‘उत्तराखंड में क्यों बन रहे हेलीकॉप्टर मौत के खटोले?’
Uttarakhand’s recurring helicopter crashes have exposed serious shortcomings in aviation safety, regulatory oversight and accountability. The October 30, 2026 tragedy near Joshimath, killing six people despite advance weather warnings, raises disturbing questions about operational decisions. Government data identifies Uttarakhand as India’s leading state for helicopter accidents during the reported period. DGCA safety audits of eight operators in 2025 revealed significant deficiencies, while parliamentary recommendations remain under scrutiny. The article examines inadequate monitoring, mountain-flying risks, regulatory gaps and the effectiveness of corrective measures. It calls for transparent investigations, stricter enforcement and preventive action to safeguard lives in the Himalayas.

— जयसिंह रावत —
उत्तराखंड में लगातार हो रही हेलीकॉप्टर दुर्घटनाएं अब केवल हिमालय के प्रतिकूल मौसम और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों का परिणाम मानकर नजरअंदाज नहीं की जा सकतीं। ये दुर्घटनाएं नागरिक उड्डयन सुरक्षा, नियामकीय निगरानी और यात्रियों के जीवन के प्रति जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं। शुक्रवार, 30 अक्टूबर को बदरीनाथ से देहरादून आ रहा ट्रांस भारत एविएशन कंपनी का हेलीकॉप्टर जोशीमठ के निकट दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इस हादसे में पायलट सहित सभी छह लोगों की मृत्यु हो गई। विशेष चिंता का विषय यह है कि मौसम विभाग ने चमोली सहित उत्तराखंड के पांच जिलों में भारी बारिश की चेतावनी जारी की थी। बदरीनाथ और हेमकुंड साहिब क्षेत्र के लिए विशेष रूप से नारंगी चेतावनी होने के बावजूद उसी क्षेत्र से हेलीकॉप्टर की उड़ान ने सुरक्षा संबंधी निर्णयों पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार हेलीकॉप्टर ने दोपहर लगभग 1 बजकर 12 मिनट पर बदरीनाथ से देहरादून के सहस्रधारा हेलीपैड के लिए उड़ान भरी थी। कुछ ही मिनट बाद उसका संपर्क टूट गया और बाद में जोशीमठ के निकट पहाड़ी क्षेत्र में मलबा मिला। सबसे बड़ा सवाल यह है कि मौसम की पूर्व चेतावनी के बावजूद उड़ान का निर्णय किस आधार पर लिया गया? क्या स्थानीय मौसम, दृश्यता और उड़ान मार्ग की वास्तविक परिस्थितियों का समुचित परीक्षण किया गया था? क्या संचालक कंपनी और संबंधित अधिकारियों के बीच मौसम संबंधी सूचनाओं का आदान-प्रदान हुआ था? नारंगी चेतावनी अपने आप सभी उड़ानों पर प्रतिबंध नहीं लगाती, लेकिन ऐसी चेतावनी के बीच पर्याप्त जोखिम मूल्यांकन के बिना उड़ान भरना गंभीर लापरवाही हो सकती है। इसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
देश में सर्वाधिक दुर्घटनाओं वाला राज्य
केंद्र सरकार के आंकड़े स्थिति की गंभीरता उजागर करते हैं। 28 जुलाई 2025 को राज्यसभा में नागरिक उड्डयन राज्यमंत्री मुरलीधर मोहोल ने बताया था कि वर्ष 2020 से 2025 के बीच देश में हुई 12 हेलीकॉप्टर दुर्घटनाओं में सात उत्तराखंड में हुई थीं। इनमें देशभर में 30 लोगों की मृत्यु हुई, जिनमें 21 उत्तराखंड में मारे गए। महाराष्ट्र में चार दुर्घटनाओं में सात और छत्तीसगढ़ में एक दुर्घटना में दो लोगों की मृत्यु हुई थी। इस अवधि में उत्तराखंड दुर्घटनाओं और मृतकों की संख्या, दोनों में देश में पहले स्थान पर था। हालांकि वास्तविक जोखिम की तुलना के लिए विभिन्न राज्यों में कुल उड़ानों और उड़ान घंटों की संख्या भी देखनी होगी।
वर्ष 2025 में उत्तरकाशी और केदारनाथ क्षेत्र की घातक दुर्घटनाओं ने विमानन सुरक्षा की कमजोरियां उजागर की थीं। आठ मई को उत्तरकाशी में गंगोत्री मार्ग पर हेलीकॉप्टर दुर्घटना में छह और 15 जून को केदारनाथ से लौट रहे हेलीकॉप्टर के गौरीकुंड क्षेत्र में दुर्घटनाग्रस्त होने से सात लोगों की मृत्यु हुई थी। इन घटनाओं के बाद उड़ानों पर अस्थायी प्रतिबंध, पायलटों के विरुद्ध कार्रवाई और सुरक्षा नियमों को सख्त करने की घोषणाएं हुई थीं। लेकिन आज की दुर्घटना ने उन सुधारों की प्रभावशीलता पर फिर सवाल खड़े कर दिए हैं।
आठ कंपनियों की जांच में मिली थीं गंभीर कमियां
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि हेलीकॉप्टर संचालन में सुरक्षा संबंधी कमियों की जानकारी नियामक संस्थाओं को पहले से थी। छह अगस्त 2026 को लोकसभा में अतारांकित प्रश्न संख्या 3039 के उत्तर में नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने बताया था कि वर्ष 2025 में उच्च हिमालयी क्षेत्रों में परिचालन करने वाली आठ हेलीकॉप्टर कंपनियों का विशेष सुरक्षा परीक्षण किया गया था। इनमें ट्रांस भारत एविएशन भी शामिल थी, जिसका हेलीकॉप्टर आज दुर्घटनाग्रस्त हुआ है।
संसदीय उत्तर के परिशिष्ट में पायलटों के उड़ान और ड्यूटी समय की निगरानी, विमान रखरखाव के प्रमाणन, उपकरणों के अंशांकन, निर्धारित उड़ान समय के पालन और आंतरिक सुरक्षा परीक्षणों की रिपोर्टिंग से संबंधित कमियां दर्ज थीं। कुछ स्थानों पर आपातकालीन कार्ययोजना अधूरी पाई गई थी। उड़ान संबंधी अभिलेखों के विश्लेषण तथा सुरक्षा अनुपालन की प्रक्रियाओं में भी खामियां सामने आई थीं।
हालांकि परिशिष्ट में प्रत्येक कमी को संबंधित कंपनी के नाम से नहीं जोड़ा गया था। इसलिए सभी कमियों के लिए ट्रांस भारत एविएशन को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन अब यह जानना आवश्यक है कि इस कंपनी के परीक्षण में कौन-सी कमियां मिली थीं, उन्हें दूर करने के क्या निर्देश दिए गए और उनका पुनः सत्यापन कब हुआ।
संसदीय समिति की चेतावनियों का क्या हुआ?
संसद की परिवहन, पर्यटन और संस्कृति संबंधी स्थायी समिति ने अगस्त 2025 में प्रस्तुत अपनी 380वीं रिपोर्ट में उत्तराखंड की हेलीकॉप्टर सेवाओं की सुरक्षा व्यवस्था पर चिंता जताई थी। समिति ने कठिन पर्वतीय भूगोल, अचानक बदलते मौसम और बढ़ते हवाई यातायात के साथ नियामकीय जिम्मेदारियों के विभाजन को महत्वपूर्ण समस्या माना था।उत्तराखंड नागरिक उड्डयन विकास प्राधिकरण हेलीकॉप्टर सेवाओं के चयन और परिचालन व्यवस्थाओं से जुड़ा है, जबकि तकनीकी सुरक्षा और विमानन नियमों के अनुपालन की जिम्मेदारी डीजीसीए की है। समिति ने पर्वतीय उड़ानों के लिए विशेष प्रशिक्षण, प्रमाणन और प्रभावी निगरानी व्यवस्था मजबूत करने की सिफारिश की थी। इसके बाद पर्वतीय उड़ान अनुभव, मौसम की निगरानी और उड़ानों की संख्या सीमित करने जैसे उपाय घोषित किए गए। लेकिन यह स्पष्ट होना चाहिए कि इनका पालन केवल कागजी औपचारिकता तक सीमित तो नहीं रह गया।
दुर्घटना से पहले सुरक्षा, बाद में केवल जांच नहीं
उत्तराखंड में हेलीकॉप्टर सेवाएं दुर्गम क्षेत्रों की आवश्यकता हैं। तीर्थयात्रा, आपदा राहत और चिकित्सा सहायता में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। लेकिन व्यावसायिक हितों और यात्रियों की सुविधा के नाम पर सुरक्षा मानकों से समझौता स्वीकार्य नहीं हो सकता। विशेषकर मौसम की नारंगी चेतावनी के दौरान उड़ान के निर्णय की जिम्मेदारी स्पष्ट होनी चाहिए।सरकार को वर्ष 2025 में आठ कंपनियों की विशेष सुरक्षा जांच की पूरी रिपोर्ट, कंपनीवार कमियां, सुधारात्मक कार्रवाई और पुनर्निरीक्षण के निष्कर्ष सार्वजनिक करने चाहिए। आज की दुर्घटना में मौसम संबंधी पूर्व सूचना, उड़ान से पहले किए गए जोखिम मूल्यांकन, पायलट और कंपनी के निर्णय तथा नियामकीय निगरानी की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। संसद की स्थायी समिति की सिफारिशों पर हुई कार्रवाई भी सार्वजनिक की जानी चाहिए।
हिमालय का मौसम अचानक बदलता है, यह कोई नई जानकारी नहीं है। इसीलिए सुरक्षा नियम बनाए जाते हैं। जब खतरे की पूर्व चेतावनी उपलब्ध हो, तब दुर्घटना के बाद मौसम को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त नहीं है। असली जवाबदेही इस बात की है कि ज्ञात खतरे के बावजूद यात्रियों को सुरक्षित रखने के लिए कौन-से निर्णय लिए गए। उत्तराखंड को अब प्रत्येक दुर्घटना के बाद जांच और आश्वासनों की नहीं, बल्कि दुर्घटनाओं को रोकने वाली जवाबदेह विमानन व्यवस्था की आवश्यकता है।

