पाकिस्तान पर कुछ नोट्स- 29 : इतिहास से मुंह छिपाते हुए

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–डॉ0 सुशील उपाध्याय —

पाकिस्तान की आजादी का दर्शन भारत की आजादी के दर्शन से पूरी तरह अलग है। भारत अंग्रेजों से मुक्ति के लिए लड़ रहा था, जबकि पाकिस्तान बनाने की लड़ाई भारत के बहुसंख्यक हिंदुओं के खिलाफ थी। बात साफ है कि दोनों देशों का दार्शनिक धरातल ही अलग है। पाकिस्तान की मजबूरी यह है कि उसे एक गढ़े गए और फैब्रिकेटिड इतिहास पर अपना भवन खड़ा करना पड़ रहा है, लेकिन इसकी राह में तथ्य एक बड़ी दीवार की तरह आकर खड़े हो जाते हैं। जिस दौर में भारत पर मुसलमानों के आक्रमण शुरू हुए उस दौर के बाद के इतिहास को पाकिस्तान बहुत आसानी से अपना इतिहास बता देता है, लेकिन उससे पहले का इतिहास कैसे गढ़ा जाए, यह प्रश्न एक चुनौती बनकर खड़ा होता है और चुनौती यह है कि सिंध के राजा दाहिर या उससे बहुत पहले बौद्ध धर्म से जुड़े केंद्रों या फिर नाथों-सिद्धों की तपस्थलियों को कैसे खारिज किया जाए! यहां तक कि सिखों से जुड़ी उन चीजों को भी कहां छुपा दिया जाए, पाकिस्तान के अस्तित्व के सामने इतिहास-बोध का प्रश्न हमेशा मौजूद रहता है, लेकिन इतिहास के साथ कुछ ना कुछ ऐसी समानांतर कथाएं, परिघटनाएं और सूत्र मौजूद होते हैं जो कभी पूरी तरह घेर लेते हैं और कभी-कभार बचाव का रास्ता भी दे देते हैं।


उदाहरण देखिए। साल 2022 में 14-15 मार्च को कायदे आजम यूनिवर्सिटी, इस्लामाबाद में बौद्ध धर्म और दर्शन को लेकर एक अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेंस का का आयोजन किया गया। इस कांफ्रेंस की फंडिंग यूनेस्को द्वारा की गई। इस यूनिवर्सिटी में यूनेस्को के सहयोग से एशिया की सभ्यताओं और संस्कृतियों के अध्ययन के लिए तक्षशिला इंस्टिट्यूट ऑफ एशियन सिविलाइजेशन स्थापित किया गया है। इस कांफ्रेंस के लिए जो बुकलेट तैयार की गई उसमें दर्ज कुछ रोचक बातें ध्यान खींचती हैं। पहली बात तो यह स्थापित करने का प्रयास हुआ कि पाकिस्तान दक्षिण एशिया में नहीं, बल्कि मध्य एशिया में है। (ऐसी प्रस्थानाओं में तर्क हमेशा ही बौने हो जाते हैं।) इसकी वजह यह है पाकिस्तान को दक्षिण एशिया में शामिल माने तो उसे अपनी जड़ें भारत के साथ या भारत के भीतर खोजनी पड़ती हैं। इसके उलट जब वह खुद को मध्य एशिया में साबित करता है तो फिर सहज रूप से इस्लामिक देशों के साथ जुड़ जाता है और उसे अपने वजूद की सार्थकता का अहसास होता है।
फिलहाल, सवाल यह है कि बौद्ध धर्म पर होने वाली कान्फ्रेंस का ब्यौरा भारत के बिना कैसे पूरा हो! इसका बहुत ही रोचक विवरण दिया गया है। बुकलेट में लिखा गया, ‘‘पाकिस्तान दुनियाभर के लाखों बौद्धों के लिए पवित्र भूमि है। यह भूमि महायान बौद्ध धर्म के दो महान मनीषियों आचार्य पद्मसंभव और आचार्य मारांत की जन्मभूमि है। महान आचार्य असंग और वसुबंधु भी इसी भूमि पर पैदा हुए। तिब्बत, नेपाल और भूटान में आचार्य पद्मसंभव को ‘दूसरा बुद्ध’ माना जाता है और आचार्य मारांत ने चीन, कोरिया, जापान, थाईलैंड और दुनिया के दूसरे देशों में बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार किया।’’ (भाव यह है कि बौद्ध धर्म का फैलाव पाकिस्तान में जन्मे बौद्ध आचार्याें ने किया।) इसी बुकलेट में कहा गया है कि पाकिस्तान अंतर-धार्मिक विमर्श के जरिए शांति, सद्भाव और सहिष्णुता को बढ़ावा देने के लिए इस्लाम के अलावा ईसाई धर्म, बौद्ध धर्म, हिंदू धर्म और अन्य महान धर्म की शिक्षाओं को भी स्थान देगा। इन्हीं के आधार पर पाकिस्तान बहु-सांस्कृतिक और बहु धार्मिक-एकता को बढ़ावा देगा। ये तमाम बातें इसलिए रोचक हैं क्योंकि ये पाकिस्तान की स्थापना के दर्शन से विरुद्ध खड़ी हैं। पाकिस्तान का वजूद मुसलमानों की पाक जमीं के तौर पर है तो बौद्ध धर्म या अन्य धर्म वहां किस हैसियत में खड़े होंगे या खड़े हैं, यह सोचने की बात है। ये विरोधाभास ही पाकिस्तान का सच है।

इस पूरे विवरण में भारत का जिक्र महज सांकेतिक रूप में किया गया है। भगवान बुद्ध का रिश्ता नेपाल से जोड़ते हुए सारा फोकस इस बात पर है कि किस तरह से पाकिस्तान से बौद्ध धर्म का फैलाव पूरी दुनिया में हुआ। यह बात अलग है कि तब पाकिस्तान नाम की कोई चीज थी ही नहीं। वस्तुतः पाकिस्तान इस तरह के आयोजनों के जरिए अपने आप को एक समावेशीख् सभी धर्मों का सम्मान करने वाले देश के रूप में स्थापित करना चाहता है। प्रश्न यह है कि जिस देश का गठन इस्लाम की बुनियाद पर हुआ, मजहबी उन्माद में लाखों लोग मारे गए, करोड़ों विस्थापित हुए, अब उसके सामने ऐसी क्या मजबूरी है कि उसे वैश्विक मंचों पर खुद को एक प्रगतिशील और सभी धर्मों को स्थान देने वाले देश के रूप में प्रतिष्ठित करने की कोशिश करनी पड़ रही है। यह कोशिश बताती है कि पाकिस्तान का गठन कितने अस्थिर मूल्यों पर हुआ है।
सैद्धांतिक तौर पर यह स्थापित किया गया कि पाकिस्तान मुसलमानों की पाक जमीं है। अगर यह सच है तो फिर यहां समाज के बीच किसी तरह का विवाद-वैमनस्य, दंगा-फसाद कुछ होना ही नहीं चाहिए था, लेकिन इस देश में वो सब कुछ है जो पूरी दुनिया को चिंतित करता है। पाकिस्तानी मूल के प्रोफेसर डॉ. इश्तियाक अहमद (इस विषय पर उनके अनेक व्याख्यान यूट्यूब पर उपलब्ध हैं) कहते हैं कि पाकिस्तान के गठन में ही उसका भटकाव निहित है। जब यह देश बना तो कहा गया कि रक्षा और विदेशी मामलों को छोड़कर बाकी सभी अधिकार पाकिस्तान में सम्मिलित हुए राज्यों या रियासतों के पास होंगे, लेकिन मोहम्मद अली जिन्ना के मरने तक और उसके बाद पाकिस्तान के पहले संविधान या फिर पाकिस्तान के विभाजन के बाद लागू हुए संविधान में ऐसी कोई व्यवस्था कहीं दिखाई नहीं देती। दूसरा सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि इसका गठन धर्म की बुनियाद पर हुआ, जबकि कायदे आजम का पहला भाषण इस बात पर जोर देता है कि मुल्क का अपना कोई मजहब नहीं होगा। इन विरोधाभासी चीजों ने आज तक यह तय नहीं होने दिया कि पाकिस्तान किस प्रकृति का देश है।
राष्ट्र के रूप में मुख्यतः उसकी प्रकृति एक ही है, भारत के विरोध की प्रकृति। वस्तुतः भावनाओं से जुड़ी बातें अलग चीज हैं, जबकि यथार्थ एकदम भिन्न है। भारत के लोग जब भावुक होकर सोचते हैं तो उन्हें ऐसा लगता है यदि पाकिस्तान भी मौजूदा भारत का हिस्सा होता तो शायद भारत ज्यादा तरक्की करता या दुनिया में उसका नाम और बड़ा होता है। इस सोच पर दुनिया के जाने माने मनोविश्लेषक प्रोफेसर डाॅ. सलमान अख्तर कहते हैं, ’’ये ऐसा ही है, जैसे किसी व्यक्ति के हाथ में से उसकी सबसे छोटी उंगली कट जाए, तब उस व्यक्ति को हमेशा लगता है कि जब तक की उंगली थी, तब तक वह इससे बहुत बड़े-बड़े काम करता था, अब नहीं है तो अनेक काम अधूरे छूट गए हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि उन काल्पनिक बड़े कामों का इस छोटी उंगली के रहने अथवा रहने से कोई बहुत सीधा संबंध नहीं है। बात साफ है कि भारत को इस भावुकता से बाहर आना चाहिए कि पाकिस्तान न होता तो कुछ ज्यादा बेहतर होता। संभव है, स्थितियां ज्यादा खराब होती।’’
जारी……………

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