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रेल से दौड़ा इंसान का दिल, दूसरे सीने में देगा नई धड़कन

Indian Railways has achieved a historic milestone in the field of healthcare by successfully transporting a live donor heart by train for the first time in India. The life-saving organ was transported from Surat to Ahmedabad aboard Train No. 20901 Mumbai Central-Gandhinagar Capital Vande Bharat Express, ensuring its safe and timely arrival for transplantation at the U.N. Mehta Institute of Cardiology & Research Centre, Ahmedabad.

 

Edited by Usha Rawat

नई दिल्ली, 31 जुलाई ( PIB)। क्या कोई इंसान अपने शरीर से अलग हो चुके हृदय के सहारे किसी दूसरे व्यक्ति को नया जीवन दे सकता है? कुछ दशक पहले तक यह कल्पना भी असंभव लगती थी। लेकिन आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने इसे संभव बना दिया है। अब दाता के शरीर से निकाला गया हृदय विशेष वैज्ञानिक तकनीक से कई घंटे तक सुरक्षित रखा जा सकता है और सैकड़ों किलोमीटर दूर दूसरे मरीज के शरीर में प्रत्यारोपित कर उसकी धड़कनें फिर से शुरू की जा सकती हैं।

इसी चिकित्सा विज्ञान, आधुनिक तकनीक और तेज परिवहन व्यवस्था के अद्भुत संगम का साक्षी शुक्रवार को देश बना, जब भारतीय रेल ने पहली बार वंदे भारत एक्सप्रेस के माध्यम से प्रत्यारोपण के लिए दाता का हृदय (डोनर हार्ट) सूरत से अहमदाबाद तक सफलतापूर्वक पहुंचाया।

भारतीय रेल की यह उपलब्धि केवल एक परिवहन अभियान नहीं, बल्कि मानव जीवन बचाने की दिशा में चिकित्सा विज्ञान, रेलवे, पुलिस और चिकित्सकों के सामूहिक प्रयास का उत्कृष्ट उदाहरण है।

हर मिनट था कीमती

भारतीय रेल के अनुसार, प्रत्यारोपण के लिए निकाले गए हृदय को ट्रेन संख्या 20901 मुंबई सेंट्रल-गांधीनगर कैपिटल वंदे भारत एक्सप्रेस से सूरत से अहमदाबाद लाया गया। वहां से अहमदाबाद रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर-1 से यू.एन. मेहता इंस्टीट्यूट ऑफ कार्डियोलॉजी एंड रिसर्च सेंटर तक रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) और गुजरात पुलिस ने विशेष ग्रीन कॉरिडोर बनाया।

इस व्यवस्था के कारण हृदय बिना किसी रुकावट के तय समय के भीतर अस्पताल पहुंच गया और प्रत्यारोपण की प्रक्रिया शुरू की जा सकी।

क्या सचमुच ‘जीवित हृदय’ पहुंचाया गया?

भारतीय रेल की विज्ञप्ति में इसे पहली बार “जीवित हृदय (Live Heart) के सफल परिवहन” की उपलब्धि बताया गया है। चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से इसका आशय यह नहीं है कि किसी जीवित व्यक्ति का धड़कता हुआ हृदय शरीर से बाहर सामान्य रूप से जीवित था। इसका अर्थ यह है कि दाता के शरीर से निकाले गए हृदय को विशेष प्रिजर्वेशन तकनीक के माध्यम से प्रत्यारोपण योग्य (Viable) अवस्था में सुरक्षित रखा गया था।

रेलवे द्वारा जारी तस्वीरों में भी स्पष्ट दिखाई देता है कि हृदय को एक विशेष मेडिकल ऑर्गन ट्रांसपोर्ट कंटेनर में रखा गया था। यानी ट्रेन से केवल दाता का हृदय पहुंचाया गया, दाता या कोई मरीज नहीं।

कैसे सुरक्षित रखा जाता है हृदय?

हृदय प्रत्यारोपण चिकित्सा विज्ञान की सबसे जटिल प्रक्रियाओं में शामिल है। दाता से हृदय निकालने के तुरंत बाद उसे विशेष प्रिजर्वेशन सॉल्यूशन में रखा जाता है। इसके बाद उसे नियंत्रित तापमान वाले मेडिकल कंटेनर में सुरक्षित किया जाता है, ताकि उसकी कोशिकाएं सक्रिय बनी रहें।

विशेषज्ञों के अनुसार, दाता के शरीर से हृदय निकालने के बाद सामान्यतः चार से छह घंटे के भीतर उसका प्रत्यारोपण कर देना सबसे उपयुक्त माना जाता है। इसी कारण इस पूरे अभियान में समय सबसे बड़ा चुनौतीपूर्ण पहलू था।

रेल, पुलिस और डॉक्टरों का शानदार तालमेल

इस जीवनरक्षक अभियान को सफल बनाने में भारतीय रेल, रेलवे सुरक्षा बल, गुजरात पुलिस और चिकित्सा टीमों ने मिलकर काम किया। ट्रेन के समय से लेकर स्टेशन पर रिसीव करने, ग्रीन कॉरिडोर बनाने और अस्पताल तक पहुंचाने की पूरी प्रक्रिया पहले से तय थी।

अहमदाबाद मंडल के मंडल रेल प्रबंधक वेद प्रकाश ने कहा कि भारतीय रेल के लिए यह गर्व और संतोष का क्षण है। उन्होंने कहा कि ऐसे मिशनों में हर सेकंड महत्वपूर्ण होता है और विभिन्न एजेंसियों के उत्कृष्ट समन्वय ने इस अभियान को सफल बनाया। किसी व्यक्ति का जीवन बचाने में योगदान देना भारतीय रेल के लिए सेवा और मानवता का सर्वोच्च दायित्व है।

क्या होता है ग्रीन कॉरिडोर?

ग्रीन कॉरिडोर ऐसी विशेष यातायात व्यवस्था होती है, जिसमें अंग ले जा रहे वाहन के लिए पूरा मार्ग खाली रखा जाता है। ट्रैफिक सिग्नलों का संचालन भी उसी के अनुरूप किया जाता है, ताकि एंबुलेंस बिना रुके अस्पताल पहुंच सके। भारत में पिछले कुछ वर्षों में कई सफल अंग प्रत्यारोपण इसी व्यवस्था के कारण संभव हो सके हैं।

वंदे भारत की नई पहचान

अब तक वंदे भारत एक्सप्रेस अपनी गति, आराम और समयपालन के लिए जानी जाती रही है। लेकिन इस मिशन ने यह साबित कर दिया कि आधुनिक रेल नेटवर्क केवल यात्रियों के लिए ही नहीं, बल्कि आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।जब हवाई परिवहन हर समय उपलब्ध न हो या रेल मार्ग अधिक व्यावहारिक विकल्प हो, तब ऐसी तेज और समयनिष्ठ ट्रेनें अंग प्रत्यारोपण जैसे जीवनरक्षक अभियानों में प्रभावी माध्यम बन सकती हैं।

चिकित्सा विज्ञान का चमत्कार

एक समय था जब शरीर से बाहर निकले हृदय का कुछ ही मिनटों तक जीवित रहना संभव माना जाता था। आज विज्ञान ने यह स्थिति बदल दी है। आधुनिक संरक्षण तकनीक, प्रशिक्षित सर्जनों की दक्षता, अंगदान की व्यवस्था और तेज परिवहन नेटवर्क ने मिलकर यह संभव कर दिया है कि एक व्यक्ति का हृदय दूसरे व्यक्ति के शरीर में नई धड़कनों के साथ जीवन का संचार कर सके।

भारतीय रेल का यह अभियान इसी वैज्ञानिक प्रगति का जीवंत उदाहरण है। यह केवल सूरत से अहमदाबाद तक हृदय पहुंचाने की कहानी नहीं, बल्कि यह संदेश भी है कि जब विज्ञान, तकनीक, प्रशासन और मानवीय संवेदनाएं एक साथ काम करती हैं, तब किसी अनजान व्यक्ति की धड़कन किसी दूसरे इंसान के लिए नई जिंदगी बन जाती है।

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