शिक्षा/साहित्य

पुस्तक समीक्षा : 351 कर्मशील महिलाओं की सूचनापरक जानकारी देती पुस्तक- ‘उत्तराखण्ड की महिलाएँ’

– समीक्षक- दिनेश शास्त्री –
 जल, जंगल, जमीन पर आधारित पहाड़ी राज्य उत्तराखण्ड के जनजीवन का प्रकृति से सदैव एक रागात्मक संबंध रहा है। इसका संरक्षण भी वह उसी सजग भाव से करता रहा है। यही कारण है कि जब भी, जहाँ भी प्रकृति के इन संसाधनों के दोहन की कुचेष्टा की गई, उत्तराखण्ड की नारी शक्ति ढाल बनकर खड़ी हो गई। पर्यावरणीय आन्दोलनों में उसने बढ़-चढ़कर भाग लिया और अपनी शक्तिमत्ता का लोहा मनवाया। ऐसी ही कर्मशील महिलाओं के संघर्ष और उपलब्धियों की सूचनापरक जानकारी दी गई है इस पुस्तक में।
      पुस्तक की कलमकार लिखती हैं कि- महिलाएँ किसी भी देश, धर्म, समुदाय की हों, उनके सुख-दुख, रोष-क्रोध, हँसी-खुशी, उत्साह-उल्लास अलग कहाँ होते हैं। बेशक परिवेश अलग हो सकता है लेकिन मन की गाँठें खोलती बातें, समस्याएँ, वेदनाएँ एक जैसी ही होती हैं। मातृत्व भाव, प्रसव अनुभूति, ऋतुमती होना भला किसी देश या धर्म में अलग कैसे हो सकते हैं। परिवार के लिए आर्थिक संसाधन जुटाने से पुरुष प्रधान समाज की स्थापना हुई। पितृसत्तात्मक दुनिया के कई देशों में कुछ क्षेत्रों की सामाजिक व्यवस्था आज भी मातृसत्तात्मक है। तिब्बत के पास चीन में मोसुओ संस्कृति को अक्सर मातृसत्तात्मक माना जाता है। इण्डोनेशिया के सुमात्रा में मिनांगकाबाउ दुनिया का सबसे बड़ा मातृवंशीय समाज है। इसी तरह से कोस्टारिका का ब्रिब्रि जनजातीय समाज तथा घाना की अकान जनजाति भी मातृसत्तात्मक है। भारत के उत्तर-पूर्व मेघालय में खासी, गारो, जैंतिया आदि समाज में बड़े पैमाने पर मातृसत्तात्मक प्रणाली की एक लम्बी परम्परा है। ये परम्परा यहाँ के सभी धर्मों में प्रचलित है। ये इस व्यवस्था को अपनी संस्कृति बताते हैं।
         भारतीय संस्कृति के मूलाधार वेदों में महिलाओं को शिक्षा, यज्ञ, ज्ञान और अध्यात्म में पुरुषों जैसी ही समानता थी। अदिति, शची, सती शतरूपा, सन्ध्या, विदुषी अरुन्धती, ब्रह्मवादिनी घोषा, विश्ववरा, अपाला, ब्रह्मवादिनी वाक्, रोमशा, गार्गी, मैत्रेयी, सुलभा, लोपामुद्रा, उशिज, प्रातिथेयी, भामती, विद्योत्तमा आदि वेदों की परम विदुषी थीं। माना जाता है कि पहले मातृसत्तात्मक परिवार थे। खेती तथा एक जगह बस्ती बनाकर रहने की शुरुआत महिलाओं ने ही की थी।  “किसी समाज में तीन सत्ताएँ काम करती हैं, राजनैतिक सत्ता, परिवार की सत्ता, धर्म-संस्कृति और परम्पराओं की सत्ता। ये सभी पितृसत्ता को मजबूत करती हैं। क्योंकि स्त्री में प्रजनन क्षमता है, अतः इन सबको बनाये रखने के लिए स्त्री पर यौनिक नियंत्रण रखना जरूरी समझा जाता है। इतिहासकारों के अनुसार सभी आरंभिक समाज लगभग मातृसत्तात्मक रहे हैं, उनका मानना है कि 8000 साल से पहले का इतिहास मातृसत्तात्मक था। सन् 2000 के बाद डी. एन. ए. के क्षेत्र में जो तरक्की हुई है, उससे यह तथ्य अधिक पुख्ता हो गया है।” ( उत्तरा महिला पत्रिका- अक्टूबर 23 से मार्च  2024 पृ. 4)
         पितृसत्ता का निर्माण 3100 ई. पू. से 600 ई. पू. तक हुआ, जिसमें 2500 वर्ष लगे।  18वीं सदी में उद्योगों की स्थापना होने लगी। पुरुषों के साथ महिलाएँ भी उद्योग-धंधों में काम पर जाने लगीं। महिलाओं ने संगठित होना शुरू किया। मताधिकारों से वंचित महिलाओं ने संघर्ष किया। सन् 1917 में सोवियत रूस ने, 1920 में अमेरिका, 1927 में ब्रिटेन, 1944 में फ्रांस ने महिलाओं को मतदान का अधिकार दिया। सन् 1945 में संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के बाद भारत सहित कई देशों ने महिलाओं को मताधिकार दिया। हालांकि भारत के कई प्रांतों में 1927 और 1929 से महिला मताधिकार प्राप्त था। 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी के प्रारम्भ में संगठित महिला आंदोलन में सक्रिय महिलाओं ने देखा कि इतिहास की किताबों में महिलाओं के बारे में बहुत कम लिखा गया था। महिलाओं को अपना इतिहास लिखने के लिए प्रेरित किया गया। बारबरा हचिन्स, बारबरा ड्रेक और एलिस क्लार्क जैसे लेखकों ने महिलाओं के काम, ट्रेड यूनियनवाद और राजनीति में महिलाओं की गतिविधियों का विस्तारपूर्वक अध्ययन किया।
          भारत के संदर्भ में बात करें तो आजादी के संघर्ष में महिलाओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इनमें भिकाजी कामा, डाॅ. एनी बेसेंट, प्रीतिलता वाडेकर, विजयलक्ष्मी पंडित, राजकुमारी अमृत कौर, अरुणा आसफ अली, सुचेता कृपलानी, कस्तूरबा गाँधी, मुथुलक्ष्मी रेड्डी, दुर्गाबाई देशमुख, कैप्टेन लक्ष्मी सहगल आदि प्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रही हैं। इनमें सरोजिनी नायडू भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष बनने वाली पहली भारतीय महिला और भारत के किसी राज्य की पहली महिला राज्यपाल भी थीं। स्वतंत्रता के बाद बने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15, तथा 16 में महिलाओं को समानता के अधिकार का प्रावधान है। महिलाओं को गरिमा और शालीनता के साथ जीने का, जीविका के पर्याप्त साधन पाने का, समान काम के लिए एक जैसा वेतन, संपत्ति रखने, मताधिकार आदि प्राप्त हैं।
     उत्तराखण्ड राज्य के निर्माण में नारी शक्ति का अतुलनीय योगदान सर्वविदित है। इस हिमालयी राज्य की विकट भौगोलिक परिस्थितियों में अपनी उत्कट जिजीविषा एवं सांगठनिक क्षमता के बल पर यहाँ की वीरांगनाएँ सामाजिक आन्दोलनों से लेकर साहित्यिक, सांस्कृतिक क्षेत्र में भी इतिहास रचती आई हैं। वीरबाला तीलू रौतेली हो या चिपको आन्दोलन की प्रणेता गौरा देवी, शराब विरोधी आन्दोलन की नेत्री टिंचरी माई हो या एवरेस्ट फतह करने वाली भारत की पहली महिला बछेन्द्री पाल, सबने असाधारण जीवटता एवं अदम्य साहस की मिसाल पेश कर इस पहाड़ी राज्य उत्तराखण्ड को विश्व फलक पर नई पहचान दी है। इस पुस्तक में अलग-अलग क्षेत्रों में कार्यशील महिलाओं की जानकारी इस प्रकार दी गई है।
        राजनीति के क्षेत्र में जिया राणी ‘मौला देवी’, रानी कर्णावती, तीलू रौतेली, गुलेरिया कुन्दन देई, महारानी कमलेन्दुमति शाह, आइरिन पंत, विनय लक्ष्मी सुमन, इला पंत, डाॅ० इन्दिरा हृदयेश, डाॅ० रीता बहुगुणा जोशी, माला राज्यलक्ष्मी शाह, गीता देवी, विजय बड़थ्वाल, मनोरमा डोबरियाल शर्मा, शैलारानी रावत,अमृता रावत, डाॅ० कल्पना सैनी, सरिता आर्य, ऋतु खण्डूड़ी भूषण,आशा नौटियाल, गरिमा मेहरा दसौनी, रेखा आर्य, नेहा जोशी, अनुकृति गुसाईं आदि उल्लेखनीय नाम हैं।
      प्रशासन, न्याय और सेना में माया टम्टा (आर्मी नर्सिंग सेवा), पहली महिला राज्यपाल मार्गरेट अल्वा, पहली महिला पुलिस महानिदेशक कंचन चौधरी भट्टाचार्य, पहली मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रितु बाहरी, पहली महिला मुख्य सचिव राधा रतूड़ी, ले. कमाण्डर वर्तिका जोशी हैं।
          शिक्षा के क्षेत्र में चन्द्रमुखी बोस, महादेवी भटनागर, आचार्या विद्यावती सेठ, चन्द्रावती लखनपाल, ललिता चन्दोला वैष्णव, बसन्त कुमारी घिल्डियाल, गंगोत्री गर्ब्याल, प्रो० गिरिजा सकलानी, डाॅ० सुशीला डोभाल, डाॅ० सुधारानी पाण्डेय, प्रो० उमा मैठाणी, प्रो० उमा भट्ट, प्रो० वीना साह, डाॅ० सविता मोहन, प्रो० आशा पाण्डे, प्रो० अन्नपूर्णा नौटियाल, प्रो० मृदुला जुगरान, प्रो० मंजुला राणा, प्रो० कल्पना पंत, डाॅ० किरन त्रिपाठी, प्रो० सुरेखा डंगवाल, डाॅ० अंजना जोशी आदि प्रमुख हैं।
      पर्यावरण के क्षेत्र में गौरा देवी, संग्रामी देवी राणा, सुलोचना गैरोला, बाली देवी, बौणी देवी, विशेश्वरी देवी, बसंती देवी आदि का उल्लेखनीय योगदान है।
        सामाजिक आंदोलन के क्षेत्र में सरला बहन, शर्मदा त्यागी, इच्छागिरी ‘टिंचरी माई’, बिशनी देवी शाह, विमला बहुगुणा, सुशीला बलूनी, कौशल्या डबराल, कलावती देवी रावत, कमला पंत, बसंती पाठक, डाॅ० मधु थपलियाल आदि प्रमुख हैं।
     समाज सेवा के क्षेत्र में मीरा बहन, मंगला देवी जुयाल, राजमाता राजेश्वरी देवी, रेवती उनियाल, देविका चौहान, राधा भट्ट, जीवन्ती देवी खोयाल, मंगला माता, जाह्नवी तिवारी, डाॅ० गिरिबाला जुयाल, मधु मैखुरी, हेमलता बहन, अनुराधा पांडे, विजयलक्ष्मी बिजल्वाण जोशी, सविता नगरकोटी,किरन पाण्डेय, कमला रावत, ममता रावत आदि प्रमुख नाम हैं।
    उद्यमिता के क्षेत्र में तुलसी देवी, शशि रतूड़ी ‘नमकवाली’, किरन भट्ट टोडरिया, नीलम नेगी ‘नीलकंठ’, स्वतंत्री बंधानी ‘श्वेता’, मंजू काला, पुष्पा चौहान, किरण नौगांई शर्मा, सीता भट्ट, रानू बिष्ट, मंजू टम्टा, सुमन अधिकारी, दीना रमोला, प्रेमा मेहता, डाॅ० पूजा गौड़, ममता मेहरा, मंजू आर. शाह, ऋचा डोभाल, नेहा कन्नौजिया, नूतन तन्नु पंत, दिव्या रावत, शिल्पा बहुगुणा भट्ट, रीना रावत,
ऋतु नौटियाल श्रीयाल, बबीता रावत, संगीता बहुगुणा आदि उल्लेखनीय कार्य कर रही हैं।
     पर्वतारोहण के क्षेत्र में चन्द्रप्रभा ऐतवाल, बछेन्द्री पाल, डाॅ० हर्षवन्ती बिष्ट, सुमन कुटियाल दताल, हर्षा रावत, ताशी नुंग्शी, नूतन वशिष्ठ, प्रीति नेगी, शीतल राज, सविता कंसवाल, पूनम राणा आदि नाम प्रमुख हैं।
    खेलों में हंसा मनराल शर्मा, मधुमिता बिष्ट, रीना कौशल धर्मसक्तू, नीरजा गोयल, वंदना पंवार, एकता बिष्ट, सुनीता चौहान, कमला रावत, रक्षिता पंत, स्वाति बिष्ट, वंदना कटारिया, अंकिता ध्यानी,
मानसी नेगी का विशिष्ट योगदान है।
     योग एवं जीवन कौशल के क्षेत्र में डाॅ० इन्दु शर्मा उनियाल, उषा नेगी, अनीता मिश्रा, रश्मि बसलियाल, डाॅ० कविता भट्ट ‘शैलपुत्री’,तन्नु मित्तल आदि प्रमुख नाम हैं।
      कला के क्षेत्र को गौरवान्वित करने वालों में गौरी पंत, चमेली जुगराण, अंजलि थापा, संदली देवी, डाॅ० ममता सिंह, मकानी देवी, संगीता लखेड़ा, लता शुक्ला, नमिता तिवारी, कुंजिका वर्मा, कंचन जदली, मीनाक्षी खाती आदि हैं।
        रंगमंच एवं फिल्म के क्षेत्र में नईमा खान उप्रेती, तेजी मटियानी, सुशीला रावत, पार्वती बिष्ट, हिमानी शिवपुरी, उर्मि नेगी, मंजु कुकरेती बहुगुणा,शांति चतुर्वेदी, अर्चना पूरन सिंह, सुनीता जुयाल,सुषमा बड़थ्वाल, चन्द्रकांता मलासी, बबीता अनंत, सुनीता रजवार, सोनिया गैरोला, कालिंदी बडोला, शैली जोशी, पूजा डडवाल,सुमन गौड़, रितुन थपलियाल मिश्रा, भावना नेगी, कुसुम पंत, वसुंधरा नेगी, मधुरिमा तुली, सुरमयी, सृष्टि लखेड़ा, रूप दुर्गापाल, चित्रांशी रावत, डाॅ० सृष्टि रावत, अंजली नेगी, तृप्ति डिमरी, उर्वशी रौतेला, अंजलि ततरारी आदि प्रमुख नाम हैं।
    संगीत एवं गायन में परुली देवी, सरस्वती देवी, चन्द्रलेखा त्रिपाठी, कबूतरी देवी, पूर्णिमा पाण्डे, बचनदेई, वीना तिवारी, बसन्ती बिष्ट, डाॅ० माधुरी बड़थ्वाल, डाॅ० तुष्टि मैठाणी, रेखा धस्माना उनियाल, डाॅ० सीमा उनियाल मिश्रा, रामेश्वरी भट्ट, कल्पना चौहान, अनुराधा निराला, मंजु सुन्दरियाल, कमला देवी, पम्मी नवल ‘पवित्रा’, स्वर्णिमा गुसांई, मीना राणा, संगीता ढौंडियाल, पुष्पा फर्त्याल, उप्रेती सिस्टर्स, माया उपाध्याय, पूनम सती, हेमा नेगी करासी, अर्चना सती, डाॅ० कुसुम भट्ट, रेशमा शाह, चारु सेमवाल, नेहा कक्कड़, खुशी जोशी, ममता आर्य, अंजलि खरे, दिव्या सेमवाल पुरोहित, प्रियंका मेहर, नंदा सती, अनिशा रांगड़ का विशेष योगदान है।
     साहित्य एवं अन्य लेखन के क्षेत्र में तारा पाण्डे, तारा अली बेग, पार्वती उप्रेती, डाॅ० शशिप्रभा शास्त्री, शिवानी, नयनतारा सहगल, मार्गरेट भट्टी, कृष्णा खुराना, आशा शैली, डाॅली डबराल, मृणाल पाण्डे, डाॅ० सुनीति रावत, दीपा अग्रवाल, शमा ख़ान, प्रो० जयवन्ती डिमरी, कौशल्या अग्रवाल, प्रो० दिवा भट्ट, डाॅ० विद्या सिंह, पुष्पलता भट्ट, नमिता गोखले, दीक्षा बिष्ट, सरोजिनी नौटियाल, डाॅ० मनोरमा ढौंडियाल, गीता गैरोला,एम. जोशी हिमानी, अज़रा खान नूर, प्रो० पुष्पा खण्डूरी, बसन्ती मठपाल, सुधा जुगरान, मृदुल जोशी, कुसुम भट्ट, डाॅ० कुमुदिनी नौटियाल, रश्मि बड़थ्वाल, डाॅ० प्रभा पंत, अर्चना पैन्यूली, हेमा उनियाल, आशा नवानी पैन्यूली, डाॅ० अर्चना बहुगुणा, डाॅ० दीपा गोबाड़ी, अनीता सोनी, डाॅ० नूतन गैरोला, डाॅ० रश्मि रावत, राधा मैन्दोली, सुनीता चौहान, प्रेमलता सजवाण,कान्ता घिल्डियाल, अद्वैता काला, माया गोला, प्रो० प्रीति आर्या, डाॅ० अमिता प्रकाश, डाॅ० राजकुमारी चौहान, रेखा चमोली,रामेश्वरी नादान,सपना भट्ट, रुचि बहुगुणा उनियाल, स्वाति मेलकानी,  सावित्री काला, महेश्वरी कनेरी, उमा घिल्डियाल, कमलेश्वरी मिश्रा, सिद्धि डोभाल, शीला रजवार, सुनीता शाही आदि प्रमुख नाम हैं।
आंचलिक साहित्य में विद्यावती डोभाल, देवकी मेहरा, डाॅ० दीपा काण्डपाल, वसुन्धरा डोभाल, वीणापाणी जोशी, डाॅ० कमला पंत, लीला खोलिया, सुमित्रा जुगलान, डाॅ० नीता कुकरेती,
डाॅ० आशा रावत, डाॅ० कुसुमरानी नैथानी, भारती पाण्डे, डाॅ० उमा भट्ट, प्रो० चन्द्रकला रावत, डाॅ० गीता नौटियाल, बीना कण्डारी, बीना बेंजवाल, शांति अमोली बिंजोला, रिद्धि भट्ट,भारती आनंद ‘अनंता’, डाॅ० सरस्वती कोहली, सुलोचना परमार, रजनी कुकरेती, रक्षा बौड़ाई, मधुरवादिनी तिवारी, लक्ष्मी नौडियाल, अंजना कंडवाल, विनीता मैठाणी, उपासना सेमवाल आदि प्रमुख नाम हैं।
पत्रकारिता के क्षेत्र में लक्ष्मी देवी टम्टा,जसकिरण चोपड़ा, सुषमा जुगरान ध्यानी, डाॅ० अंजलि नौरियाल, सुलोचना पयाल,ज्योत्सना, लक्ष्मी बिष्ट ‘मधु’, मीना नेगी, नेहा सनवार बिष्ट, दीपा शर्मा भट्टाराई, विजयलक्ष्मी भट्ट सती, रश्मि खत्री, माधुरी दानू पुंडीर, गंगा असनोड़ा, सरिता नेगी, सोनाली शर्मा, निर्मला बोहरा, मीनाक्षी कण्डवाल, तान्या पुरोहित, रेनू सकलानी आदि प्रमुख नाम हैं।
विज्ञान के क्षेत्र को गौरवान्वित करने वालों में प्रो० वीणा टंडन, प्रो० मंजु बंसल, डाॅ० वंदना शिवा, डाॅ० अल्का गोयल, स्नेहा नेगी आदि हैं।
ज्ञानो देवी, ममता थपलियाल, डाॅ० रुचि बडोनी सेमवाल, सरिता भण्डारी, ज्योति बिष्ट आदि का भी विविध क्षेत्रों में योगदान है।
        उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद यहाँ की महिलाएँ न केवल शिक्षा, साहित्य, संस्कृति व राजनीति के क्षेत्र में अपना योगदान दे रही हैं वरन उद्यमिता के क्षेत्र में भी पहाड़ी पिस्यूं लूण, ऐपण कला, लाटी कार्टून, मशरूम तथा ऑरिगेनो उत्पादन जैसे अभिनव प्रयोग करके अपनी विशिष्ट पहचान बना रही हैं। उच्च व्यावसायिक शिक्षा हासिल करने वाली हमारी बेटियाँ तो नवाचार करती हुई आत्मनिर्भर होकर दूसरों को भी रोजगार के अवसर उपलब्ध करवा रही हैं। खेलकूद हो या सेना, हर क्षेत्र उनकी उपलब्धियों से गौरवान्वित हो रहा है।
वैसे तो इस पर्वतीय राज्य उत्तराखण्ड में हर महिला संघर्षशील है पर ये वे महिलाएँ हैं जिन्होंने इसी संघर्षशीलता के बल पर आगे बढ़ते हुए अपनी आकांक्षाओं को उपलब्धियों में बदला। इस पुस्तक में 60 दिवंगत महिला विभूतियों और 291 कर्मशील महिलाओं सहित कुल 351 महिलाओं की उपलब्धियों की सूचनापरक जानकारी दी गई है, उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने के साथ दूसरों को भी प्रेरणा देने का कार्य किया है। पुस्तक में ऐसी ही महिलाओं की सफलता की कहानियों को एक जगह समेटने का प्रयास किया गया है।
पुस्तक : उत्तराखण्ड की महिलाएँ : संघर्ष और उपलब्धियों का परिचयात्मक संचयन
लेखक : बीना बेंजवाल
प्रकाशक : ओल्डन बर्च बुक्स, देहरादून।
वितरक : विनसर पब्लिशिंग कंपनी, देहरादून।
पृष्ठ : 344
मूल्य: महिलाएँ’

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