बार-बार विस्फोट करने वाला तारा खोल सकता है ब्रह्मांड के बड़े रहस्य

पृथ्वी से करीब पांच हजार प्रकाश-वर्ष दूर दो तारों की अनोखी जोड़ी का अध्ययन कर रहे भारतीय वैज्ञानिक, भविष्य में महाविस्फोट की संभावना
–ज्योति रावत –
ब्रह्मांड में असंख्य तारे हैं, लेकिन कुछ तारों का व्यवहार इतना विचित्र होता है कि वे खगोल वैज्ञानिकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बन जाते हैं। ऐसे ही एक तारे में बार-बार होने वाले विस्फोटों ने वैज्ञानिकों की उत्सुकता बढ़ा दी है। पृथ्वी से लगभग पांच हजार प्रकाश-वर्ष दूर स्थित इस तारा प्रणाली में समय-समय पर इतने शक्तिशाली विस्फोट होते हैं कि सामान्यतः दूरबीन से दिखाई देने वाला तारा अचानक इतना चमक उठता है कि उसे कुछ समय के लिए बिना दूरबीन के भी देखा जा सकता है। भारतीय वैज्ञानिकों का मानना है कि इन विस्फोटों का अध्ययन भविष्य में होने वाले अत्यंत शक्तिशाली तारकीय विस्फोटों की प्रक्रिया समझने में मदद कर सकता है।
इस तारा प्रणाली का नाम आरएस ऑफियुकी (RS Ophiuchi) है। यह आकाश में ऑफियुकस तारामंडल की दिशा में स्थित है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें एक नहीं, बल्कि दो तारे हैं, जो एक-दूसरे की परिक्रमा करते हैं। इनमें एक श्वेत वामन और दूसरा लाल विशालकाय तारा है।
श्वेत वामन वास्तव में ऐसे तारे का अत्यंत सघन अवशेष होता है, जिसने अपने जीवन का सामान्य ऊर्जा उत्पादन करने वाला चरण पूरा कर लिया है। आकार में अपेक्षाकृत छोटा होने के बावजूद इसमें बहुत अधिक पदार्थ समाया होता है। दूसरी ओर लाल विशालकाय तारा अपने जीवन के अंतिम चरणों में पहुंचकर काफी फैल चुका होता है।
इस जोड़ी में लाल विशालकाय तारे से निकलने वाली हाइड्रोजनयुक्त गैस धीरे-धीरे श्वेत वामन की सतह पर जमा होती रहती है। जब इस गैस का तापमान और दबाव अत्यधिक बढ़ जाता है, तो उसमें अचानक नाभिकीय संलयन की प्रक्रिया तेज हो जाती है। इससे भारी मात्रा में ऊर्जा निकलती है और एक शक्तिशाली विस्फोट होता है। खगोल विज्ञान में ऐसी घटना को नोवा विस्फोट कहा जाता है।
दिलचस्प बात यह है कि इस विस्फोट में श्वेत वामन सामान्यतः पूरी तरह नष्ट नहीं होता। कुछ समय बाद उसके ऊपर दोबारा गैस जमा होने लगती है और परिस्थितियां अनुकूल होने पर फिर विस्फोट हो सकता है। इसीलिए ऐसी प्रणालियों को आवर्ती नोवा कहा जाता है।
अगस्त 2021 में फिर चमका तारा
आरएस ऑफियुकी में वर्ष 1985 के बाद भी कई बार विस्फोट दर्ज किए गए हैं। इसका एक महत्वपूर्ण विस्फोट 8 अगस्त 2021 को हुआ। उस समय इसकी चमक इतनी बढ़ गई कि अनुकूल परिस्थितियों में इसे सामान्य आंखों से भी देखा जा सकता था।
इस घटना ने वैज्ञानिकों को तारे के भीतर होने वाली प्रक्रियाओं का अध्ययन करने का महत्वपूर्ण अवसर दिया। विस्फोट के बाद तारे की चमक, तापमान और उससे निकलने वाले प्रकाश में होने वाले परिवर्तनों को दर्ज किया गया।
भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत संचालित एस.एन. बोस राष्ट्रीय मौलिक विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने भी इस घटना का अध्ययन किया। खगोल भौतिकीविद् डॉ. रामकृष्ण दास के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने अंतरराष्ट्रीय खगोलीय आंकड़ों के संग्रह से प्राप्त प्रकाश संबंधी जानकारी का विश्लेषण किया।
वैज्ञानिकों ने विशेष रूप से तारे के वर्णक्रम का अध्ययन किया। वर्णक्रम का अर्थ है किसी तारे से आने वाले प्रकाश को उसकी विभिन्न तरंगदैर्घ्यों में बांटकर देखना। इससे वैज्ञानिक पता लगा सकते हैं कि तारे में कौन-कौन से रासायनिक तत्व मौजूद हैं, उसका तापमान कितना है और विस्फोट से निकला पदार्थ किस गति से फैल रहा है।
क्या भविष्य में होगा इससे भी बड़ा विस्फोट?
वैज्ञानिकों की दिलचस्पी केवल बार-बार होने वाले इन विस्फोटों में नहीं है। वे यह भी जानना चाहते हैं कि क्या आरएस ऑफियुकी भविष्य में एक अत्यंत शक्तिशाली सुपरनोवा विस्फोट का कारण बन सकता है।
नोवा और सुपरनोवा में महत्वपूर्ण अंतर है। नोवा में तारे की सतह पर जमा गैस में विस्फोट होता है, जबकि सुपरनोवा कहीं अधिक शक्तिशाली घटना है, जिसमें तारे की संरचना में विनाशकारी परिवर्तन हो सकता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार आरएस ऑफियुकी का श्वेत वामन काफी भारी है। इसका द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान के लगभग 1.2 से 1.38 गुना के बीच होने का अनुमान लगाया गया है।
भारतीय मूल के महान खगोल भौतिकीविद् सुब्रह्मण्यन चंद्रशेखर ने श्वेत वामन तारों के द्रव्यमान की एक महत्वपूर्ण सैद्धांतिक सीमा निर्धारित की थी। इसे चंद्रशेखर सीमा कहा जाता है। सामान्यतः यह सूर्य के द्रव्यमान के लगभग 1.4 गुना के आसपास मानी जाती है।
यदि किसी श्वेत वामन का द्रव्यमान लगातार बढ़ता रहे और वह उपयुक्त परिस्थितियों में इस सीमा के निकट पहुंच जाए, तो उसमें ऐसी प्रक्रियाएं शुरू हो सकती हैं जो टाइप 1ए सुपरनोवा का कारण बनें।
हालांकि आरएस ऑफियुकी का भविष्य अभी निश्चित नहीं है। वैज्ञानिकों को यह भी जानना होगा कि प्रत्येक नोवा विस्फोट के दौरान श्वेत वामन जितना पदार्थ प्राप्त करता है, उससे कम पदार्थ बाहर निकालता है या अधिक। यदि उसका कुल द्रव्यमान लगातार बढ़ता है, तभी भविष्य में सुपरनोवा बनने की संभावना मजबूत होगी।
विस्फोट से निकले पदार्थ में मिले महत्वपूर्ण संकेत
भारतीय शोधकर्ताओं ने विस्फोट के दौरान बाहर निकले पदार्थ की संरचना का भी अध्ययन किया। इसके लिए त्रिआयामी कंप्यूटर मॉडल की सहायता ली गई, जिससे विस्फोट के बाद फैलती गैस की आकृति और गति का अनुमान लगाया जा सके।
अध्ययन में हाइड्रोजन के मुकाबले हीलियम, नाइट्रोजन और कुछ अन्य भारी तत्वों की मात्रा में महत्वपूर्ण परिवर्तन के संकेत मिले। विशेष रूप से नाइट्रोजन की अधिकता वैज्ञानिकों के लिए दिलचस्प थी।
इन रासायनिक परिवर्तनों से यह समझने में मदद मिलती है कि विस्फोट के दौरान नाभिकीय प्रतिक्रियाएं किस प्रकार हुईं और तारे के भीतर किस तरह का पदार्थ तैयार हुआ।
वैज्ञानिकों ने विस्फोट के दौरान बाहर निकले हाइड्रोजनयुक्त पदार्थ के द्रव्यमान का भी अनुमान लगाया। यह सूर्य के द्रव्यमान के कुछ दस लाखवें हिस्सों के बराबर था। मात्रा सुनने में बहुत कम लग सकती है, लेकिन सूर्य के विशाल द्रव्यमान को देखते हुए यह अत्यंत बड़ी मात्रा है।
ब्रह्मांड की दूरियां नापने में भी उपयोगी हैं सुपरनोवा
टाइप 1ए सुपरनोवा का अध्ययन केवल तारों के जन्म और मृत्यु को समझने के लिए महत्वपूर्ण नहीं है। इन विस्फोटों का उपयोग खगोल वैज्ञानिक ब्रह्मांड की विशाल दूरियां मापने के लिए भी करते हैं।
इनकी चमक में कुछ पहचाने जा सकने वाले गुण होते हैं। वैज्ञानिक इन गुणों की सहायता से उनकी वास्तविक चमक का अनुमान लगाते हैं और फिर पृथ्वी से दिखाई देने वाली चमक की तुलना करके दूरी निकालते हैं।
इसी प्रकार के सुपरनोवा के अध्ययन ने ब्रह्मांड के विस्तार की गति और उसके लगातार तेज होने के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराई है।
आरएस ऑफियुकी जैसे तारों का अध्ययन इसलिए भी उपयोगी है क्योंकि इससे वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि टाइप 1ए सुपरनोवा बनने के संभावित रास्ते कौन-कौन से हैं।
अगले विस्फोट का इंतजार
हमारी आकाशगंगा में आवर्ती नोवा प्रणालियां अपेक्षाकृत दुर्लभ हैं। आरएस ऑफियुकी उन महत्वपूर्ण प्रणालियों में शामिल है जिनके विस्फोटों का विस्तृत वैज्ञानिक रिकॉर्ड उपलब्ध है।
वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इसके अगले नोवा विस्फोट के दौरान और अधिक उन्नत दूरबीनों तथा उपकरणों से प्राप्त जानकारी श्वेत वामन के द्रव्यमान, तापमान और विस्फोट की प्रक्रिया को बेहतर ढंग से समझने में सहायता करेगी।
हालांकि यह भविष्यवाणी करना संभव नहीं है कि यह तारा कब सुपरनोवा बनेगा या कभी बनेगा भी या नहीं। फिलहाल इसका महत्व एक ऐसी प्राकृतिक प्रयोगशाला के रूप में है, जहां वैज्ञानिक तारों में होने वाली अत्यंत शक्तिशाली नाभिकीय प्रक्रियाओं का अध्ययन कर सकते हैं।
पृथ्वी से हजारों प्रकाश-वर्ष दूर घट रही ये घटनाएं हमें याद दिलाती हैं कि ब्रह्मांड स्थिर नहीं है। उसमें लगातार परिवर्तन हो रहे हैं। कहीं नए तारे जन्म ले रहे हैं, तो कहीं पुराने तारे अपने जीवन के अंतिम चरणों में पहुंच रहे हैं। आरएस ऑफियुकी का अध्ययन इसी विराट ब्रह्मांडीय परिवर्तन की कहानी का एक महत्वपूर्ण अध्याय है।
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अधिक जानकारी के लिए कृपया ramkrishna.das@bose.res.in पर डॉ. रामकृष्ण दास से संपर्क करें।

