Front Pageब्लॉग

शब्दों का मेला: मेरी बौद्धिक विरासत

Dehradun’s historic Parade Ground transformed into a vibrant ocean of knowledge during the National Book Trust’s ‘Doon Book Festival’ from 4 to 12 April. In this digital age of instant information, the fair reaffirmed the timeless charm of physical books — their touch, fragrance, and depth. Among thousands of titles, 18 books from Uttarakhand were prominently featured. I felt immense pride as two of my books were selected. At the NBT stall, my book on tribal communities sold out three days before the festival ended, while my book on the Freedom Struggle and Journalism had only a few copies left. Similar enthusiasm was seen at my publisher Winsar’s stall, where most of my titles were nearly sold out. Meeting readers, signing books, and hearing their appreciation made 48 years of journalism feel truly worthwhile. This was not just a book fair — it was an emotional journey that reaffirmed my belief: a writer’s real wealth lies not in material success, but in the hearts and minds touched by his words

–जयसिंह रावत –

देहरादून का ऐतिहासिक परेड मैदान बीते 4 से 12 अप्रैल तक ज्ञान और शब्दों के महाकुंभ का साक्षी बना। नेशनल बुक ट्रस्ट (NBT) द्वारा आयोजित ‘दून पुस्तक महोत्सव’ केवल पुस्तकों की प्रदर्शनी नहीं, बल्कि साहित्य और संस्कृति का एक जीवंत संगम था। आज के इस तीव्र डिजिटल युग में, जहाँ सूचनाएं स्क्रीन पर उंगलियों के एक ‘स्वाइप’ पर नाचती हैं, पुस्तक मेलों का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। ये आयोजन हमें उस मानवीय स्पर्श और वैचारिक गहराई से जोड़ते हैं, जो केवल कागज़ की महक और लेखक के हृदय से निकले शब्दों में ही निहित होती है।

 

Commandant Garhwal Rifles Regimental Center Lansdowne , Brigadier Vinod Negi buying my book in the stall of Vinsar publishing in Doon Book feastival.

 

पुस्तकों की महत्ता और मेले का आकर्षण

पुस्तकों का हमारे जीवन में स्थान अपरिवर्तनीय और शाश्वत है। एक अच्छी पुस्तक केवल कागजों का पुलिंदा नहीं, बल्कि विचारों का वह पुंज है जो मनुष्य के अंतर्मन को आलोकित करती है। जहाँ सूचनाएं क्षणिक होती हैं, वहीं पुस्तकें स्थायी ज्ञान का स्रोत होती हैं। वे न केवल वर्तमान पाठक का मार्गदर्शन करती हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दस्तावेज के रूप में भी सुरक्षित रहती हैं। एक लेखक जब अपने अनुभवों को शब्दों में पिरोता है, तो वह वास्तव में समय को फ्रीज कर देता है, जिससे सदियों बाद भी कोई पाठक उस कालखंड और सोच से रूबरू हो सके।

डिजिटल क्रांति के इस युग में ‘पुस्तक मेलों’ का आकर्षण कम होने के बजाय और बढ़ा है। ये मेले साहित्य के प्रति अनुराग रखने वालों के लिए किसी तीर्थ से कम नहीं होते। देहरादून के परेड मैदान में आयोजित इस पुस्तक महोत्सव ने सिद्ध किया कि आज भी पाठकों का एक बड़ा वर्ग भौतिक रूप से किताबों को छूने, उनके पन्ने पलटने और उनकी महक को महसूस करने के लिए लालायित है। पुस्तक मेले लेखकों और पाठकों के बीच के सेतु का कार्य करते हैं, जहाँ विचारों का आदान-प्रदान प्रत्यक्ष रूप से संभव होता है।

Former Chief Secretary Mrs. Radha Raturi and former Director General Uttarakhand police greets and encourages me at stall number 99 of Winsar Publication.

नेशनल बुक ट्रस्ट (NBT) जैसे प्रतिष्ठित संस्थान का ऐसे आयोजनों में होना इसकी महत्ता को द्विगुणित कर देता है। इस मेले में देश भर के ख्यातिलब्ध लेखकों की हज़ारों कृतियों का प्रदर्शन किया गया, जो बौद्धिक समृद्धि का प्रतीक था। उत्तराखंड जैसे ज्ञान-प्रधान राज्य के लिए यह विशेष गर्व का विषय रहा कि इस विशाल वैश्विक संकलन में प्रदेश के लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकारों की 18 पुस्तकों को स्थान मिला।

मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से यह क्षण अत्यंत गौरवशाली रहा कि इन चुनिंदा कृतियों में मेरी दो पुस्तकें भी शामिल थीं। यह न केवल एक लेखक के रूप में मेरी आधी सदी की तपस्या का प्रतिफल था, बल्कि इस बात का भी प्रमाण था कि आंचलिक विषयों और शोधपरक साहित्य की मांग आज राष्ट्रीय स्तर पर है। मेले की चहल-पहल और पाठकों का उत्साह यह भरोसा दिलाता है कि जब तक पुस्तकें हैं, मानवता की सामूहिक बुद्धिमत्ता सुरक्षित है।

पाठकों का प्रेम: जब शब्द ही पहचान बन गए

एक लेखक के रूप में मेरे लिए यह क्षण गौरव और संतोष से भरा था।नेशनल बुक ट्रस्ट (NBT) के स्टॉल पर जनजातियों पर आधारित मेरी पुस्तक का स्टॉक मेले के समापन से तीन दिन पहले ही समाप्त हो गया। वहीं, ‘स्वाधीनता आंदोलन और पत्रकारिता’ पर आधारित मेरी पुस्तक की भी मात्र 5-6 प्रतियां ही शेष रहीं।

मेरे मूल प्रकाशक विंसर प्रकाशन के स्टॉल पर भी दृश्य कुछ ऐसा ही था। वहां मेरी आधा दर्जन से अधिक पुस्तकों का स्टॉक समाप्ति की ओर था। स्थिति यह थी कि प्रकाशक को मेरी एक पुस्तक को डिस्प्ले से हटाना पड़ा, क्योंकि उसकी केवल अंतिम प्रति ही बची थी।

वह अविस्मरणीय अनुभव

विंसर प्रकाशन के स्टॉल पर बैठकर पाठकों के बीच समय बिताना मेरे लिए किसी भावनात्मक तीर्थयात्रा से कम नहीं था। जब अनजान चेहरे मेरा और मेरी पुस्तकों का नाम लेकर काउंटर पर पहुंचते, तो मन के किसी कोने में दबी आधी सदी की पत्रकारिता का संघर्ष सार्थक लगने लगता। काउंटर पर बैठी बिटिया श्रीमती पंत जब पाठकों से कहतीं— यही तो हैं लेखक जो आपके सामने बैठे हैं—तो उन अनजान चेहरों की आँखों में जो सम्मान दिखता था, वह किसी भी पुरस्कार से बड़ा था।

जीवन की सार्थकता का बोध

लगभग 48 वर्षों की पत्रकारिता और एक सादगीपूर्ण जीवन जीने के बाद, आज मुझे यह महसूस हुआ कि मेरा जीवन ‘अकारथ’ नहीं गया। भले ही मैंने भौतिक धन या वैभव का संचय न किया हो, लेकिन पुस्तकों के रूप में जो बौद्धिक संपदा मैंने अर्जित की है, वही मेरी असली विरासत है। उन अनजान पाठकों का प्रेम यह तस्दीक करता है कि लेखक कभी अकेला नहीं होता; उसके शब्द हज़ारों दिलों में धड़कते हैं।

मैं अपने उन सभी मित्रों, शुभेच्छुओं और पाठकों का हृदय से आभारी हूँ जिन्होंने इन स्टॉलों पर पहुँचकर मेरा मान बढ़ाया। साथ ही, उन चेहरों का भी धन्यवाद, जिन्होंने मेले में होते हुए भी मुझे याद नहीं किया, क्योंकि उनकी उपेक्षा ने ही मुझे उन ‘अनजान’ पाठकों के प्रेम की असली कीमत समझाई।

पुस्तकों का यह संसार यूं ही बना रहे, क्योंकि जहाँ शब्द जीवित हैं, वहाँ समाज की चेतना जीवित है।

(लेख में प्रकट विचार लेखक के निजी हैं, जिनसे एडमिन का सहमत या असहमत होना जरुरी नहीं है. लेखक स्वयं प्रतिठित लेखक और पत्रकार हैं..एडमिन )

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!