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अंतरिक्ष में बढ़ता कचरे काअम्बार  : कहीं बंद न हो जाए ब्रह्मांड का रास्ता!

Space debris is emerging as a serious threat to satellites, communication networks, weather forecasting, and human space exploration. Thousands of defunct satellites and fragments orbit Earth at tremendous speeds, creating risks of catastrophic collisions and the dreaded Kessler Syndrome. With increasing space activities, protecting orbital environments has become essential. India is addressing this challenge through ISRO’s NETRA surveillance programme, its debris-free space mission target for 2030, and innovative technologies developed by private startups. Robotic systems, electromagnetic tethers, and laser-based solutions offer promising possibilities. International cooperation and responsible space practices are crucial to ensuring sustainable space exploration for future generations.

अंतरिक्ष मलबे की चुनौती, उसके खतरनाक परिणाम और सफाई की नई तकनीकें

— उषा रावत – —

मनुष्य ने धरती पर विकास के नाम पर नदियों, समुद्रों, जंगलों और वातावरण को प्रदूषित करने के बाद अब अंतरिक्ष में भी कचरे का अंबार लगाना शुरू कर दिया है। जिस अंतरिक्ष को कभी अनंत संभावनाओं का क्षेत्र माना जाता था, वहां आज हजारों निष्क्रिय उपग्रह, रॉकेटों के टूटे हिस्से और लाखों छोटे-बड़े टुकड़े पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे हैं। यह कचरा सामान्य कूड़े की तरह किसी एक स्थान पर जमा नहीं है, बल्कि बंदूक की गोली से कई गुना अधिक रफ्तार से अंतरिक्ष में घूम रहा है। वैज्ञानिकों को आशंका है कि यदि समय रहते इसकी रोकथाम नहीं हुई तो भविष्य में अंतरिक्ष की कुछ कक्षाओं का उपयोग बेहद जोखिमपूर्ण हो सकता है। राहत की बात यह है कि भारत भी इस चुनौती से निपटने के लिए नई तकनीकों के विकास में सक्रिय भूमिका निभा रहा है।

हाल ही में केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा अंतरिक्ष विभाग के राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने अंतरिक्ष मलबा हटाने की तकनीकों में भारतीय निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी का उल्लेख किया। यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आने वाले दशकों में अंतरिक्ष की सफाई केवल वैज्ञानिक आवश्यकता नहीं, बल्कि एक बड़ा तकनीकी और व्यावसायिक क्षेत्र भी बन सकती है।

आखिर अंतरिक्ष में कचरा आता कहां से है?

वर्ष 1957 में सोवियत संघ ने दुनिया का पहला कृत्रिम उपग्रह स्पुतनिक-1 अंतरिक्ष में भेजा था। इसके बाद अमेरिका, रूस, यूरोपीय देशों, चीन, भारत और अनेक अन्य देशों ने हजारों उपग्रह प्रक्षेपित किए। आज संचार, मौसम, कृषि, आपदा प्रबंधन, रक्षा और इंटरनेट जैसी सेवाएं उपग्रहों पर निर्भर हैं। लेकिन प्रत्येक प्रक्षेपण अपने पीछे कुछ न कुछ अवशेष छोड़ सकता है।

अंतरिक्ष मलबे में ऐसे उपग्रह शामिल हैं जिनका कार्यकाल समाप्त हो चुका है। इसके अतिरिक्त रॉकेटों के खाली चरण, टूटे उपकरण, विस्फोटों और टक्करों से उत्पन्न टुकड़े भी इसमें शामिल हैं। पृथ्वी से लगभग 160 से 2,000 किलोमीटर की ऊंचाई तक फैली निम्न पृथ्वी कक्षा में यह समस्या विशेष रूप से गंभीर है।

इस क्षेत्र में वस्तुएं सामान्यतः लगभग 7 से 8 किलोमीटर प्रति सेकंड की गति से चलती हैं। अर्थात एक सेकंड में सात-आठ किलोमीटर की दूरी! इतनी रफ्तार से टकराने वाला छोटा-सा धातु का टुकड़ा भी किसी महंगे उपग्रह को निष्क्रिय कर सकता है। कुछ मिलीमीटर के कण भी संवेदनशील उपकरणों को क्षतिग्रस्त कर सकते हैं।

जब एक टक्कर पैदा कर सकती है हजारों नई टक्करें

अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी चिंता उस स्थिति को लेकर है जिसे केस्लर सिंड्रोम कहा जाता है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के वैज्ञानिक डोनाल्ड जे. केस्लर ने वर्ष 1978 में इस खतरे का वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत किया था।

इसकी कल्पना सड़क पर होने वाली किसी बड़ी दुर्घटना से की जा सकती है। अंतर केवल इतना है कि अंतरिक्ष में टक्कर से उत्पन्न मलबा सड़क पर रुकता नहीं, बल्कि तेज गति से घूमता रहता है।

मान लीजिए, दो उपग्रह आपस में टकरा गए। उनसे सैकड़ों या हजारों टुकड़े निकलेंगे। ये टुकड़े दूसरे उपग्रहों से टकराकर और अधिक मलबा पैदा कर सकते हैं। इस प्रकार टक्करों की एक ऐसी श्रृंखला शुरू हो सकती है जो स्वयं नए खतरों को जन्म देती रहे।

इस आशंका का वास्तविक संकेत फरवरी 2009 में मिला, जब एक सक्रिय अमेरिकी संचार उपग्रह इरिडियम-33 और निष्क्रिय रूसी उपग्रह कॉसमॉस-2251 आपस में टकरा गए। इस दुर्घटना से बड़ी संख्या में मलबे के टुकड़े पैदा हुए।

केस्लर सिंड्रोम का अर्थ यह नहीं कि पूरा अंतरिक्ष अचानक बंद हो जाएगा, बल्कि यह कि कुछ कक्षाओं में मलबे का घनत्व इतना बढ़ सकता है कि वहां उपग्रहों का सुरक्षित संचालन लगातार कठिन और महंगा होता जाए।

धरती पर भी पड़ेगा अंतरिक्ष प्रदूषण का असर

अंतरिक्ष मलबा केवल वैज्ञानिकों की चिंता नहीं है। इसका सीधा संबंध आम आदमी के जीवन से भी है। आज मौसम का पूर्वानुमान, चक्रवात की चेतावनी, मोबाइल संचार, दूरदर्शन प्रसारण, समुद्री परिवहन, विमानन और दिशा बताने वाली प्रणालियां उपग्रहों की सहायता से संचालित होती हैं।

यदि महत्वपूर्ण उपग्रह क्षतिग्रस्त होते हैं तो इन सेवाओं में व्यवधान पैदा हो सकता है। विशेष रूप से भारत जैसे देश में, जहां बाढ़, चक्रवात, भूस्खलन और अन्य प्राकृतिक आपदाओं की निगरानी में उपग्रह महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, अंतरिक्ष परिसंपत्तियों की सुरक्षा अत्यंत आवश्यक है।

उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्यों के लिए भी यह विषय महत्वपूर्ण है। उपग्रहों से मिलने वाली सूचनाएं हिमनदों, मौसम, वनाग्नि, भूस्खलन और आपदाग्रस्त क्षेत्रों की निगरानी में सहायक होती हैं।

मानव अंतरिक्ष उड़ानों के लिए खतरा और भी गंभीर है। भारत के गगनयान कार्यक्रम और प्रस्तावित भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन की सुरक्षा के लिए मलबे की सटीक निगरानी आवश्यक होगी। अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन को भी संभावित टक्करों से बचने के लिए समय-समय पर अपनी कक्षा में परिवर्तन करना पड़ता है। ऐसी गतिविधियों में अतिरिक्त ईंधन खर्च होता है और मिशन की संचालन अवधि प्रभावित हो सकती है।

अंतरिक्ष की सफाई कैसे होगी?

धरती पर कचरा उठाने के लिए सफाईकर्मी और मशीनें उपलब्ध हैं, लेकिन अंतरिक्ष में यह काम अत्यंत जटिल है। वहां किसी वस्तु को पकड़ने के लिए सफाई करने वाले यान को पहले उसकी गति और कक्षा के अनुरूप पहुंचना पड़ता है।

वैज्ञानिक इस समस्या के समाधान के लिए अनेक तकनीकें विकसित कर रहे हैं।

सबसे रोचक तकनीक रोबोटिक भुजाओं और लचीली पकड़ वाली युक्तियों की है। इनमें विशेष यान निष्क्रिय उपग्रहों के पास जाकर उन्हें पकड़ने का प्रयास करते हैं। कुछ प्रणालियों में जाल और विशेष पकड़ने वाले उपकरणों का उपयोग प्रस्तावित है। पकड़े गए मलबे को ऐसी निचली कक्षा में पहुंचाया जा सकता है जहां वह पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करके जल जाए।

दूसरी तकनीक लंबी विद्युत-संवाहक तारों की है। इन्हें इलेक्ट्रोडायनामिक टेथर कहा जाता है। पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र के साथ इनकी परस्पर क्रिया से ऐसा बल उत्पन्न किया जा सकता है जो उपग्रह की कक्षीय गति घटाने में मदद करे। इससे अतिरिक्त ईंधन के बिना भी उसे धीरे-धीरे नीचे लाना संभव हो सकता है।

तीसरी संभावना लेजर तकनीक की है। वैज्ञानिक ऐसी प्रणालियों का अध्ययन कर रहे हैं जिनसे छोटे मलबे की गति या दिशा में मामूली परिवर्तन करके टक्कर का खतरा कम किया जा सके। हालांकि इनका व्यापक व्यावहारिक उपयोग अभी तकनीकी और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों से घिरा है।

एक अन्य महत्वपूर्ण उपाय उपग्रहों के निर्माण में ही बदलाव करना है। भविष्य के उपग्रहों में ऐसे उपकरण और पकड़ने के स्थान बनाए जा सकते हैं जिनकी सहायता से कार्यकाल समाप्त होने पर उन्हें आसानी से हटाया जा सके।

भारत की पहल और निजी क्षेत्र की भागीदारी

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने अंतरिक्ष वस्तुओं की निगरानी के लिए ‘नेटरा’ परियोजना विकसित की है। इसका उद्देश्य पृथ्वी की कक्षा में मौजूद वस्तुओं की पहचान, निगरानी और संभावित टक्करों का आकलन करना है।

भारत ने वर्ष 2030 तक अपने अंतरिक्ष अभियानों को मलबा-मुक्त बनाने का लक्ष्य भी घोषित किया है। इसका आशय यह है कि मिशन की योजना और संचालन में ऐसे उपाय अपनाए जाएं जिनसे नए मलबे का निर्माण न्यूनतम हो तथा कार्यकाल समाप्त होने के बाद उपग्रहों और रॉकेटों का सुरक्षित निस्तारण किया जा सके।

हैदराबाद की निजी कंपनी कॉस्मोसर्व स्पेस की ‘बेस-1’ सुविधा और लचीली रोबोटिक पकड़ संबंधी तकनीकें भी इसी दिशा में उल्लेखनीय पहल के रूप में सामने आई हैं। कंपनी ने ‘एम्ब्रेस’ अभियान तथा भविष्य में व्यावसायिक मलबा हटाने की योजनाओं का उल्लेख किया है। हालांकि तकनीक का परीक्षण, उसकी विश्वसनीयता सिद्ध होना और नियमित व्यावसायिक सेवा शुरू होना अलग-अलग चरण हैं।

भारत अंतरिक्ष मलबे से संबंधित अंतरराष्ट्रीय समन्वय प्रयासों में भी भाग ले रहा है। इस चुनौती का समाधान किसी एक देश के प्रयासों से संभव नहीं है, क्योंकि पृथ्वी की कक्षाएं संपूर्ण मानवता की साझा उपयोग-व्यवस्था का हिस्सा हैं।

अंतरिक्ष की सुरक्षा भविष्य की जिम्मेदारी

अंतरिक्ष मलबे की समस्या का एक आर्थिक पहलू भी है। आने वाले वर्षों में उपग्रहों की मरम्मत, ईंधन भरने, निष्क्रिय उपग्रहों को हटाने और अंतरिक्ष यातायात की निगरानी जैसी सेवाओं का नया बाजार विकसित हो सकता है। भारतीय वैज्ञानिक संस्थानों और नवोदित कंपनियों के लिए इसमें महत्वपूर्ण अवसर हैं।

लेकिन सबसे बड़ी चुनौती तकनीक से अधिक जिम्मेदारी की है। अंतरिक्ष का उपयोग करने वाले देशों और कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके अभियान भविष्य की पीढ़ियों के लिए खतरा न बनें।

मानव सभ्यता ने धरती के पर्यावरण को प्रदूषित करने की भारी कीमत चुकाई है। अंतरिक्ष के मामले में अभी हमारे पास उस भूल को दोहराने से बचने का अवसर है। अंतरिक्ष की सफाई का अर्थ केवल पुराने उपग्रह हटाना नहीं, बल्कि विज्ञान और विकास के उस रास्ते को सुरक्षित रखना है जिस पर मानवता का भविष्य निर्भर करता है।

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