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सत्य कथा ; बर्खास्तगी से संन्यास और फिर खाकी की वापसी

उषा रावत द्वारा-
यह किसी बॉलीवुड पटकथा लेखक की कल्पना नहीं, बल्कि चंबल की माटी के एक वीर सिपाही के 26 साल लंबे आत्मसम्मान की असली दास्तान है। मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के छिछावली गाँव के गिरवर सिंह तोमर ने साबित कर दिया कि यदि हौसला अडिग हो, तो न्याय के दरवाजे देर से ही सही, खुलते जरूर हैं। एक वरिष्ठ अधिकारी के अहंकार के चलते साल 1999 में सीआरपीएफ की सेवा से बर्खास्त किए जाने के बाद, दुनिया के तानों से बचकर मंदिर की शरण लेने वाले ‘संत गिरवरदास’ ने ढाई दशक तक साधु का जीवन जिया। परंतु, भगवा चोले के भीतर भी खाकी की लौ मद्धम नहीं पड़ी। 26 साल 10 महीने तक छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट (बिलासपुर) में लंबी कानूनी जंग लड़ने के बाद, जब 50 वर्ष की उम्र में अदालत ने उनकी बर्खास्तगी को रद्द कर ससम्मान बहाल करने का फैसला सुनाया, तो गुफा मंदिर से साधुओं के आशीर्वाद के साथ विदा होकर उन्होंने सीधे नक्सल प्रभावित बीजापुर में दोबारा अपनी वर्दी संभाली।

 

दृश्य 1: वर्दी का जुनून और अचानक लगा ग्रहण (1991–1999)

चंबल के मुरैना जिले का छिछावली गाँव। दामोदर सिंह तोमर के बेटे गिरवर सिंह की आँखों में बचपन से देशसेवा का सपना तैरता था। कड़ी मेहनत रंग लाई और साल 1991 में वह CRPF (केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल) में हवलदार के पद पर भर्ती हुए

 

आठ साल तक सेवा पूरी निष्ठा से चली। पदोन्नति की उम्मीदें बंधी थीं, लेकिन 1999 में एक वरिष्ठ अधिकारी से तीखी कहासुनी हो गई। अधिकारी के अहंकार के आगे जवान की दलीलें दरकिनार कर दी गईं; पहले निलंबन और फिर आनन-फानन में विभागीय जांच बैठाकर 21 अक्टूबर 1999 को गिरवर सिंह को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया

 

एक ही झटके में कंधे से बैज उतर गए, कमर की पेटी खुल गई और एक स्वाभिमानी जवान खाली हाथ गाँव लौटा दिया गया।

 

दृश्य 2: मंदिर का संन्यास और ‘संत गिरवरदास’ का जन्म (1999–2024)

नौकरी छिनने का गहरा आघात, सामाजिक असहजता और मानसिक तनाव। घर के माहौल से दूर गिरवर गाँव के पास ‘बारहद्वारी मंदिर’ पहुंचे। कुछ वर्षों बाद वे मुरैना के सुप्रसिद्ध गुफा मंदिर आ गए।

 

  • चोले का बदलाव: प्रेस की हुई कॉम्बैट-वर्दी की जगह खुरदुरे साधु-वस्त्रों ने ले ली।
  • नया स्वरूप: गुफा मंदिर के महंत महामंडलेश्वर शिवशरण महाराज ने उन्हें नया नाम दिया—‘गिरवरदास महाराज’
  • साधना और संसार: उन्होंने मंदिर में झाड़ू-बुहारू, पूजा-अर्चना और गौ-सेवा की, लेकिन अपने गृहस्थ दायित्वों से मुंह नहीं मोड़ा। पत्नी मंजू देवी के साथ मिलकर चारों बच्चों (दो बेटियों और दो बेटों) की परवरिश की, बेटियों का विवाह किया और बड़े बेटे अभिषेक को भारतीय वायुसेना में भेजा।
मंदिर में रहते हुए भी वे कानूनी पैरवी के लिए लगातार लगे रहे और अपनी फाइलों की पोटली संभालकर न्याय की आस में अदालत के चक्कर काटते रहे।

 

दृश्य 3: 26 साल की कानूनी जंग (छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट)

गिरवर सिंह ने बर्खास्तगी के आदेश को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय (बिलासपुर) में चुनौती दी थी।

 

  • अदालती खींचतान: विभागीय अड़चनों, तारीखों और प्रक्रियाओं के बीच सालों गुजर गए, लेकिन गिरवरदास महाराज का विश्वास नहीं डिगा।
  • न्याय की जीत: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने विभागीय कार्यवाही की खामियों और अन्याय को देखते हुए फैसला सुनाया कि गिरवर सिंह की बर्खास्तगी अनुचित थी और उन्हें ससम्मान सेवा में बहाल किया जाए
दफ्तरी फाइलों और प्रशासनिक हीलाहवाली के बीच अंततः अर्धसैनिक बल के महकमे को अदालत के आदेश के आगे झुकना पड़ा और बहाली की प्रक्रिया शुरू हुई।

 

दृश्य 4: क्लाइमेक्स—संत की विदाई और खाकी की घर वापसी

सीआरपीएफ ने आधिकारिक बहाली का पत्र जारी किया और उन्हें छत्तीसगढ़ के बीजापुर (नक्सल प्रभावित क्षेत्र) में नई तैनाती दी गई।

 

मुरैना के गुफा मंदिर का विदाई दृश्य भावुक कर देने वाला था:
महंत शिवशरण महाराज और साथी संतों ने नम आँखों से ‘गिरवरदास’ को तिलक लगाकर विदा किया। गेरुए वस्त्र उतरे, दाढ़ी संवारी गई और ठीक 26 साल 10 महीने बाद 50 वर्षीय गिरवर सिंह तोमर ने दोबारा सीआरपीएफ की वर्दी धारण की

 

दर्पण के सामने खड़े होकर अपनी नेमप्लेट छूते हुए उन्होंने द टाइम्स ऑफ इंडिया से कहा:

 

“26 साल मंदिर में पूजा-पाठ करते हुए भी मेरी आत्मा उसी वर्दी में बसी थी। आज जब मैंने दोबारा यह वर्दी पहनी, तो लगा जैसे मैं सचमुच अपने घर लौट आया हूँ।”
एक जवान का निष्कासन, ढाई दशक की कठोर तपस्या, गुफा मंदिर का संन्यास और अंत में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के ऐतिहासिक न्याय के बाद बीजापुर के बीहड़ों में दोबारा सीना तानकर खड़े होने की गौरवगाथा—गिरवर सिंह तोमर का यह सफर साबित करता है कि धैर्य और सत्य की कभी हार नहीं होती।

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