राजनयिक व्यवहार में वाक् चातुर्य के साथ भाषा की समझ जरूरी है

-गोविंद प्रसाद बहुगुणा।
मुझे स्व० लाल बहादुर शास्त्री जी का वह उत्तर लाजबाब लगा जब वे पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खां से मिलकर आये थे I पत्रकारों ने शास्त्री जी और अयूब खां की कद काठी को ध्यान में रखते हुए उनसे पूछा आप अयूब खां से किस तरह मिले? उनके पूछने में व्यंग्य स्पष्ट था । शास्त्री जी पत्रकार का व्यंग्य समझ गए तो मुस्कुरा कर बोले -अरे मिलना क्या था मैं तो गर्व से अपना सिर ऊपर उठाये उनसे बात कर रहा था और वह सिर नीचा किए मुझसे बात कर रहे थे । शास्त्री जी का यह जवाब राजनयिक चातुर्य के साथ एक स्वाभाविक सत्य भी था I
एक सफल राजनयिक को भाषा और संप्रेषण की अच्छी समझ होनी चाहिए ताकि वह
दूसरे पक्ष के बयान का सही आकलन कर सके I
पहले विद्वान लोगों को इस काम के लिए चुना जाता था लेकिन अब तो किसी को भी उपकृत करने के लिए नियुक्तियां हो जाती हैं,भले ही उनमें प्रत्युत्पन्नमति का सर्वथा अभाव रहता है I एक कुशल राजनयिक अपने बयान में भारी भरकम शब्दों का प्रयोग नहीं करता बल्कि सरल शब्दों में बात को ऐसे घुमा सकता है कि सच भी न लगे और झूठ भी न लगे I जब
दो पडौसी देशों के राजदूतों का मिलन होता है तब जनता बड़ी उत्सुकता से देखती है कि क्या बातचीत हुई होगी ख़ासतौर यदि उन देशों के बीच मधुर सम्बन्ध नहीं हैं I
आमतौर पर यह देखने में आता है कि राजनयिक बैठकों में आतिथ्य शिष्टाचार में ड्रिंक्स पेश किया जाता है तो उस समय ड्रिंक लेने वाले लोग अपने गिलासों में बर्फ जरूर डालते हैं I ऐसी रस्मी मुलाक़ात के बाद जब प्रेस ने एक राजदूत से पूछा कि आप लोगों की बैठक कैसी रही ? तो उनको तपाक से जबाब मिला कि “we broke the ice” इसका अर्थ यह भी लगाया जा सकता ता है कि हमारे आपसी रिश्तों में अरसे से जमी बर्फ को हमने तोड़ने का प्रयास किया जबकि वास्तविकता यह थी कि राजदूतों ने सिर्फ बर्फ के टुकड़े तोड़कर अपने ड्रिंक्स में डाले थे।
इस तरह उनके बयान में सच भी था और झूठ भी था क्योंकि दोनों देशों के बीच संवाद हुआ ही नहीं था। इसी तरह यदि आम के मौसम में राजनयिकों की बैठक में आम का जूस सर्व किया जाता है तो वे बैठक से बाहर आते समय प्रतीक्षारत पत्रकारों को बताते हैं कि -We had a fruitful meeting (अर्थात काम की बातें कुछ नहीं हुई हमने सिर्फ फलों का नाश्ता किया )…
एक बार जब Winston Churchill ब्रिटेन के प्रधानमंत्री थे तब उन्होंने अपने राजदूत को सलाह दी कि गाली देने का भी शऊर होना चाहिए- डिप्लोमेसी वह कला है जिसमें आदमी के पास यह कह सकने का हुनर होता है कि वह विपक्षी को यह कह सके कि तुम सब जहन्नुम में जाओ , और सुनने वाला आपसे पूछे कि उसका रास्ता भी आप ही बताइए (“Diplomacy is the art of telling people to go to hell in such a way that they ask for directions.”)- GPB
