विश्व वायु दिवस 2026: भारत की ऊर्जा क्रांति को नई गति दे रही पवन शक्ति
- India’s estimated gross wind power potential is 695.5 GW at 120 metres and 1,163.9 GW at 150 metres above ground level.
- Majority of the assessed wind potential at 150 Meter is concentrated in eight high-resource states: Rajasthan: 284.2 GW; Gujarat: 180.8 GW; Maharashtra: 173.9 GW; Karnataka: 169.3 GW; Andhra Pradesh: 123.3 GW; Tamil Nadu: 95.1 GW; Madhya Pradesh: 55.4 GW, Telangana: 54.7 GW.
- More than 900 wind-monitoring stations have been installed nationwide to map wind resources and identify high-potential sites for wind energy development.
- Wind potential maps have been developed at 50 m, 80 m, 100 m, 120 m, and 150 m hub heights.
- India’s vast wind resource base provides a strong foundation for achieving 100 GW wind capacity by 2030 and 156 GW by 2036.
-A PIB FEATURE-
15 जून को मनाया जाने वाला विश्व वायु दिवस केवल एक प्रतीकात्मक अवसर नहीं है, बल्कि यह स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक संघर्ष में पवन ऊर्जा की बढ़ती भूमिका को रेखांकित करता है। इस वर्ष भारत गोवा में “विंड एनर्जी: एम्बिशन टू एक्सेलरेशन” विषय पर विश्व वायु दिवस 2026 सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है, जो देश के पवन ऊर्जा क्षेत्र की उपलब्धियों और भविष्य की दिशा पर केंद्रित होगा।
सम्मेलन में केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA), सोलर एनर्जी कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (SECI), भारतीय अक्षय ऊर्जा विकास एजेंसी (IREDA), नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ विंड एनर्जी (NIWE), ग्रिड इंडिया, विभिन्न राज्य सरकारों तथा उद्योग जगत के वरिष्ठ प्रतिनिधि भाग लेंगे। इसमें संसाधनों की उपलब्धता, ग्रिड की तैयारी, विनिर्माण क्षमता, निर्यात संभावनाओं, पूर्वानुमान तकनीकों और नवीकरणीय ऊर्जा एकीकरण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा होगी। इस अवसर पर “Elevating India’s Wind Turbine Export for Global Markets” शीर्षक उद्योग रिपोर्ट भी जारी की जाएगी।
पवन ऊर्जा में भारत की बढ़ती ताकत
भारत आज विश्व में स्थापित पवन ऊर्जा क्षमता के आधार पर चौथे स्थान पर है। मार्च 2014 में देश की स्थापित पवन क्षमता 21.04 गीगावाट थी, जो मार्च 2026 तक बढ़कर 56.09 गीगावाट हो चुकी है। वर्तमान में लगभग 28 गीगावाट की अतिरिक्त परियोजनाएं विभिन्न चरणों में हैं।
वर्ष 2025-26 भारत के लिए एक मील का पत्थर साबित हुआ, जब देश ने एक ही वर्ष में 6.05 गीगावाट नई पवन क्षमता स्थापित कर अब तक का सर्वोच्च रिकॉर्ड बनाया। यह पिछले वर्ष के 4.15 गीगावाट के रिकॉर्ड से काफी अधिक है।
विशेषज्ञों के अनुसार पवन ऊर्जा की एक बड़ी विशेषता यह है कि इसका लगभग 45 प्रतिशत उत्पादन उन घंटों में होता है, जब बिजली की मांग सबसे अधिक रहती है। इस प्रकार यह सौर ऊर्जा का प्रभावी पूरक बनकर ग्रिड की विश्वसनीयता को मजबूत करती है।
अपार संभावनाओं का भंडार
भारत के पास दुनिया के सबसे समृद्ध पवन संसाधनों में से एक है। 150 मीटर की ऊंचाई पर देश की अनुमानित पवन ऊर्जा क्षमता 1,163.9 गीगावाट आंकी गई है। राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश और तेलंगाना इस क्षमता के प्रमुख केंद्र हैं।
देशभर में 900 से अधिक विंड मॉनिटरिंग स्टेशन स्थापित किए जा चुके हैं, जो पवन संसाधनों के वैज्ञानिक आकलन और उच्च क्षमता वाले क्षेत्रों की पहचान में सहायता कर रहे हैं। यही आधार भारत को वर्ष 2030 तक 100 गीगावाट और 2036 तक 156 गीगावाट पवन क्षमता हासिल करने का विश्वास देता है।
आत्मनिर्भर बनता पवन उद्योग
पिछले एक दशक में भारत ने पवन टरबाइन विनिर्माण क्षमता को दोगुने से अधिक बढ़ाकर लगभग 24 गीगावाट वार्षिक स्तर तक पहुंचा दिया है। उद्योग में ब्लेड, टावर, गियरबॉक्स तथा अन्य प्रमुख उपकरणों के निर्माण में 70 से 80 प्रतिशत तक स्वदेशीकरण हासिल किया जा चुका है।
मजबूत घरेलू आपूर्ति श्रृंखला न केवल ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ कर रही है, बल्कि भारत को वैश्विक निर्यात केंद्र के रूप में भी उभरने का अवसर प्रदान कर रही है।
नीतिगत समर्थन से मिल रही नई उड़ान
पवन ऊर्जा क्षेत्र को गति देने के लिए केंद्र सरकार कई महत्वपूर्ण कदम उठा रही है। गुजरात और तमिलनाडु के तटों पर 1,000 मेगावाट ऑफशोर पवन परियोजनाओं के लिए 6,853 करोड़ रुपये की वायबिलिटी गैप फंडिंग स्वीकृत की गई है।
उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (GBI) योजना के अंतर्गत 2025-26 में 500 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं। साथ ही, मूल्य स्थिरता और निवेशकों को राजस्व सुरक्षा प्रदान करने के लिए “कॉन्ट्रैक्ट्स फॉर डिफरेंस” (CfD) मॉडल के तहत 500 मेगावाट की पायलट परियोजना शुरू की गई है।
जनवरी 2026 में गठित राष्ट्रीय टास्क फोर्स भूमि, ट्रांसमिशन, नियामकीय और परियोजना क्रियान्वयन संबंधी बाधाओं को दूर करने की दिशा में कार्य कर रही है। वहीं, रिन्यूएबल परचेज ऑब्लिगेशन (RPO) में समर्पित पवन घटक तथा ग्रीन एनर्जी ओपन एक्सेस नियमों ने उद्योग की मांग और निवेश दोनों को मजबूत किया है।
नई प्राथमिकताएं: ऑफशोर विंड और स्मार्ट ग्रिड
सरकार अब मध्य प्रदेश, तेलंगाना और ओडिशा जैसे नए राज्यों में पवन ऊर्जा विस्तार पर विशेष ध्यान दे रही है। साथ ही गुजरात और तमिलनाडु के तटीय क्षेत्रों में देश के पहले बड़े ऑफशोर पवन ऊर्जा विकास की तैयारी की जा रही है।
भविष्य की रणनीति में ऊर्जा भंडारण प्रणालियों के साथ पवन ऊर्जा का एकीकरण, चौबीसों घंटे उपलब्ध नवीकरणीय ऊर्जा समाधान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित पूर्वानुमान प्रणाली तथा आधुनिक ग्रिड प्रबंधन प्रमुख तत्व होंगे।
वैश्विक सहयोग से मजबूत हो रही क्षमता
भारत पवन ऊर्जा क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को भी तेजी से विस्तार दे रहा है। यूनाइटेड किंगडम, डेनमार्क और बेल्जियम के साथ साझेदारियां ऑफशोर पवन परियोजनाओं, उन्नत तकनीक, वित्तीय नवाचार और ग्रिड एकीकरण को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
भारत-यूके ऑफशोर विंड टास्कफोर्स, भारत-बेल्जियम ऊर्जा सहयोग और डेनमार्क के साथ दीर्घकालिक तकनीकी साझेदारी इस दिशा में उल्लेखनीय पहल हैं।
आगे की राह
भारत के ऊर्जा परिवर्तन में पवन ऊर्जा की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है। विशाल ऑनशोर और ऑफशोर संसाधन, मजबूत विनिर्माण आधार, बढ़ती निवेश रुचि और सरकार का नीतिगत समर्थन इस क्षेत्र को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने की क्षमता रखते हैं।
हालांकि इसके लिए परियोजनाओं का समयबद्ध क्रियान्वयन, मजबूत ट्रांसमिशन नेटवर्क, सटीक पूर्वानुमान प्रणाली और दीर्घकालिक नीति स्थिरता आवश्यक होगी। यदि इन चुनौतियों का सफलतापूर्वक समाधान किया जाता है, तो पवन ऊर्जा न केवल भारत के जलवायु और ऊर्जा सुरक्षा लक्ष्यों को पूरा करने में सहायक बनेगी, बल्कि औद्योगिक विकास, रोजगार सृजन और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को भी नई गति प्रदान करेगी।
