एक बार इलाज, सालभर ‘खराब’ कोलेस्ट्रॉल पर लगाम
A small clinical study has raised hopes for a one-time gene-editing treatment that could provide long-lasting control of cholesterol. Researchers found that the experimental therapy reduced “bad” LDL cholesterol and triglycerides by up to 50 percent in patients receiving the highest dose, with the effect sustained for a year. The treatment uses lipid nanoparticles to deliver gene-editing machinery to the liver, where it switches off the ANGPTL3 gene involved in cholesterol metabolism. While the findings are encouraging, the study involved only 15 patients, so larger trials are needed to establish safety and long-term effectiveness. The treatment remains years away from routine clinical use.
कल्पना कीजिए कि कोलेस्ट्रॉल कम करने के लिए रोज दवा लेने की जरूरत न पड़े और एक बार दिया गया उपचार लंबे समय तक असर करता रहे। जीन-एडिटिंग पर हुए एक शुरुआती अध्ययन के नतीजे इस संभावना को मजबूत कर रहे हैं।
वैज्ञानिकों ने बताया है कि एक प्रयोगात्मक, एक-बार दिए जाने वाले जीन-एडिटिंग उपचार से मरीजों में ‘खराब’ एलडीएल (LDL) कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर करीब 50 प्रतिशत तक कम हुआ। खास बात यह है कि यह कमी उपचार के एक साल बाद भी बनी रही।
हालांकि, यह अध्ययन बहुत छोटा है और इसमें केवल 15 मरीजों का फॉलो-अप किया गया। इसलिए विशेषज्ञ इसे उत्साहजनक शुरुआती परिणाम मान रहे हैं, न कि किसी स्थापित उपचार का विकल्प।
लीवर में जाकर जीन को निष्क्रिय करता है उपचार
यह अध्ययन बायोटेक्नोलॉजी कंपनी CRISPR Therapeutics के वित्तपोषण से किया गया। इसमें मरीजों को लिपिड नैनोपार्टिकल्स का एक बार इन्फ्यूजन दिया गया। इन्हें बेहद छोटे ‘फैट बबल्स’ की तरह समझा जा सकता है, जो जीन-एडिटिंग की मशीनरी को शरीर के लीवर तक पहुंचाते हैं।
यह मशीनरी ANGPTL3 नामक जीन को काटकर निष्क्रिय करने के लिए तैयार की गई थी। यह जीन शरीर में कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स के चयापचय में भूमिका निभाता है।
इस विचार के पीछे एक प्राकृतिक उदाहरण भी है। कुछ लोगों में ANGPTL3 जीन का ऐसा प्राकृतिक रूप पाया जाता है, जो ठीक से काम नहीं करता। ऐसे लोगों में कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर अपेक्षाकृत कम होता है और हृदय रोग का जोखिम भी कम देखा गया है। वैज्ञानिक जीन-एडिटिंग के जरिए इसी प्राकृतिक स्थिति की नकल करने की कोशिश कर रहे हैं।
सबसे अधिक खुराक लेने वालों में 50 प्रतिशत तक गिरावट
अध्ययन में सबसे अधिक खुराक पाने वाले चार मरीजों में एलडीएल कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर करीब 50 प्रतिशत कम हुआ। यह कमी एक साल बाद भी बनी रही।
क्लीवलैंड क्लिनिक के कार्डियोलॉजिस्ट और अध्ययन के प्रमुख डॉ. ल्यूक लाफिन के अनुसार, यह तरीका हृदय रोग के इलाज की मौजूदा सोच से अलग है। अभी ज्यादातर मरीजों को लंबे समय तक दवाओं और जीवनशैली में बदलाव के जरिए जोखिम कम करना पड़ता है।
यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो के कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. अमरुत अंबर्देकर, जो अध्ययन में शामिल नहीं थे, ने परिणामों को उत्साहजनक बताया, लेकिन साथ ही सुरक्षा से जुड़े सवालों पर सावधानी बरतने की जरूरत बताई।
यूनिवर्सिटी ऑफ पेनसिल्वेनिया के कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. किरण मुसुनुरु ने भी कहा कि उपचार के असर के एक साल तक बने रहने के लिहाज से आंकड़े अच्छे दिखाई देते हैं। हालांकि, उन्होंने जोर दिया कि अभी बड़े अध्ययनों की जरूरत है।
रोज दवा लेने की समस्या का मिल सकता है समाधान
हृदय रोग के जोखिम को कम करने के लिए आज स्टैटिन सहित कई दवाएं, इंजेक्शन और जीवनशैली संबंधी उपाय उपलब्ध हैं। इसके बावजूद उपचार को लंबे समय तक जारी रखना एक चुनौती है।
कई लोग रोज दवा लेने में नियमित नहीं रह पाते। कुछ दवाओं को सहन नहीं कर पाते, जबकि कुछ लोगों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं तक लगातार पहुंच आसान नहीं होती। ऐसे में एक बार का उपचार मरीजों और डॉक्टरों दोनों के लिए आकर्षक विकल्प हो सकता है।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि जीन में स्थायी बदलाव करने वाली तकनीक के मामले में सुरक्षा का सवाल बेहद महत्वपूर्ण है। इसका असर लंबे समय तक बना रह सकता है, इसलिए इसके संभावित लाभ के साथ दीर्घकालिक जोखिमों को समझना भी जरूरी है।
अभी कई साल दूर है आम मरीजों के लिए इस्तेमाल
यह अध्ययन अभी शुरुआती चरण में है। इससे पहले इसी तरह के एक अन्य शुरुआती परीक्षण में अलग जीन-एडिटिंग तकनीक के जरिए 35 मरीजों में एलडीएल कोलेस्ट्रॉल में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई थी।
CRISPR Therapeutics के मुख्य कार्यकारी समार्थ कुलकर्णी के अनुसार, इस उपचार के अगले चरण में कुछ दर्जन मरीजों को शामिल किया जाएगा और इसके परिणाम साल के अंत तक आने की उम्मीद है। इसके बाद कंपनी बड़े फेज-3 परीक्षण की दिशा में नियामकों के साथ चर्चा करेगी।
जीन-एडिटिंग उपचारों में सुरक्षा और लंबे समय तक असर को लेकर अभी कई सवालों के जवाब मिलना बाकी हैं। इसी वजह से नियामक ऐसे उपचार पाने वाले मरीजों के लंबे समय तक फॉलो-अप की मांग करते हैं, जो 15 साल तक हो सकता है।
डॉ. मुसुनुरु के अनुसार, यदि आगे के बड़े अध्ययनों में सुरक्षा और प्रभावशीलता की पुष्टि होती है, तो यह तकनीक 2030 के दशक की शुरुआत में मरीजों के लिए एक विकल्प बन सकती है।
फिलहाल इसे कोलेस्ट्रॉल का नया इलाज मानना जल्दबाजी होगी। लेकिन शुरुआती नतीजे यह संकेत जरूर देते हैं कि भविष्य में कुछ मरीजों के लिए रोज-रोज दवा लेने के बजाय एक बार का जीन-आधारित उपचार संभव हो सकता है।
