ध्रुवीकरण के शोर में कौन पूछेगा सड़क, पानी, रोजगार और मालिकाना हक के सवाल?

— अनन्त आकाश
उत्तराखंड में अगले विधानसभा चुनाव की राजनीतिक आहट सुनाई देने लगी है। राजनीतिक दल अपने संगठन और चुनावी रणनीति को धार देने में जुटे हैं। आने वाले महीनों में यह गतिविधि और तेज होगी। लेकिन इसी के साथ एक बुनियादी सवाल भी सामने खड़ा है—अगला चुनाव उत्तराखंड के वास्तविक जनसरोकारों पर लड़ा जाएगा या भावनात्मक और सांप्रदायिक मुद्दे एक बार फिर सड़क, पानी, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास जैसे सवालों को पीछे धकेल देंगे?
लोकतंत्र में जनकल्याणकारी योजनाओं और जरूरतमंद लोगों तक सरकारी सहायता पहुंचने का अपना महत्व है। लेकिन जब चुनावी राजनीति में साड़ी, कंबल, राशन अथवा दूसरी तात्कालिक सहायता स्थायी नागरिक अधिकारों का विकल्प बनने लगे, तब सवाल उठना स्वाभाविक है। किसी परिवार को राहत सामग्री मिलना उपयोगी हो सकता है, लेकिन क्या वह पक्के मकान, नियमित पेयजल, बेहतर सड़क, अस्पताल में उपचार, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा की जगह ले सकती है?
देहरादून सहित उत्तराखंड के अनेक हिस्सों में लोगों के सामने रोजमर्रा की समस्याओं की लंबी सूची है। कहीं सड़कें खराब हैं तो कहीं सफाई और पेयजल की शिकायतें हैं। सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव है। बेरोजगारी युवाओं की बड़ी चिंता बनी हुई है। झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले हजारों परिवार भूमि और आवास के सुरक्षित अधिकार की अपेक्षा कर रहे हैं। महंगाई, बिजली व्यवस्था, स्मार्ट मीटर, निजीकरण, महिलाओं की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था जैसे प्रश्न भी सीधे आम आदमी के जीवन से जुड़े हैं। चुनावी विमर्श की कसौटी यही होनी चाहिए कि इन प्रश्नों के ठोस और दीर्घकालिक समाधान की बात कौन और कितनी गंभीरता से करता है।
विकास के बीच हाशिये के लोगों का सवाल
भाजपा अपने शासनकाल में केंद्र और राज्य की योजनाओं, आधारभूत ढांचे, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण और विकास परियोजनाओं को अपनी उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत करती रही है। कांग्रेस सरकार की नीतियों पर सवाल उठाती है और स्वयं को विकल्प के रूप में पेश कर रही है। लेकिन इन दोनों बड़े दलों के राजनीतिक संघर्ष के बीच एक तीसरा प्रश्न भी महत्वपूर्ण है—विकास की बड़ी परियोजनाओं में गरीब, श्रमिक, छोटे दुकानदार और बस्तियों में रहने वाले परिवार कहाँ खड़े हैं?
देहरादून में प्रस्तावित बड़ी सड़क और पुनर्विकास परियोजनाओं को लेकर प्रभावित लोगों में विस्थापन की आशंकाएं सामने आती रही हैं। ऐसी परियोजनाओं पर बहस केवल इस आधार पर नहीं होनी चाहिए कि उनसे यातायात कितना सुगम होगा। यह भी पूछा जाना चाहिए कि यदि किसी परिवार का घर या आजीविका प्रभावित होती है तो उसके पुनर्वास, मुआवजे और भविष्य की क्या व्यवस्था होगी। विकास और नागरिक अधिकार परस्पर विरोधी नहीं होने चाहिए।
तनाव की घटनाएं और राजनीति की जिम्मेदारी
वर्ष 2026 में उत्तराखंड में कुछ ऐसी घटनाएं भी हुईं जिन्होंने सामाजिक सद्भाव को लेकर चिंता पैदा की। जून में देहरादून जिले के बैरागीवाला में सिंचाई के पानी से शुरू हुआ विवाद हिंसक हो गया और एक व्यक्ति की मृत्यु हुई। इसके बाद तनाव, आगजनी और पथराव की घटनाएं हुईं तथा प्रशासन को बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात करना पड़ा। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार प्रशासन ने कुछ समय के लिए इंटरनेट सेवाएं भी निलंबित कीं।
इसी महीने कर्णप्रयाग में वाहन खड़ा करने को लेकर स्थानीय लोगों और हेमकुंड साहिब से लौट रहे कुछ निहंग सिख तीर्थयात्रियों के बीच विवाद हिंसक झड़प में बदल गया। पुलिस ने चार तीर्थयात्रियों को गिरफ्तार किया। बाद में निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के उद्देश्य से इससे जुड़े दो मामलों की जांच चमोली से हरिद्वार स्थानांतरित कर दी गई।
जुलाई में टिहरी जिले के कैंथौली गांव में एक सत्संग के दौरान कथित धर्मांतरण को लेकर विवाद हुआ। ग्रामीणों ने धर्मांतरण का आरोप लगाया और मामले ने तनाव का रूप लिया। ऐसे मामलों में आरोप और प्रमाण के बीच अंतर बनाए रखना तथा निष्पक्ष प्रशासनिक जांच के निष्कर्षों की प्रतीक्षा करना जरूरी है।
इन घटनाओं से सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह निकलता है कि स्थानीय विवादों को सांप्रदायिक पहचान का संघर्ष बनने से कैसे रोका जाए। राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और प्रशासन की जिम्मेदारी केवल तनाव के बाद शांति की अपील करना नहीं, बल्कि ऐसा वातावरण तैयार करना भी है जिसमें अपराध को अपराध और विवाद को विवाद की तरह देखा जाए—पूरे समुदाय को उसके लिए जिम्मेदार न ठहराया जाए।
जनसरोकारों पर जनसंगठनों की सक्रियता
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) और उससे जुड़े विभिन्न जनसंगठन उत्तराखंड में अपने राजनीतिक हस्तक्षेप का आधार रोजमर्रा के जनसरोकारों को बताते हैं। पार्टी पानी, बिजली, आवास, बस्तियों के मालिकाना अधिकार, विस्थापन, रोजगार, महंगाई, श्रमिक अधिकार, महिला सुरक्षा और किसानों के सवालों पर आंदोलनों में सक्रिय रही है।
देहरादून में माकपा ने बस्तियों में रहने वाले परिवारों को भूमि और आवास का अधिकार देने की मांग को प्रमुखता से उठाया है। पार्टी का तर्क है कि दशकों से बसे परिवारों के भविष्य को अनिश्चित नहीं छोड़ा जा सकता। प्रस्तावित सड़क परियोजनाओं के संदर्भ में भी वह प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और आजीविका की सुरक्षा का सवाल उठाती रही है। इसी तरह पेयजल और बिजली आपूर्ति तथा स्मार्ट मीटर को लेकर भी पार्टी ने प्रशासन और सरकार के सामने अपनी आपत्तियां रखी हैं।
उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों के चिन्हीकरण, भूमि पर अवैध कब्जों और भू-माफिया के विरुद्ध कार्रवाई जैसे विषय भी पार्टी के एजेंडे में हैं। माकपा का कहना है कि राज्य आंदोलन से जुड़े पात्र लोगों को उनका अधिकार मिलना चाहिए तथा सरकारी, वन और कृषि भूमि पर अवैध कब्जों के मामलों में प्रभावशाली और सामान्य व्यक्ति के लिए अलग-अलग पैमाने नहीं होने चाहिए।
सांप्रदायिक तनाव की घटनाओं पर पार्टी निष्पक्ष जांच और कानून के समान अनुपालन की मांग करती रही है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह सिद्धांत महत्वपूर्ण भी है कि किसी घटना में दोष तय करने का आधार व्यक्ति का धर्म या समुदाय नहीं, बल्कि प्रमाण और कानून होना चाहिए।
मजदूर, युवा, महिलाएं और किसान भी चुनावी विमर्श में आएं
माकपा से जुड़े श्रमिक संगठन सीटू की गतिविधियों में ठेका श्रमिकों, सफाई कर्मचारियों, योजना कर्मियों और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा, भविष्य निधि और कार्यस्थल की सुरक्षा जैसे प्रश्न प्रमुख हैं। छात्र संगठन एसएफआई बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता, शिक्षा के निजीकरण और सरकारी रोजगार के अवसरों के सवाल उठाता रहा है।
महिला संगठनों के एजेंडे में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा, कार्यस्थल पर उत्पीड़न, महंगाई, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दे हैं। अंकिता भंडारी हत्याकांड में न्याय की मांग भी विभिन्न जनसंगठनों के आंदोलनों का हिस्सा रही है।
किसान सभा फसल क्षति, मुआवजा, जंगली जानवरों से खेती को होने वाले नुकसान, खाद-बीज की कीमत और भूमि अधिग्रहण जैसे सवाल उठाती है। वहीं कानूनी क्षेत्र में सक्रिय संगठन आम आदमी को सस्ता और सुलभ न्याय, निःशुल्क कानूनी सहायता और न्यायिक प्रक्रियाओं को अधिक सुगम बनाने की आवश्यकता पर जोर देते हैं। विज्ञान आंदोलन से जुड़े संगठन वैज्ञानिक दृष्टिकोण, अंधविश्वास के विरोध और सामाजिक सद्भाव की पैरवी करते हैं।
इन संगठनों की मांगों से सहमत या असहमत हुआ जा सकता है, लेकिन उनके द्वारा उठाए गए प्रश्न लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा हैं। इसी तरह भाजपा, कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों से भी अपेक्षा है कि वे इन विषयों पर अपनी नीतियां, उपलब्धियां और भविष्य की कार्ययोजना स्पष्ट रूप से जनता के सामने रखें।
चुनाव आखिर किन सवालों पर हो?
लोकतंत्र की असली शक्ति मतदाता के पास है। इसलिए चुनाव केवल राजनीतिक दलों की परीक्षा नहीं, मुद्दों की प्राथमिकता तय करने का अवसर भी होता है। उत्तराखंड के मतदाता के सामने प्रश्न बहुत सीधे हैं—उसके घर में पानी नियमित आएगा या नहीं? उसके बच्चे को गुणवत्तापूर्ण और सस्ती शिक्षा मिलेगी या नहीं? बीमार होने पर सरकारी अस्पताल में उपचार मिलेगा या नहीं? युवा को रोजगार मिलेगा या उसे लगातार पलायन करना पड़ेगा? वर्षों से बस्ती में रह रहे परिवार को सुरक्षित आवास और मालिकाना अधिकार मिलेगा या उसके सिर पर विस्थापन की तलवार लटकती रहेगी? किसान की खेती जंगली जानवरों और बढ़ती लागत के बीच कैसे बचेगी? मजदूर को उसकी मेहनत का उचित पारिश्रमिक और सामाजिक सुरक्षा कैसे मिलेगी?
और इन सबसे ऊपर प्रश्न यह है कि क्या अलग-अलग धर्मों, जातियों और क्षेत्रों में रहने वाले उत्तराखंड के नागरिक अपनी रोजमर्रा की साझा समस्याओं को पहचान पाएंगे?
सड़क पर पड़ा गड्ढा हिंदू या मुसलमान नहीं होता। सूखा नल किसी की जाति नहीं पूछता। बेरोजगारी किसी धर्म को देखकर घर का दरवाजा नहीं खटखटाती। महंगाई का बोझ भी हर उस परिवार पर पड़ता है जिसकी आमदनी सीमित है। अस्पताल में उपचार, बच्चों की शिक्षा, महिलाओं की सुरक्षा और सिर पर सुरक्षित छत की जरूरत भी किसी एक समुदाय की नहीं होती।
इसलिए आगामी चुनाव की सबसे सार्थक बहस शायद यही हो सकती है कि भावनाओं और पहचान की राजनीति के बीच नागरिक अपने जीवन से जुड़े सवालों को कितना केंद्र में ला पाते हैं। राजनीतिक दलों की असली परीक्षा भी नारों से नहीं, बल्कि इस बात से होनी चाहिए कि उनके पास सड़क, पानी, रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास, सामाजिक सुरक्षा और कानून के समान शासन के लिए क्या ठोस कार्यक्रम है।
आखिर लोकतंत्र में चुनाव का अर्थ केवल सरकार चुनना नहीं है। उसका अर्थ यह तय करना भी है कि अगले पांच वर्षों तक राजनीति के केंद्र में कौन-से सवाल रहेंगे।
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