तीनों सेना प्रमुखों के लिये सीडीएस बनने के रास्ते फ़िलहाल हुये बंद

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-जयसिंह रावत
भारत सरकार ने देश के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल बिपिन रावत की हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मृत्यु के 9 महीने बाद दूसरे सीडीएस की नियुक्ति कर जनरलों के ऊपर लेफ्टिनेंट जनरल को पहुंचा दिया। इस महत्वपूर्ण पद पर आसीन होने जा रहे लेफ्टिनेंट जनरल (सेनि) अनिल रावत भी उत्तराखण्ड के उसी पौड़ी गढ़वाल के निवासी हैं जहां के स्वर्गीय जनरल बिपिन रावत थे। जो कि देश की रक्षा में इस छोटे से राज्य की शौर्य, राष्ट्र के लिये समर्पण तथा बलिदान की महान परम्परा का परिचायक ही है। दोनों जनरलों में अंतर इतना ही है कि बिपिन रावत फोर स्टार वाले थलसेना अध्यक्ष पद के बाद सीडीएस बने थे तो अनिल चौहान थ्री स्टार लेफ्टिनेंट जनरल के पद से रिटायर होने के बाद 4 स्टार वाले पद पर पहुंचे हैं। यह व्यवस्था भी इसी साल जून में शरू हुयी है। जिसका असर सेना पर देखा जाना बाकी है। नयी व्यवस्था में ऐसी उम्र सीमा रखी गयी है ताकि तीनों सेनाओं के प्रमुख उस पद तक न पहुंच सकें। अग्निवीर योजना के साथ ही यह व्यवस्था भी भारत की सेनाओं को झकझोरने वाली ही है।

                                                    Three star and four star generals ( see on colors of the generals)

तीनों सेना प्रमुखों में जूनियर नहीं हैं अनिल चौहान

सीडीएस तीनों सेनाओं के प्रमुखों के साथ चौथा फोर स्टार जनरल होता है, जो कि तीनों जनरलों का बॉस नहीं बल्कि बराबरों में प्रथम माना जाता है। इसलिये पहले से ही 4 स्टार वाले सेना प्रमुखों के ऊपर 3 स्टार वाले जनरल को पदासीन करने पर सवाल उठने स्वाभाविक ही हैं। इससे सेना के अन्दर भी अग्निवीर योजना के बाद दूसरी बार कशमशाहट होना स्वाभाविक ही है। लेकिन देखा जाय तो अनिल चौहान थ्री स्टार जनरल अवश्य रहे मगर उन्हें मौजूदा सेना प्रमुखों से जूनियर नहीं माना जा सकता। वर्तमान थल सेना प्रमुख जनरल मनोज पाण्डे का जन्म 6 मई 1962 को हुआ और सेना में उनकी कमिशनिंग दिसम्बर 1982 में हुयी। नोसेना प्रमुख एडमिरल हरि कुमार का जन्म 12 अप्रैल 1962 को हुआ और नोसेना में उनकी कमिशनिंग 1 जनवरी 1983 को हुयी। इसी प्रकार वायुसेना प्रमुख विवेक राम चौधरी का जन्म 4 सितम्बर 1962 को हुआ और वायु सेना में उनकी कमिशनिंग 29 दिसम्बर 1982 को हुयी। जबकि सीडएस पद पर नियुक्त ले. जनरल अनिल चौहान की जन्म तिथि 18 मई 1961 तथा थल सेना में उनकी कमिशनिंग वर्ष 1981 की है। इस तरह वह उम्र और कमिशनिंग के लिहाज से तीनों ही सेनाओं के प्रमुखों में वरिष्ठ हैं।

सीडीएस पद पर अब जनरल नहीं पहुंच सकेंगे

सेना में सुधार के नाम पर चार साल की सेवा वाले अग्निवीर नियुक्त करना और अब जनरलों के ऊपर लेफ्टिनेंट जनरल को बिठाना परम्परागत सैन्य ढांचे को हिलाने जैसा ही है जिसके परिणाम भविष्य में देखने को मिलेंगे। तीनों सेनाओं की रिटायरमेंट उम्र 62 साल है और इस पद पर 62 साल से कम उम्र का सैन्य अधिकारी ही नियुक्त हो सकता है। जनरल बिपिन रावत को जब पहला सीडीएस बनाया गया था तो उस समय इस पद के लिये तीनों सेनाओं में से 4 स्टार रैंक जरूरी था। लेकिन जनरल रावत के निधन से इस पद के रिक्त हो जाने के बाद भारत सरकार ने उस नियम में संशोधन कर चयन का दायरा बढ़ा दिया। दायरा बढ़ाने के पीछे का उद्ेश्य मोदी जी को ही पता होगा या फिर सुरक्षा सलाहकार अजित डोबाल का ही जानकारी होगी। भारत सरकार के 6 जून 2022 के गजट नोटिफिकेशन के अनुसार एक नए सीडीएस की नियुक्ति के लिए, केंद्र सरकार उन अधिकारियों पर विचार कर सकती है जो लेफ्टिनेंट जनरल समकक्ष या सामान्य समकक्ष के रूप में सेवा कर रहे हैं या ऐसे अधिकारी जो लेफ्टिनेंट जनरल या जनरल के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं, लेकिन नियुक्ति की तिथि पर 62 वर्ष की आयु से कम हांे। नए नियमों का मतलब है कि हाल ही में सेवानिवृत प्रमुखों पर विचार नहीं किया जाएगा। इसी नोटिफिकेशन के आधार पर सरकार ने एक तीन स्टार जनरल को सीडीएस पद पर नियुक्त कर दिया। यह संशोधन उन सभी थ्री-स्टार रैंक के अधिकारियों को योग्य बनाता है, जो पिछले दो वर्षों में सेवानिवृत्त हुए हैं।जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की CDS  बनने की चर्चा हुयी मगर 62 साल उम्र की सीमा ने उन्हे रेस से बाहर कर दिया था.

कमाण्डर इन चीफ का पद 1947 में ही समाप्त हो गया था

तीनों सेनाओं के लिये एक संयुक्त कमाण्ड का विचार नया नहीं है। ब्रिटिश काल के दौरान, भारत शायद दुनिया का एकमात्र देश था, जिसके पास तीनों सेवाओं के लिए एक ही कमांडर-इन-चीफ था। भारत में अंग्रेजों का पहला कमाण्डर इन चीफ स्ट्रिंगर लॉरेंस था जिसकी नियुक्ति 1748 में हुयी थी। सर क्लाउड औचिनलेक के बाद 1947 में इस व्यवस्था को छोड़ दिया गया और प्रत्येक सेवा के पास एक दूसरे से स्वतंत्र अपने स्वयं के कमांडर इन चीफ बनाये गये। भारत के पहले कमाण्डर इन चीफ रॉब लॉकहर्ट ( 15 अगस्त 1947 से 31 दिसम्बर 1947) और अंतिम कमाण्डर इन चीफ राजेन्द्र सिंह जडेजा (14 जनवरी 1953 से 1अप्रैल 1955) थे। सन 1955 में संसद के एक अधिनियम से सी-इन-सी का पद भी समाप्त कर तीनों सेनाओं चीफ ऑफ स्टाफ बना दिये गये। थल सेना के पहले चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ भी जनरल जडेजा ही बने। आजादी के समय नये भारत की सुरक्षा के लिये सबसे पहले यह विचार गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन का भी था जो कि भारत के नये नेतृत्व को व्यवहारिक नहीं लगा। सेना में बहुत शक्तिशाली पद देने के बारे में आशंकाएं बाद में पाकिस्तान में सही साबित भी हुयीं। उसके बाद थल सेना के 11वें प्रमुख जनरल के.वी. कृष्णा राव ने जून 1982 में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के पद के सृजन का विचार रखा था। यह विचार मार्च 1983 में जब संसद में रक्षा बजट पर चर्चा के दौरान उठा तो इसका काफी विरोध हुआ। चर्चा के दौरान बात उठी कि विश्व के बदलते सुरक्षा परिदृष्य को ध्यान में रखते हुये देश की रक्षा तैयारियों को नौकरशाही के ढांचे से मुक्त कर बेहतर समन्वय के लिये तीनों सेनाओं की एक संयुक्त कमान की होनी चाहिये। लेकिन इस विचार को तत्कालीन रक्षामंत्री आर. वेंकटरमण (जो बाद में राष्ट्रपति भी बने) ने अस्वीकार कर दिया। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी संयुक्त कमान में रुचि नहीं ली। इसका एक कारण मिलिट्री जनरलों के हाथों में अधिक शक्तियों का केन्द्रित होना नागर प्रशासन में सेना की दखल का अंदेशा भी था।

कारगिल रिव्यू कमेटी ने की थी सीडीएस की सिफारिश

यद्यपि बिखरी हुयी सैन्य कमानों का खामियाजा भारत ने 1962 के भारत-चीन युद्ध में भुगत लिया था मगर आंख कारगिल युद्ध के बाद ही पूरी तरह खुली। आधिकारिक तौर पर, 1999 में कारगिल रिव्यू कमेटी की सिफारिश के बाद ही मंत्रियों के समूह ने वर्ष 2001 में सीडीएस के निर्माण का प्रस्ताव दिया था। बाद में 2012 में नरेश चंद्र टास्क फोर्स और 2016 में लेफ्टिनेंट जनरल डीबी शेकटकर समिति सहित, अन्य समितियों ने भी सीडीएस के लिये सुझाव दिये थे। 2006 में इस पद की स्थापना को लेकर सभी राजनीतिक दलों से सलाह मशबिरा की प्रक्रिया शुरू हुई और 2017 में, सुरक्षा पर कैबिनेट समिति ने सीडीएस के लिए एक पद के श्रृजन से संबंधित अंतिम निर्णय लेने की प्रक्रिया शुरू की। इसी के तहत तीनों सेनाओं के प्रमुखों की समिति चेयरमैन ऑफ चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी के पद का श्रृजन हुआ। इसे सीडीएस पद के अग्रदूत के रूप में माना जा सकता है।

चीफ ऑफ डिफेंस स्टॉफ के नेतृत्व में सैन्य मामलों का विभाग निम्मलिखित क्षेत्रों में  कार्य करेगा :  

  1. संघ की सशस्त्र सेना यानि सेना, नौसेना और वायु सेना।
  2. रक्षा मंत्रालय के समन्वित मुख्यालय जिनमें सेना मुख्यालय, नौसेना मुख्यालय, वायु सेना मुख्यालय और डिफेंस स्टॉफ मुख्यालय शामिल है।
  3. प्रादेशिक सेना।
  4. सेना, नौसेना और वायु सेना से जुड़े कार्य ।
  5. चालू नियमों और प्रक्रियाओं के अनुसार पूंजीगत प्राप्तियों को छोड़कर सेवाओं के लिए विशिष्ट खरीद।

 

उपरोक्त मामलों के अलावा सैन्य मामलों के विभाग के अधिकार क्षेत्र में निम्नलिखित बातें भी शामिल होंगीः-

ए.) एकीकृत संयुक्त योजनाओं और आवश्यकताओं के माध्यम से सैन्य सेवाओं की

खरीद, प्रशिक्षण और स्टॉफ की नियुक्ति की प्रक्रिया में समन्वय लाना।

बी.) संयुक्त संचालन के माध्यम से संसाधनों के तर्कसंगत इस्तेमाल के लिए सैन्य कमानों के पुनर्गठन और संयुक्त थिएटर कमानों के गठन की सुविधा।

सी.) सेनाओं द्वारा स्वदेश निर्मित उपकरणों के इस्तेमाल को बढ़ावा देना।

 

सैन्य मामलों के विभाग का प्रमुख होने के अलावा चीफ ऑफ डिफेंस स्टॉफ चीफ ऑफ स्टॉफ कमेटी के अध्यक्ष भी होंगे। वे सेना के तीनों अंगों के मामले में रक्षा मंत्री के प्रमुख सैन्य सलाहकार के रूप में कार्य करेंगे, लेकिन इसके साथ ही तीनों सेनाओं के अध्यक्ष रक्षा मंत्री को अपनी सेनाओं के संबंध में सलाह देना जारी रखेंगे। चीफ ऑफ डिफेंस स्टॉफ तीनों सेनाओं के प्रमुखों का कमान नहीं करेंगे और नहीं किसी अन्य सैन्य कमान के लिए अपने अधिकारों का इस्तेमाल करेंगे, ताकि राजनीतिक नेतृत्व को सैन्य मामलों में निष्पक्ष सुझाव दे सके।

चीफ ऑफ स्टॉफ कमेटी के स्थायी अध्यक्ष के रूप में चीफ ऑफ डिफेंस स्टॉफ निम्नलिखित कार्य करेंगेः-

  • वे तीनों सैन्य सेवाओं के लिए प्रशासनिक कार्यों की देख-रेख करेंगे। तीनों सेवाओं से जुड़ी एजेंसियों, संगठनों तथा साइबर और स्पेस से संबंधित कार्यों की कमान चीफ ऑफ डिफेंस स्टॉफ के हाथों में होगी।
  • सीडीएस रक्षा मंत्री की अध्‍यक्षता वाली रक्षा अधिग्रहण परिषद और एनएसए की अध्‍यक्षता वाली रक्षा नियोजन समिति के सदस्‍य होंगे।
  • परमाणु कमान प्राधिकरण के सैन्य सलाहकार के रूप में कार्य करेंगे।
  • प्रथम सीडीएस के पदभार संभालने के बाद तीन वर्षों के भीतर तीनों ही सेवाओं के परिचालन, लॉजिस्टिक्‍स, आवाजाही, प्रशिक्षण, सहायक सेवाओं, संचार, मरम्‍मत एवं रखरखाव इत्‍यादि में संयुक्तता सुनिश्चित करेंगे।
  • अवसंरचना का इष्‍टतम उपयोग सुनिश्चित करेंगे और तीनों ही सेवाओं के बीच संयुक्‍तता के जरिए इसे तर्कसंगत बनाएंगे।
  • एकीकृत क्षमता विकास योजना (आईसीडीपी) के बाद आगे के कदम के रूप में पंचवर्षीय रक्षा पूंजीगत सामान अधिग्रहण योजना (डीसीएपी) और दो वर्षीय सतत वार्षिक अधिग्रहण योजनाओं (एएपी) को कार्यान्वित करेंगे।
  • अनुमानित बजट के आधार पर पूंजीगत सामान खरीद के प्रस्‍तावों को अंतर-सेवा प्राथमिकता देंगे।
  • अपव्‍यय में कमी करके सशस्‍त्र बलों की लड़ाकू क्षमताएं बढ़ाने के लिए तीनों सेवाओं के कामकाज में सुधारों को लागू करेंगे।

 

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