कितना बड़ा जोखिम ! करोड़ों वाहनों के पास नहीं होता वैध वीमा
-उषा रावत।
सड़क दुर्घटना में घायल या मृत व्यक्ति के परिवार के लिए वाहन बीमा महज कागजी औपचारिकता नहीं, बल्कि संकट की घड़ी में आर्थिक सुरक्षा का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। इसके बावजूद भारत में मोटर वाहनों का बीमा कराने की कानूनी बाध्यता और वास्तविक अनुपालन के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है। यही विरोधाभास अब सर्वोच्च न्यायालय के सामने भी गंभीर चिंता का विषय बन चुका है।
सर्वोच्च न्यायालय ने अगस्त 2026 में नए वाहनों के लिए अनिवार्य तृतीय-पक्ष बीमा की अवधि बढ़ाकर कारों के लिए चार वर्ष और दोपहिया वाहनों के लिए छह वर्ष कर दी है। 2018 में भी न्यायालय ने इसी समस्या से निपटने के लिए नई कारों पर तीन वर्ष और नए दोपहिया वाहनों पर पांच वर्ष का तृतीय-पक्ष बीमा अनिवार्य किया था। यानी आठ वर्ष में अनिवार्य प्रारंभिक बीमा की अवधि बढ़ाने की जरूरत फिर महसूस हुई।
सवाल यह है कि जब कानून पहले से स्पष्ट है, बीमा अनिवार्य है और वाहन पंजीकरण से लेकर प्रदूषण प्रमाणपत्र तक की जानकारी सरकार के डिजिटल तंत्र में उपलब्ध है, तब इतने बड़े पैमाने पर वाहन बिना बीमा के सड़कों पर कैसे चल रहे हैं?
2025 में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष रखे गए सरकारी आंकड़ों के अनुसार 30.48 करोड़ पंजीकृत वाहनों में लगभग 16.54 करोड़ के पास वैध बीमा नहीं था। यानी पंजीकृत वाहनों के आधे से अधिक। हालिया न्यायिक कार्यवाही में भी करीब 56 प्रतिशत वाहनों के बीमाविहीन होने की चिंता सामने आई। अगस्त 2026 में सरकार से जुड़े आंकड़ों में 24.6 करोड़ सक्रिय वाहनों में लगभग 60 प्रतिशत के किसी न किसी वैधानिक अनुपालन में कमी होने की बात सामने आई है। हालांकि इस 60 प्रतिशत में केवल बीमा ही नहीं, बल्कि पीयूसी और फिटनेस जैसे अन्य दस्तावेजों की कमी भी शामिल है। इसलिए इसे सीधे ‘60 प्रतिशत वाहन बिना बीमा’ कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
समस्या की गंभीरता को सड़क दुर्घटनाओं के आंकड़ों से समझा जा सकता है। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार देश में 4,80,583 सड़क दुर्घटनाएं हुईं और इनमें 1,72,890 लोगों की मौत हुई, जबकि 4,62,825 लोग घायल हुए। 2024 में दुर्घटनाओं की संख्या बढ़कर 4,87,707 और मौतों की संख्या 1,77,175 हो गई। इसका अर्थ है कि हर दिन औसतन करीब 1,336 दुर्घटनाएं और 485 मौतें हुईं। ऐसे परिदृश्य में यदि दुर्घटना में शामिल वाहन बीमित न हो तो पीड़ित परिवार के सामने मुआवजे की वसूली का संकट और गहरा जाता है।
यहां तृतीय-पक्ष बीमा की भूमिका समझना जरूरी है। यह वाहन मालिक के अपने वाहन की मरम्मत का बीमा नहीं है। इसका मूल उद्देश्य उस व्यक्ति को आर्थिक सुरक्षा देना है जिसे किसी वाहन से हुई दुर्घटना में चोट, मृत्यु या संपत्ति का नुकसान हुआ हो। भारतीय बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण के अनुसार सार्वजनिक सड़कों पर चलने वाले प्रत्येक मोटर वाहन के लिए तृतीय-पक्ष देयता बीमा अनिवार्य है। मृत्यु और चोट के मामले में तृतीय-पक्ष देयता का कवरेज असीमित है, जबकि संपत्ति क्षति के लिए निर्धारित सीमा लागू होती है।
फिर भी केवल बीमा की अवधि बढ़ा देना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। 2018 का अनुभव यही बताता है। उस समय सर्वोच्च न्यायालय ने तीन और पांच वर्ष का प्रारंभिक बीमा अनिवार्य किया था। इससे नए वाहनों के शुरुआती वर्षों में बीमा समाप्त होने की संभावना कम हुई, लेकिन पुराने वाहनों के नवीनीकरण की समस्या बनी रही। जैसे ही प्रारंभिक अनिवार्य अवधि समाप्त होती है, वाहन मालिक के सामने फिर वही सवाल आता है—क्या वह बीमा नवीनीकृत कराएगा और क्या सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि वह ऐसा करे?
यही वह बिंदु है जहां ‘बीमा बेचने’ और ‘बीमा अनुपालन सुनिश्चित करने’ के बीच अंतर सामने आता है। नया वाहन खरीदते समय चार या छह वर्ष का बीमा खरीदना अपेक्षाकृत आसान है क्योंकि उसका भुगतान वाहन की कुल कीमत और ऋण प्रक्रिया के साथ जुड़ जाता है। असली परीक्षा उसके बाद शुरू होती है। पांचवें या सातवें वर्ष में वाहन मालिक को स्वयं बीमा नवीनीकृत करना होता है। यहीं बड़ी संख्या में वाहन बीमा तंत्र से बाहर निकल जाते हैं।
इसलिए सर्वोच्च न्यायालय का हालिया रुख केवल बीमा अवधि बढ़ाने तक सीमित नहीं है। न्यायालय ने प्रौद्योगिकी आधारित निगरानी, स्वचालित चालान और बीमा की वैधता को वाहन पहचान प्रणाली से जोड़ने जैसे उपायों पर भी जोर दिया है। यहां तक कि वैध तृतीय-पक्ष बीमा के बिना पेट्रोल पंप पर ईंधन न देने की संभावित व्यवस्था का एक पायलट तैयार करने को भी कहा गया है। यह प्रस्ताव अभी देशव्यापी नियम नहीं है, बल्कि अनुपालन बढ़ाने के लिए परीक्षण की दिशा में उठाया गया कदम है।
दरअसल सरकार के पास इसके लिए जरूरी आधारभूत ढांचा काफी हद तक मौजूद है। वाहन का पंजीकरण, बीमा, प्रदूषण प्रमाणपत्र, लंबित चालान जैसी जानकारियां वाहन पोर्टल पर उपलब्ध हैं। यदि बीमा सूचना को वाहन के पंजीकरण नंबर से वास्तविक समय में जोड़ा जाए और सड़क पर लगे कैमरे नंबर प्लेट की पहचान करके बीमा की स्थिति जांच सकें तो बिना बीमा वाहन पकड़ना कठिन काम नहीं रह जाता। चुनौती तकनीक की उपलब्धता से अधिक विभिन्न सरकारी और बीमा डेटाबेस के एकीकरण तथा लगातार प्रवर्तन की है।
कानून भी कमजोर नहीं है। मोटर वाहन अधिनियम की धारा 146 के तहत तृतीय-पक्ष बीमा अनिवार्य है और बिना वैध बीमा वाहन चलाना दंडनीय अपराध है। धारा 196 के तहत पहली बार उल्लंघन पर तीन महीने तक की सजा या 2,000 रुपये का जुर्माना अथवा दोनों हो सकते हैं। बाद के उल्लंघन पर जुर्माना 4,000 रुपये तक हो सकता है। इसके बावजूद यदि करोड़ों वाहन बीमा के बिना चल रहे हैं तो समस्या कानून की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन की है।
इस पूरी बहस का एक दूसरा पहलू भी है। लंबी अवधि का बीमा वाहन खरीदार पर शुरुआती आर्थिक बोझ बढ़ाता है। एक साथ चार या छह वर्ष का प्रीमियम देना उस व्यक्ति के लिए महंगा हो सकता है जो वाहन खरीदने के लिए पहले ही ऋण ले रहा हो। दूसरी ओर, लंबी अवधि के प्रीमियम से बीमा कंपनियों को पहले ही बड़ी राशि प्राप्त हो जाती है। इसलिए ऐसी व्यवस्था बनाते समय उपभोक्ता के हित, बीमा कंपनियों के जोखिम और दुर्घटना पीड़ितों की सुरक्षा—तीनों के बीच संतुलन जरूरी है।
बेहतर रास्ता शायद यह है कि सरकार केवल नई कार या बाइक बेचते समय बीमा सुनिश्चित करने पर निर्भर न रहे, बल्कि वाहन के पूरे जीवनचक्र को बीमा अनुपालन से जोड़े। फिटनेस, प्रदूषण प्रमाणपत्र, पंजीकरण नवीनीकरण, परमिट, टोल और चालान की तरह बीमा की स्थिति भी नियमित डिजिटल जांच का हिस्सा बने। बीमा समाप्त होने से पहले वाहन मालिक को कई स्तरों पर सूचना मिले और अवधि समाप्त होने के बाद स्वचालित रूप से प्रवर्तन शुरू हो।
साथ ही बीमा कंपनियों के लिए भी दायित्व तय होना चाहिए कि पॉलिसी की शर्तें सामान्य उपभोक्ता को आसानी से समझ आएं। व्यापक बीमा, तृतीय-पक्ष बीमा, व्यक्तिगत दुर्घटना कवर और वाहन के अपने नुकसान के कवर को लेकर आम वाहन मालिकों में आज भी काफी भ्रम है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी मोटर बीमा उत्पादों को अधिक स्पष्ट और एकरूप बनाने की जरूरत पर जोर दिया है।
भारत में मोटर बीमा का संकट वास्तव में बीमा कंपनियों का संकट नहीं, सड़क सुरक्षा और सामाजिक न्याय का संकट है। एक दुर्घटना में कमाने वाले व्यक्ति की मौत होने पर परिवार की आर्थिक स्थिति वर्षों के लिए बदल सकती है। यदि दुर्घटना करने वाला वाहन बीमित है तो मुआवजे की व्यवस्था के पीछे एक संस्थागत वित्तीय सुरक्षा मौजूद रहती है। यदि वाहन बीमित नहीं है तो पीड़ित परिवार को उसी व्यक्ति से मुआवजा वसूलने की कठिन लड़ाई लड़नी पड़ सकती है जिसके पास स्वयं भुगतान करने की क्षमता नहीं है।
इसलिए चार साल और छह साल का अनिवार्य बीमा एक उपयोगी कदम हो सकता है, लेकिन इसे अंतिम समाधान मानना भूल होगी। 2018 में तीन और पांच वर्ष की व्यवस्था के बाद भी समस्या समाप्त नहीं हुई। अब अगली परीक्षा यह है कि सरकार बीमा की अवधि बढ़ाने से आगे बढ़कर हर वाहन को सड़क पर बने रहने की अवधि तक बीमित कैसे रखती है। कानून को कागज से सड़क तक पहुंचाने की वास्तविक कसौटी यही होगी।
