न करता है।इंजन के दहन कक्ष और टरबाइन क्षेत्र में गैसों का तापमान लगभग 1500 से 1700 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। इतनी गर्मी में साधारण धातुओं से बने पुर्जे अपनी मजबूती खो देंगे। निकल और कोबाल्ट आधारित सुपरएलॉय ऐसे वातावरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।हालांकि, आधुनिक इंजनों में गैसों का तापमान कभी-कभी सुपरएलॉय के गलनांक से भी अधिक होता है। इसलिए टरबाइन ब्लेड के भीतर सूक्ष्म शीतलन मार्ग बनाए जाते हैं, जिनसे अपेक्षाकृत ठंडी हवा प्रवाहित होती है। विशेष तापरोधी लेप भी इस्तेमाल किए जाते हैं। धातु की मजबूती, शीतलन व्यवस्था और सुरक्षात्मक लेप मिलकर इंजन को सुरक्षित रखते हैं।टरबाइन ब्लेड को गर्मी के अतिरिक्त तीव्र घूर्णन से उत्पन्न अपकेंद्रीय बल भी सहना पड़ता है। हजारों चक्कर प्रति मिनट की गति से घूमते समय ब्लेड पर अत्यधिक तनाव पड़ता है। सुपरएलॉय का क्रीप प्रतिरोध उन्हें ऐसी परिस्थितियों में टिकाऊ बनाता है।उच्च तापमान पर काम करने की क्षमता से गैस टरबाइन की दक्षता बढ़ाने में सहायता मिलती है। यही कारण है कि आधुनिक विमानन और ऊर्जा उत्पादन में इन धातुओं का विशेष महत्व है।
मजबूत धातुओं की कटाई सबसे बड़ी चुनौती
सुपरएलॉय की मजबूती ही इनके निर्माण और प्रसंस्करण में बड़ी कठिनाई पैदा करती है। इनकोनेल 718, इनकोनेल 625 और इनकोनेल 617 जैसी निकल आधारित मिश्र धातुओं को काटते समय औजारों पर अत्यधिक दबाव और घर्षण पड़ता है।कटाई के दौरान उत्पन्न गर्मी आसानी से बाहर नहीं निकल पाती। इसके कारण औजार की धार का तापमान बढ़ जाता है। कई बार काटी जा रही धातु के सूक्ष्म कण औजार से चिपककर परत बना लेते हैं। जब यह परत अलग होती है, तो औजार की धार का कुछ हिस्सा भी क्षतिग्रस्त हो सकता है।परिणामस्वरूप औजार जल्दी घिसते हैं, बार-बार बदलने पड़ते हैं और उत्पादन बाधित होता है। महंगे औद्योगिक पुर्जों के निर्माण में यह समस्या लागत बढ़ाने के साथ उनकी गुणवत्ता को भी प्रभावित कर सकती है।
भारतीय वैज्ञानिकों ने कैसे खोजा समाधान?
एआरसीआई के वैज्ञानिकों ने टंगस्टन कार्बाइड से बने कटाई औजारों पर दो प्रकार के विशेष नैनोकंपोजिट लेप लगाने का प्रयोग किया।पहला लेप टाइटेनियम-एल्युमिनियम-सिलिकॉन नाइट्राइड और दूसरा क्रोमियम-एल्युमिनियम-सिलिकॉन नाइट्राइड से तैयार किया गया। इन्हें अत्यंत सूक्ष्म संरचना वाला ऐसा सुरक्षात्मक आवरण बनाया गया, जो औजार की सतह को घिसाव और क्षति से बचाने में सहायता करता है।इन लेपों को औजारों पर चढ़ाने के लिए ‘कैथोडिक आर्क भौतिक वाष्प निक्षेपण’ नामक तकनीक अपनाई गई। इसमें नियंत्रित परिस्थितियों में पदार्थ की अत्यंत पतली परत औजार की सतह पर जमा की जाती है।इससे औजार की सतह अधिक घिसावरोधी बनती है और काटी जा रही धातु के साथ उसकी अवांछित चिपकन कम हो सकती है। परिणामस्वरूप औजार की धार अधिक समय तक सुरक्षित रहती है।
अलग धातु के लिए अलग लेप
इस अनुसंधान का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि सभी सुपरएलॉय के लिए एक ही सुरक्षात्मक लेप समान रूप से प्रभावी नहीं होता।वैज्ञानिकों के परीक्षणों में इनकोनेल 718 पर टाइटेनियम-एल्युमिनियम-सिलिकॉन नाइट्राइड लेप लगाने से औजार की कार्यावधि लगभग 80 प्रतिशत बढ़ी। इनकोनेल 625 की कटाई में इसी लेप से लगभग 60 प्रतिशत सुधार हुआ।इसके विपरीत, इनकोनेल 617 के लिए क्रोमियम-एल्युमिनियम-सिलिकॉन नाइट्राइड अधिक प्रभावी साबित हुआ। इससे औजार की कार्यावधि में 200 प्रतिशत से अधिक वृद्धि दर्ज की गई।इसका अर्थ है कि औजार की उपयोगिता बढ़ाने के लिए केवल उसकी कठोरता पर्याप्त नहीं है। काटी जाने वाली धातु के रासायनिक और यांत्रिक गुणों के अनुरूप सुरक्षात्मक लेप का चुनाव भी आवश्यक है।
उद्योगों को क्या लाभ होगा?
इस तकनीक से औजारों को बार-बार बदलने की आवश्यकता घट सकती है। मशीनों के बंद रहने का समय कम होगा और उत्पादन की निरंतरता बढ़ेगी। औजारों की खपत घटने से निर्माण लागत कम करने में भी सहायता मिल सकती है।विशेषकर विमानन, अंतरिक्ष, बिजली उत्पादन और पेट्रोकेमिकल उद्योगों में जटिल पुर्जों के निर्माण को अधिक किफायती और भरोसेमंद बनाया जा सकेगा। हालांकि, वास्तविक औद्योगिक लाभ उत्पादन की परिस्थितियों और बड़े पैमाने पर तकनीक के उपयोग से निर्धारित होंगे।यह उपलब्धि भारत में उन्नत सामग्री विज्ञान और विनिर्माण प्रौद्योगिकी के विकास की संभावनाओं को भी रेखांकित करती है।इस अनुसंधान का मूल संदेश है कि अत्यधिक मजबूत धातुओं को काटने के लिए केवल अधिक शक्तिशाली मशीनें ही नहीं, बल्कि अधिक बुद्धिमत्तापूर्ण सामग्री प्रौद्योगिकी भी जरूरी है। सही धातु के लिए सही सुरक्षात्मक लेप का चयन भविष्य के औद्योगिक उत्पादन को अधिक टिकाऊ, किफायती और दक्ष बना सकता है।
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