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चश्मे में समाई डिजिटल दुनिया”, “एक चश्मा, कई डिजिटल काम

स्मार्टफोन ने कभी हमारी जेब में कैमरा पहुंचाया था। अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई कैमरे और माइक्रोफोन को हमारी आंखों के ठीक सामने चश्मे में पहुंचा रही है। देखने में सामान्य चश्मे जैसे ये उपकरण तस्वीर खींच सकते हैं, वीडियो और आवाज रिकॉर्ड कर सकते हैं और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से आसपास मौजूद चीजों और सूचनाओं को समझने में भी उपयोगकर्ता की सहायता कर सकते हैं।

तकनीक की यह छलांग जितनी आकर्षक है, उतना ही गंभीर सवाल भी खड़ा करती है—यदि सामने खड़े व्यक्ति को पता ही न चले कि उसकी तस्वीर, बातचीत या गतिविधि रिकॉर्ड हो रही है तो उसकी निजता का क्या होगा?

इसी सवाल ने नॉर्वे को एआई आधारित स्मार्ट चश्मों के इस्तेमाल पर नियंत्रण की दिशा में कदम उठाने के लिए प्रेरित किया है। नॉर्वे सरकार ने चुनिंदा सार्वजनिक स्थानों पर ऐसे चश्मों के इस्तेमाल पर अस्थायी रोक लगाने के लिए संसद में प्रस्ताव लाने की घोषणा की है। यह पूर्ण प्रतिबंध नहीं होगा। सरकार पहले संवेदनशील स्थानों पर इनके इस्तेमाल को सीमित करना चाहती है और इसके बाद विशेषज्ञों की मदद से स्थायी राष्ट्रीय नीति तैयार करने की योजना है।

साधारण चश्मे के भीतर कैमरा, माइक्रोफोन और एआई

नई पीढ़ी के स्मार्ट चश्मे पहली नजर में सामान्य चश्मों जैसे दिखाई दे सकते हैं, लेकिन उनमें कैमरा, माइक्रोफोन, स्पीकर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सुविधाएं समाहित हो सकती हैं।

इनसे तस्वीर और वीडियो लेने, फोन करने, संगीत सुनने, दिशा संबंधी सहायता लेने, अनुवाद करने तथा एआई सहायक से बातचीत करने जैसे काम किए जा सकते हैं। कुछ परिस्थितियों में ये सुविधाएं अत्यंत उपयोगी हैं। दृष्टिबाधित व्यक्ति के लिए सामने मौजूद वस्तुओं को समझने में सहायता या किसी यात्री के लिए तत्काल अनुवाद जैसी सुविधाएं जीवन को आसान बना सकती हैं।

समस्या तकनीक के उपयोग से अधिक उसके अदृश्य इस्तेमाल की है। मोबाइल फोन से कोई व्यक्ति वीडियो बना रहा हो तो आसपास के लोगों को सामान्यतः इसका अंदाजा हो सकता है। लेकिन सामान्य दिखने वाले चश्मे में लगा छोटा कैमरा यह अंतर काफी हद तक मिटा देता है।

नॉर्वे को क्यों उठाना पड़ा कदम

नॉर्वे के डिजिटलाइजेशन और पब्लिक गवर्नेंस मंत्री टॉर्गेर मिकेल्सन ने चिंता जताई है कि नई शक्तिशाली तकनीक के कारण लोगों की जानकारी के बिना उनकी तस्वीरें, वीडियो या आवाज रिकॉर्ड की जा सकती हैं।

सरकार का तर्क है कि नागरिकों को ऐसे समाज में रहने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए, जहां उन्हें पार्क, स्कूल, अस्पताल या अन्य सामान्य स्थानों पर भी यह आशंका बनी रहे कि कोई उनकी जानकारी के बिना रिकॉर्डिंग कर रहा है।

प्रस्तावित रोक पार्कों, समुद्र तटों, संग्रहालयों, शॉपिंग सेंटरों और सार्वजनिक आयोजनों जैसे स्थानों तक लागू की जा सकती है। बच्चों की निजता को देखते हुए स्कूल, किंडरगार्टन, खेल के मैदान और युवा केंद्र भी इसके दायरे में आ सकते हैं।

अस्पताल, डॉक्टरों के क्लीनिक, स्विमिंग पूल तथा चेंजिंग रूम और शॉवर वाले जिम जैसे स्थानों को विशेष रूप से संवेदनशील माना जा रहा है। विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों को भी प्रस्तावित व्यवस्था के दायरे में लाने पर विचार किया जा रहा है।

प्रतिबंध तकनीक पर नहीं, उसके अनियंत्रित इस्तेमाल पर

नॉर्वे सरकार ने स्पष्ट किया है कि उसका उद्देश्य एआई चश्मों या दूसरी पहनने योग्य तकनीक पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाना नहीं है। निजी इस्तेमाल और ऐसी परिस्थितियों में इनका उपयोग जारी रह सकता है, जहां दूसरे लोगों की निजता प्रभावित होने की आशंका नहीं हो।

दिव्यांग और अन्य जरूरतमंद लोगों के लिए उपयोगी तकनीकी प्रयोगों को छूट देने पर भी विचार किया जा रहा है।

यही इस बहस का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। प्रश्न यह नहीं है कि नई तकनीक अच्छी है या बुरी। असली सवाल यह है कि तकनीक का उपयोग कहां तक व्यक्ति की सुविधा है और किस बिंदु से वह दूसरे व्यक्ति के निजता के अधिकार में हस्तक्षेप करने लगती है।

चिंता केवल नॉर्वे तक सीमित नहीं

स्मार्ट चश्मों को लेकर निजता और सुरक्षा की चिंता अब कई देशों में दिखाई देने लगी है। ऑस्ट्रेलिया में सरकारी कार्यस्थलों में कैमरा युक्त स्मार्ट चश्मों के इस्तेमाल को लेकर समीक्षा की जा रही है। इंग्लैंड और वेल्स की अदालतों में ऐसे उपकरणों के इस्तेमाल पर रोक है, जबकि सिनेमा उद्योग भी रिकॉर्डिंग की आशंका को देखते हुए इनके इस्तेमाल को नियंत्रित कर रहा है।

यूरोप में भी डेटा संरक्षण से जुड़े संस्थान इस तकनीक के सामाजिक प्रभावों का अध्ययन कर रहे हैं। अमेरिका में न्यूयॉर्क की अदालत प्रणाली में कैमरे वाले चश्मों को लेकर प्रतिबंधात्मक व्यवस्था अपनाई गई है।

इसका अर्थ यह है कि मामला किसी एक कंपनी, उत्पाद या देश तक सीमित नहीं है। दुनिया के सामने एक नई श्रेणी की तकनीक आ रही है जिसमें कैमरा, माइक्रोफोन, इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता एक छोटे से पहनने योग्य उपकरण में एक साथ मौजूद हैं।

भारत के लिए भी महत्वपूर्ण सवाल

भारत जैसे विशाल और अत्यधिक डिजिटल होते समाज के लिए यह बहस और भी महत्वपूर्ण है। हमारे स्कूलों, अस्पतालों, मेट्रो, रेलवे स्टेशनों, धार्मिक स्थलों, बाजारों, कार्यालयों, अदालतों और सार्वजनिक आयोजनों में प्रतिदिन करोड़ों लोग एक-दूसरे के संपर्क में आते हैं।

कल्पना कीजिए कि कोई व्यक्ति सामान्य चश्मा पहने आपके सामने बैठा है और आपको यह मालूम ही नहीं कि उसमें कैमरा और माइक्रोफोन सक्रिय हैं। वह आपकी बातचीत रिकॉर्ड कर सकता है या आसपास की तस्वीरें और वीडियो बना सकता है। एआई की क्षमता जुड़ जाने के बाद रिकॉर्ड की गई सामग्री का विश्लेषण, वर्गीकरण और दूसरी सूचनाओं के साथ मिलान भी संभव हो सकता है।

तब मामला केवल कैमरे से तस्वीर लेने का नहीं रह जाता। सवाल डेटा संग्रह, सहमति, चेहरे और आवाज की पहचान, बच्चों की सुरक्षा तथा रिकॉर्ड की गई सामग्री के संग्रह और संभावित दुरुपयोग तक पहुंच जाता है।

इसलिए भारत में भी पहनने योग्य एआई उपकरणों के तेजी से प्रसार से पहले इस बात पर सार्वजनिक बहस जरूरी है कि किन स्थानों पर रिकॉर्डिंग स्वीकार्य होनी चाहिए, कहां स्पष्ट सहमति जरूरी हो और अस्पताल, स्कूल, अदालत, मतदान केंद्र, चेंजिंग रूम तथा दूसरे संवेदनशील स्थानों के लिए क्या विशेष नियम होने चाहिए।

सुविधा और निजता के बीच नई लक्ष्मण रेखा

हर नई तकनीक अपने साथ सुविधा के साथ नई जिम्मेदारियां भी लाती है। स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के अनुभव ने दुनिया को यह सिखाया है कि तकनीक पहले समाज में फैल जाए और नियम बहुत बाद में बनें तो नुकसान की भरपाई कठिन हो सकती है। एआई स्मार्ट चश्मे चिकित्सा, शिक्षा, यात्रा, दिव्यांग सहायता, अनुवाद और अनेक व्यावसायिक क्षेत्रों में उपयोगी साबित हो सकते हैं। इसलिए इनका विरोध केवल इसलिए उचित नहीं होगा कि वे नई तकनीक हैं। लेकिन किसी व्यक्ति की जानकारी और सहमति के बिना उसकी गतिविधियों को रिकॉर्ड करने की क्षमता को भी केवल तकनीकी प्रगति के नाम पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

नॉर्वे का प्रस्ताव इसी द्वंद्व की ओर दुनिया का ध्यान खींचता है। वहां अभी स्थायी प्रतिबंध लगाने के बजाय अस्थायी रोक, विशेषज्ञ अध्ययन और सार्वजनिक विमर्श का रास्ता अपनाया जा रहा है। आने वाले वर्षों में स्मार्ट चश्मे शायद स्मार्टफोन की तरह सामान्य हो जाएं। तब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं होगा कि चश्मा पहनने वाला व्यक्ति क्या देख सकता है, बल्कि यह होगा कि उसके चश्मे की नजर में आए दूसरे व्यक्ति के अधिकार क्या हैं। तकनीक को आगे बढ़ना चाहिए, लेकिन मनुष्य की गरिमा, सहमति और निजता को पीछे छोड़कर नहीं।

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