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कांवड़ यात्रा : अंतर्मन की कठोर परीक्षा


—अभिषेक भारद्वाज—
सावन का महीना आते ही पूरा देश शिवमय हो जाता है। मंदिरों में हर-हर महादेव के जयकारे गूंजने लगते हैं। शिवालयों में जलाभिषेक के लिए श्रद्धालुओं की कतारें लग जाती हैं। गंगा तटों से लेकर गांव-कस्बों और शहरों तक कांवड़ियों की टोलियां दिखाई देने लगती हैं। कंधे पर कांवड़, उसमें पवित्र गंगाजल और मन में भगवान शिव के प्रति अटूट श्रद्धा लेकर लाखों श्रद्धालु अनगिनत किलोमीटर की पैदल यात्रा करते हैं। यह यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के लिए आस्था, संकल्प, तपस्या और समर्पण का प्रतीक है।
लेकिन इसी पवित्र परंपरा के बीच आज ऐसे सवाल भी खड़े हो रहे हैं, जिनसे आंखें चुराना उचित नहीं होगा। सवाल कांवड़ यात्रा के अस्तित्व या श्रद्धालुओं की आस्था पर नहीं, बल्कि उसके बदलते स्वरूप पर हैं। सवाल यह है कि जिस कांवड़ यात्रा की मूल भावना संयम, साधना, सेवा और शिवभक्ति थी, क्या वह धीरे-धीरे शोर, शक्ति प्रदर्शन और दिखावे की प्रतिस्पर्धा में बदलती जा रही है?
भगवान शिव की पूजा में सावन मास का विशेष महत्व माना जाता है। मान्यता है कि इस महीने भगवान शिव का जलाभिषेक करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। इसी धार्मिक भावना के साथ श्रद्धालु पवित्र नदियों से जल लेकर अपने आराध्य के शिवलिंग पर अर्पित करते हैं।
कांवड़ यात्रा की शुरुआत को लेकर अलग-अलग धार्मिक ग्रंथों, लोकपरंपराओं और मान्यताओं में कई कथाएं प्रचलित हैं। एक मान्यता भगवान परशुराम से जुड़ी है, जिसके अनुसार उन्होंने गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लाकर बागपत के पुरा महादेव मंदिर में भगवान शिव का जलाभिषेक किया था। कुछ कथाओं में पितृभक्त श्रवण कुमार को पहला कांवड़िया माना गया है, जिन्होंने अपने माता-पिता को कांवड़ में बैठाकर तीर्थ यात्रा कराई थी। एक अन्य धार्मिक कथा लंकापति रावण से जुड़ी है। कहा जाता है कि भगवान शिव के परम भक्त रावण ने गंगाजल लाकर उनका अभिषेक किया था।
समुद्र मंथन और नीलकंठ की कथा भी भगवान शिव के जलाभिषेक की परंपरा से जोड़ी जाती है। मान्यता है कि हलाहल विष को कंठ में धारण करने के बाद भगवान शिव के शरीर में उत्पन्न उष्णता को शांत करने के लिए उनका जलाभिषेक किया गया। इन कथाओं के ऐतिहासिक प्रमाणों पर अलग-अलग मत हो सकते हैं, लेकिन इतना निश्चित है कि भगवान शिव की आराधना में जलाभिषेक और गंगाजल का धार्मिक महत्व बेहद गहरा है।
कांवड़ यात्रा की यही आस्था इसे दूसरी यात्राओं से अलग बनाती है। एक श्रद्धालु अपने आराध्य के लिए घर से निकलता है, पवित्र जल लेने के लिए नदी तक पहुंचता है, फिर उसे कंधे पर उठाकर लंबी दूरी तय करता है और अंत में भगवान शिव को अर्पित करता है। इस पूरी प्रक्रिया में शरीर से ज्यादा मन की परीक्षा होती है। रास्ते की थकान, गर्मी, बारिश और भूख जैसी परेशानियों के बीच श्रद्धालु अपनी यात्रा पूरी करता है। यही तपस्या कांवड़ यात्रा की वास्तविक पहचान होनी चाहिए।
लेकिन बदलते दौर में इस यात्रा का एक दूसरा चेहरा भी तेजी से सामने आया है। इसमें बड़े-बड़े डीजे, भारी साउंड सिस्टम, सजावटी वाहन, तेज आवाज में संगीत, सड़कों पर शक्ति प्रदर्शन और सोशल मीडिया पर खुद को सबसे अलग दिखाने की होड़ दिखाई देती है।
सवाल यह है—क्या भगवान शिव की भक्ति के लिए इतना शोर जरूरी है?
भगवान शिव को महादेव कहा जाता है। वे योग और ध्यान के प्रतीक हैं। भोलेनाथ की कल्पना एक ऐसे तपस्वी के रूप में की जाती है, जो कैलाश पर समाधि में लीन हैं। ऐसे में यह सोचने की जरूरत है कि क्या उनकी भक्ति का सबसे प्रभावी माध्यम कानफोड़ू डीजे और अत्यधिक शोर हो सकता है? क्या अपनी आस्था को साबित करने के लिए पूरे शहर को अपनी आवाज सुनाना जरूरी है? क्या ‘हर-हर महादेव’ का जयघोष तभी प्रभावी होगा, जब उसके पीछे सैकड़ों किलोवाट का साउंड सिस्टम लगा हो?
शायद नहीं। भक्ति की शक्ति आवाज की ऊंचाई में नहीं, भावना की गहराई में होती है।
कांवड़ यात्रा में शामिल करोड़ों श्रद्धालुओं को कठघरे में खड़ा करना बिल्कुल उचित नहीं होगा। बड़ी संख्या में कांवड़िए बेहद अनुशासन और श्रद्धा के साथ यात्रा करते हैं। वे नियमों का पालन करते हैं, नशे से दूर रहते हैं, सात्विक जीवन जीते हैं और कई दिनों तक कठिन परिस्थितियों में पैदल चलते हैं। ऐसे श्रद्धालु वास्तव में इस परंपरा की गरिमा को आगे बढ़ाते हैं।
समस्या वहां शुरू होती है, जहां धार्मिक यात्रा के नाम पर अनुशासन पीछे छूट जाता है और हो-हल्ला भक्ति का हिस्सा बन जाता है। सड़क पर खतरनाक तरीके से वाहन चलाना, तेज रफ्तार, स्टंट करना, दूसरों से विवाद करना, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना या कानून को चुनौती देने वाला व्यवहार किसी भी रूप में धार्मिक आस्था की अभिव्यक्ति नहीं हो सकता। शंभू के नाम पर कानून तोड़ना महादेव की भक्ति नहीं है।
कांवड़ यात्रा का एक बड़ा सामाजिक पक्ष यातायात से भी जुड़ा है। श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए प्रशासन को कई प्रमुख मार्गों पर यातायात डायवर्जन लागू करना पड़ता है। हाईवे और प्रमुख सड़कें कई दिनों तक आम यातायात के लिए प्रतिबंधित या परिवर्तित रहती हैं। प्रशासन की मजबूरी समझ में आती है। लाखों लोगों की सुरक्षा के लिए व्यापक इंतजाम करना जरूरी है, लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है।
किसी अस्पताल जाने वाला मरीज, परीक्षा देने वाला छात्र, नौकरी पर जाने वाला कर्मचारी, रोज कमाकर खाने वाला मजदूर या जरूरी काम से निकला आम नागरिक भी इसी व्यवस्था का हिस्सा है। अगर वह कई घंटे ट्रैफिक में फंसा रहता है तो उसकी परेशानी को भी समझना होगा। आस्था का सम्मान जरूरी है, लेकिन नागरिकों के अधिकार और उनकी सुविधाएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।
यहीं से एक और सवाल निकलता है—क्या श्रद्धालु होने का मतलब सड़क पर दूसरे लोगों के अधिकार खत्म हो जाना है?
निश्चित रूप से नहीं।
धार्मिक यात्रा का सम्मान इसलिए किया जाता है, क्योंकि उसमें आस्था होती है। लेकिन आस्था कभी भी अराजकता का लाइसेंस नहीं हो सकती। अगर कोई एंबुलेंस रास्ते में फंस जाए, किसी मरीज को अस्पताल पहुंचने में देरी हो जाए, किसी छात्र की परीक्षा छूटने का खतरा पैदा हो जाए या किसी परिवार को घंटों अनावश्यक परेशानी झेलनी पड़े, तो हमें यह सोचने की जरूरत है कि क्या हमारी धार्मिक व्यवस्था में संवेदनशीलता के लिए पर्याप्त जगह बची है।
भगवान शिव की पूजा करने वाला समाज अगर किसी दूसरे इंसान की परेशानी को समझने लगे, उसके लिए रास्ता छोड़ दे और जरूरत पड़ने पर अपनी सुविधा से समझौता कर ले, तो शायद यही वास्तविक शिवभक्ति होगी।
दूसरी ओर, आमजन को भी सड़कों पर आस्था के इस विशाल रैले को देखते हुए टकराव की स्थिति से बचना चाहिए। संयम बरतना चाहिए। यदि जरूरत हो तो मार्ग बदल लेने से किसी की प्रतिष्ठा कम नहीं हो जाएगी। गंतव्य तक पहुंचने में दो-चार मिनट का विलंब हो जाए तो भी कोई बड़ी बात नहीं। आखिर एक पुरानी सीख है—दुर्घटना से देर भली।
सोशल मीडिया ने भी कांवड़ यात्रा के बदलते स्वरूप को काफी प्रभावित किया है। पहले यात्रा का उद्देश्य गंगाजल लाना और भगवान शिव का जलाभिषेक करना था। आज यात्रा का एक हिस्सा कैमरे के सामने भी दिखाई देता है। बड़ी कांवड़, अनोखी सजावट, विशाल डीजे, बाइक रैली, नाचते हुए कांवड़िए और रास्ते के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होते हैं।
सोशल मीडिया अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन जब धार्मिक यात्रा का केंद्र भगवान से ज्यादा कैमरा बन जाए, जब श्रद्धा से ज्यादा यह चिंता होने लगे कि वीडियो कितना वायरल होगा, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। आखिर महादेव को हमारे वीडियो की जरूरत है या हमारी भक्ति की?
कांवड़ यात्रा के आकार के साथ-साथ खर्च और प्रदर्शन भी बढ़ रहा है। कभी कांवड़ की ऊंचाई चर्चा का विषय होती है, कभी डीजे की ताकत, कभी वाहनों की संख्या और कभी सजावट। यह देखकर सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या भक्ति भी उसी अनुपात में बढ़ रही है? क्या कांवड़ जितनी बड़ी हो रही है, मन में शिव के लिए श्रद्धा भी उतनी ही बड़ी हो रही है? क्या डीजे की आवाज बढ़ने के साथ भीतर का संयम भी बढ़ रहा है?
क्योंकि धार्मिक यात्रा का वास्तविक उद्देश्य बाहरी प्रदर्शन नहीं, बल्कि भीतर का परिवर्तन होना चाहिए।
अगर कांवड़ यात्रा से लौटने के बाद व्यक्ति अधिक विनम्र, अधिक संयमी, अधिक संवेदनशील और अधिक जिम्मेदार बनता है, तो उसकी यात्रा वास्तव में सफल है। लेकिन अगर कांवड़ यात्रा के बाद भी व्यक्ति वही क्रोध, वही अहंकार, वही असंवेदनशीलता और वही गैर-जिम्मेदार व्यवहार लेकर लौटता है, तो उसे अपने भीतर यह सवाल जरूर पूछना चाहिए कि उसने वास्तव में कांवड़ में क्या उठाया था—गंगाजल या सिर्फ एक धार्मिक प्रतीक?
कांवड़ यात्रा को लेकर प्रशासन की जिम्मेदारी भी बेहद महत्वपूर्ण है। सुरक्षा, चिकित्सा सुविधा, पेयजल, सफाई, यातायात प्रबंधन और आपातकालीन सेवाओं की व्यवस्था करना जरूरी है। इसके साथ ही नियमों का पालन सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है। धार्मिक आयोजन बड़ा हो तो व्यवस्था भी बड़ी होनी चाहिए, लेकिन नियम छोटे नहीं होने चाहिए।
ध्वनि प्रदूषण हो, यातायात नियम हों या सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा—धार्मिक आयोजन होने का मतलब कानून से ऊपर होना नहीं हो सकता। वास्तव में जितना बड़ा धार्मिक आयोजन हो, उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी आयोजकों और श्रद्धालुओं की भी होनी चाहिए।
यह भी जरूरी है कि कांवड़ यात्रा को केवल आलोचना की नजर से न देखा जाए। यह यात्रा करोड़ों लोगों की आस्था का हिस्सा है और इसके पीछे एक विशाल सामाजिक एवं धार्मिक भावना काम करती है। जगह-जगह लोग कांवड़ियों के लिए भोजन, पानी, चिकित्सा और विश्राम की व्यवस्था करते हैं। अनेक सामाजिक संगठन और स्थानीय लोग बिना किसी स्वार्थ के रात-दिन सेवा करते हैं। यह सेवा भावना कांवड़ यात्रा की सबसे खूबसूरत तस्वीरों में से एक है।
इसलिए जरूरत यात्रा को खत्म करने या उसकी धार्मिक भावना पर सवाल उठाने की नहीं, बल्कि उसके बदलते स्वरूप में जो अनावश्यक चीजें जुड़ गई हैं, उन्हें पहचानने की है।
कांवड़ के कंधे पर सिर्फ गंगाजल नहीं होता, बल्कि एक धार्मिक जिम्मेदारी भी होती है। अगर रास्ते में कोई बुजुर्ग परेशान है और कांवड़िया उसके लिए रास्ता छोड़ देता है, तो यह भी शिवभक्ति है। अगर कोई एंबुलेंस पीछे खड़ी है और श्रद्धालु उसे तुरंत रास्ता देता है, तो यह भी ‘हर-हर महादेव’ है। अगर सड़क पर कूड़ा नहीं फेंका जाता, पेड़-पौधों और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान नहीं पहुंचाया जाता, ध्वनि की मर्यादा रखी जाती है और दूसरे नागरिकों की दिक्कतों का ध्यान रखा जाता है, तो यह भी भगवान शिव की पूजा का ही एक रूप है।
शायद हमें यह समझने की जरूरत है कि भगवान शिव को दिखावे की जरूरत नहीं है। वे भस्म रमाते हैं, कैलाश में रहते हैं, ध्यान करते हैं और विष पीकर संसार की रक्षा करने वाले नीलकंठ कहलाते हैं। उनकी भक्ति का सबसे बड़ा संदेश ही त्याग, संयम और धैर्य है। ऐसे में अगर उनकी पूजा के नाम पर हम शोर, अहंकार और अव्यवस्था पैदा करने को धार्मिक अधिकार समझने लगें, तो कहीं न कहीं हम उसी परंपरा की आत्मा से दूर हो रहे हैं, जिसे बचाने के नाम पर यह सब किया जा रहा है।
कांवड़ यात्रा होनी चाहिए, खूब होनी चाहिए। श्रद्धालु गंगाजल लेकर आएं, भगवान शिव का जलाभिषेक करें और अपनी आस्था को पूरी श्रद्धा के साथ व्यक्त करें। लेकिन इस यात्रा की पहचान डीजे की आवाज नहीं, ‘बोल बम’ की भावना होनी चाहिए। कांवड़ की पहचान उसकी ऊंचाई नहीं, उसे उठाने वाले भक्त की निष्ठा होनी चाहिए। यात्रा की पहचान सड़कों पर शक्ति प्रदर्शन नहीं, सेवा और संयम होना चाहिए।
और सबसे जरूरी बात—भक्ति की पहचान यह नहीं होनी चाहिए कि हमने कितने लोगों को अपनी मौजूदगी का एहसास कराया, बल्कि यह होनी चाहिए कि हमारी भक्ति ने कितने लोगों को बिना परेशान किए, बिना नुकसान पहुंचाए और बिना किसी अहंकार के भगवान शिव के करीब पहुंचाया।
कांवड़ उठाना कठिन है, लेकिन उससे भी कठोर है अपने अहंकार को नीचे रखना। गंगाजल उठाना श्रद्धा है, लेकिन किसी दूसरे के अधिकार का सम्मान करना भी श्रद्धा है। ‘हर-हर महादेव’ बोलना भक्ति है, लेकिन किसी मरीज के लिए रास्ता छोड़ देना भी भक्ति है। शिवालय तक पहुंचना धार्मिक यात्रा है, लेकिन रास्ते में इंसानियत को साथ लेकर चलना शायद उस यात्रा की सबसे बड़ी जरूरत है।
इसलिए सवाल कांवड़ यात्रा से नहीं है। सवाल हमसे हैं। क्या हम इस प्राचीन परंपरा को उसकी गरिमा के साथ आगे ले जाना चाहते हैं या इसे शोर और दिखावे की प्रतियोगिता बना देना चाहते हैं? क्या हमें भगवान शिव को प्रसन्न करना है या दुनिया को अपनी भक्ति दिखानी है? क्या हमें तपस्या करनी है या सिर्फ तस्वीरें खिंचवानी हैं?
जवाब हर श्रद्धालु को अपने भीतर तलाशना होगा। यह आत्ममंथन का विषय है, क्योंकि महादेव को हमारी आवाज की ऊंचाई नहीं, हमारे मन की सच्चाई चाहिए।
और शायद कांवड़ का असली वजन कंधे पर नहीं, उस जिम्मेदारी में होता है जिसे लेकर एक भक्त अपने आराध्य के दरबार तक पहुंचता है।

(लेखक युवा अधिवक्ता हैं। बहुआयामी प्रतिभा के धनी अभिषेक भारद्वाज को इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया की भी गहरी समझ है।)

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