पनचक्की से पावर हाउस तक : ऐसे बिजली बनाता है पानी
उत्तराखंड के किसी पुराने पहाड़ी गांव की पनचक्की या घराट को आपने देखा होगा। नाले से एक गूल निकालकर पानी को कुछ दूर ले जाया जाता है और फिर लकड़ी के संकरे पनाले से उसे नीचे छोड़ा जाता है। वेग से गिरता पानी नीचे लगे पंखेदार चक्र पर चोट करता है। चक्र घूमता है, उसके साथ जुड़ी धुरी घूमती है और ऊपर चक्की का भारी पाट घूमने लगता है। गेहूं, मडुवा या मक्का आटे में बदलने लगता है।
यही साधारण-सी पनचक्की आधुनिक जलविद्युत गृह को समझने की सबसे अच्छी पाठशाला है। बल्कि कहा जा सकता है कि पहाड़ का सदियों पुराना घराट आज के विशाल जलविद्युत गृह का पूर्वज है।
घराट और आधुनिक जलविद्युत गृह के आकार में जमीन-आसमान का अंतर है, लेकिन दोनों के पीछे भौतिक विज्ञान का मूल सिद्धांत लगभग एक ही है। घराट में पानी का वेग चक्की घुमाता है, जबकि आधुनिक जलविद्युत गृह में नियंत्रित वेग और दबाव से पानी विशाल टरबाइन घुमाता है। टरबाइन से जुड़ा जनरेटर उस यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदल देता है।
पानी में बिजली नहीं, ऊर्जा होती है
यह भ्रम दूर करना सबसे जरूरी है कि नदी के पानी में बिजली होती है। पानी में बिजली नहीं होती। ऊंचाई पर स्थित पानी में गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा होती है। जब वही पानी नीचे की ओर बहता या गिरता है तो उसकी ऊर्जा गति और दबाव के रूप में काम करने लगती है।
इसी ऊर्जा को मनुष्य ने पहले घराट में इस्तेमाल किया और बाद में आधुनिक विज्ञान तथा अभियांत्रिकी ने उसी सिद्धांत को विशाल जलविद्युत परियोजनाओं में बदल दिया।
एक पहाड़ी नाले में बहता पानी यदि सीधे नीचे बहता चला जाए तो उसकी ऊर्जा प्रकृति में ही खर्च होती रहती है। लेकिन उसे किसी निश्चित ऊंचाई से पाइप या सुरंग के जरिए नियंत्रित करके टरबाइन के पंखों पर छोड़ा जाए तो उसकी शक्ति को यांत्रिक ऊर्जा में बदला जा सकता है।
यही जलविद्युत उत्पादन का मूल विज्ञान है।
घराट में चक्की, पावर हाउस में टरबाइन
पुराने घराट को गौर से देखें तो आधुनिक जलविद्युत परियोजना को समझना बहुत आसान हो जाता है।
घराट में नदी या गदेरे से एक छोटी गूल निकालकर पानी को ऊंचाई पर पनचक्की तक पहुंचाया जाता है। वहां से पनाले को ढलान देते हुए पानी नीचे गिराया जाता है। पनाला नीचे की ओर संकरा होने से पानी अधिक वेग के साथ पंखेदार चक्र पर पड़ता है। वह चक्र घूमता है और उससे जुड़ी सीधी धुरी ऊपर रखे चक्की के पाट को घुमा देती है।
आधुनिक जलविद्युत परियोजना में गूल का स्थान विशाल जल सुरंग या जलमार्ग ले लेता है। लकड़ी के पनाले की जगह बड़े दबावयुक्त पाइप होते हैं। घराट के छोटे पंखेदार चक्र की जगह अत्यधिक दक्ष टरबाइन होती है और आटा पीसने वाले पाट की जगह उससे जनरेटर जुड़ा होता है।
घराट में पानी की ऊर्जा से चक्की घूमती है; पावर हाउस में उसी ऊर्जा से टरबाइन घूमती है।
यहीं से दोनों के रास्ते अलग होते हैं। घराट की घूमती धुरी सीधे अनाज पीसने का काम करती है। बिजलीघर में टरबाइन की घूमती धुरी जनरेटर को चलाती है और जनरेटर यांत्रिक ऊर्जा को बिजली में बदल देता है।
पहाड़ की ऊंचाई ही उसकी सबसे बड़ी ताकत
उत्तराखंड को प्रकृति ने जलविद्युत उत्पादन के लिए दो महत्वपूर्ण चीजें दी हैं—पानी और ऊंचाई।
मैदानी क्षेत्र में कोई नदी बहुत अधिक पानी लेकर बह सकती है, लेकिन उसमें ऊंचाई का अंतर कम होने से उसी तरह का दबाव प्राप्त करना कठिन होता है। हिमालय में नदियां थोड़ी दूरी में ही काफी ऊंचाई से नीचे उतरती हैं। इसलिए पानी में बहुत अधिक ऊर्जा प्राप्त करने की संभावना बनती है।
इसे फिर घराट से समझिए। यदि पनाले का पानी बहुत कम ऊंचाई से धीरे-धीरे पंखों पर गिरे तो चक्की मुश्किल से घूमेगी। लेकिन वही पानी पर्याप्त ऊंचाई से तेज वेग के साथ गिरे तो चक्की आसानी से भारी अनाज पीस सकती है।
आधुनिक परियोजना में इसी ऊंचाई के अंतर को तकनीकी भाषा में ‘हेड’ कहा जाता है। उपलब्ध पानी की मात्रा और यह ऊंचाई मिलकर काफी हद तक तय करते हैं कि परियोजना कितनी शक्ति पैदा कर सकती है।
बांध में जमा पानी कैसे बनाता है बिजली
जलाशय आधारित परियोजना में नदी पर बांध बनाकर बड़ी मात्रा में पानी ऊंचाई पर जमा किया जाता है। इस पानी में उसकी ऊंचाई के कारण स्थितिज ऊर्जा संचित रहती है।
जब बिजली पैदा करनी होती है तो पानी को नियंत्रित रास्ते से नीचे स्थित बिजलीघर की ओर छोड़ा जाता है। बड़े पाइपों से नीचे आते हुए पानी टरबाइन के पंखों पर भारी दबाव डालता है। टरबाइन घूमती है और उसके साथ जनरेटर भी घूमने लगता है।
जनरेटर विद्युत चुंबकीय प्रेरण के सिद्धांत से इस यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदल देता है।
इसके बाद ट्रांसफार्मर बिजली की वोल्टेज बढ़ाता है और पारेषण लाइनों के जरिए उसे विद्युत ग्रिड में भेज दिया जाता है।
अर्थात ऊर्जा परिवर्तन की पूरी यात्रा है—
ऊंचाई पर संचित पानी की ऊर्जा → पानी का वेग और दबाव → टरबाइन की यांत्रिक ऊर्जा → जनरेटर → विद्युत ऊर्जा।
नदी-प्रवाह परियोजना भी विशाल घराट जैसी
उत्तराखंड में अनेक जलविद्युत परियोजनाएं नदी-प्रवाह आधारित हैं। इन्हें समझने के लिए भी घराट से बेहतर उदाहरण शायद ही कोई हो।
घराट वाला व्यक्ति पूरे गदेरे को रोककर तालाब नहीं बनाता। वह पानी का आवश्यक हिस्सा गूल में मोड़ता है, उसे कुछ दूरी तक ले जाता है और उपलब्ध ऊंचाई का लाभ लेकर पनाले से चक्की पर गिरा देता है। काम पूरा होने के बाद पानी वापस गदेरे में चला जाता है।
नदी-प्रवाह आधारित आधुनिक परियोजना में यही काम बहुत बड़े पैमाने पर होता है। नदी पर बैराज या डायवर्जन बनाकर पानी को सुरंग में मोड़ा जाता है। सुरंग उसे पहाड़ के भीतर कई किलोमीटर दूर उस स्थान तक पहुंचा सकती है जहां पर्याप्त ऊंचाई का अंतर उपलब्ध हो। वहां से पानी दबावयुक्त मार्ग से पावर हाउस की टरबाइनों तक पहुंचता है।
टरबाइन घुमाने के बाद पानी फिर नदी में छोड़ दिया जाता है।
इस दृष्टि से देखें तो पहाड़ के भीतर बनी कई किलोमीटर लंबी जल सुरंग पुरानी गूल का विशाल आधुनिक रूप है, पेनस्टॉक पनाले का आधुनिक रूप और टरबाइन घराट के पंखेदार चक्र का अत्याधुनिक रूप है।
बस एक बड़ा अंतर है—घराट के चक्र से आटा पीसा जाता था, आधुनिक टरबाइन से जनरेटर घुमाकर बिजली पैदा की जाती है।
टिहरी में यही सिद्धांत विराट रूप में
उत्तराखंड में इसी सामान्य सिद्धांत का विराट रूप टिहरी में दिखाई देता है। विशाल जलाशय में जमा पानी ऊर्जा का भंडार भी है। नियंत्रित रूप से छोड़ा गया पानी टरबाइनों को चलाता है और जनरेटर बिजली पैदा करते हैं।
इसकी तुलना किसी गांव के घराट से करना आकार की दृष्टि से असंभव लग सकता है, लेकिन मूल भौतिक सिद्धांत दोनों को जोड़ता है। एक में कुछ मीटर की ऊंचाई और थोड़े पानी से चक्की घूमती है, दूसरे में विशाल जलराशि, बहुत अधिक ऊंचाई और आधुनिक मशीनों की मदद से बड़े पैमाने पर बिजली पैदा होती है।
पैदा हुई बिजली जाती कहां है?
पावर हाउस में बिजली पैदा होने के बाद वह जरूरी नहीं कि उसी गांव, जिले या राज्य में इस्तेमाल हो जहां परियोजना स्थित है। ट्रांसफार्मर से उसकी वोल्टेज बढ़ाकर बिजली को उच्च क्षमता वाली पारेषण लाइनों के जरिए ग्रिड में भेजा जाता है।
एक बार ग्रिड में पहुंचने के बाद वह व्यापक विद्युत व्यवस्था का हिस्सा बन जाती है। इस प्रकार उत्तराखंड की किसी हिमालयी नदी के पानी से बनी बिजली दूर स्थित शहर, कारखाने, रेलवे, अस्पताल या लाखों घरों की ऊर्जा जरूरत पूरी करने में योगदान दे सकती है।
यही वह तथ्य है जिससे राज्य के बहुत से लोग शायद पूरी तरह परिचित नहीं हैं। जिस नदी के किनारे वे रहते हैं, जिस गदेरे को वे रोज देखते हैं और जिस पानी को पहाड़ से मैदान की ओर बहते देखते हैं, वही पानी रास्ते में देश के लिए बहुमूल्य ऊर्जा पैदा कर रहा है।
पानी खर्च नहीं होता, लेकिन नदी प्रभावित हो सकती है
जलविद्युत उत्पादन में पानी को कोयले या पेट्रोल की तरह जलाकर खत्म नहीं किया जाता। टरबाइन घुमाने के बाद पानी नदी में वापस चला जाता है। लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं कि जलविद्युत परियोजनाओं का नदी और पर्यावरण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
नदी का पानी सुरंग में मोड़ने से बीच के हिस्से में प्राकृतिक प्रवाह कम हो सकता है। बड़े बांधों से भूमि डूब सकती है और लोगों का विस्थापन हो सकता है। हिमालय में सुरंग निर्माण, मलबा निस्तारण, भूस्खलन, वन क्षति, नदी के जलीय जीवन और पर्यावरणीय प्रवाह जैसे सवाल भी जुड़े हैं।
इसलिए जलविद्युत नवीकरणीय ऊर्जा अवश्य है, लेकिन हिमालय में उसका विकास प्रकृति की वहन क्षमता और सुरक्षा को ध्यान में रखकर होना उतना ही आवश्यक है।
घराट ने सदियों पहले सिखा दिया था विज्ञान
आज हम टरबाइन, जनरेटर, पेनस्टॉक और पावर हाउस जैसे आधुनिक शब्द इस्तेमाल करते हैं, लेकिन पहाड़ के लोगों ने पानी की शक्ति का उपयोग सदियों पहले सीख लिया था।
उन्हें भौतिक विज्ञान के कठिन सूत्र जानने की जरूरत नहीं थी। अनुभव ने उन्हें बता दिया था कि पानी को ऊंचाई से नियंत्रित और संकरे रास्ते से छोड़ा जाए तो उसमें इतनी शक्ति पैदा की जा सकती है कि पत्थर का भारी पाट भी घूमने लगे।
आधुनिक जलविद्युत विज्ञान ने इसी प्राकृतिक सिद्धांत को अधिक दक्ष मशीनों और विशाल निर्माण के माध्यम से लाखों गुना बड़े स्तर पर इस्तेमाल करना सीख लिया।
इसीलिए अगली बार किसी पुराने घराट को देखें तो उसे केवल बीते जमाने की आटा पीसने वाली चक्की न समझें। उसके घूमते पंखों में आधुनिक जलविद्युत परियोजना का मूल विज्ञान छिपा है।
उत्तराखंड की पनचक्की केवल हमारी लोक विरासत नहीं है, वह आधुनिक पावर हाउस की पुरखिन भी है।

