तीन आम दवाएं, जिनका बुजुर्ग जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं
हर बुजुर्ग को इन दवाओं की जरूरत नहीं, उम्र बढ़ने के साथ बढ़ सकते हैं इनके जोखिम
-लेखक पॉला स्पैन-
चिकित्सा जगत में अक्सर एक दिलचस्प लेकिन चिंताजनक सिलसिला देखने को मिलता है। शोधकर्ता किसी ऐसी दवा का अध्ययन करते हैं, जिसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहा होता है, और पाते हैं कि बुजुर्ग मरीजों के लिए वह पहले जितनी प्रभावी नहीं है या बढ़ती उम्र में उसके जोखिम उसके संभावित लाभों से अधिक हो सकते हैं। इसके बाद दूसरे अध्ययन सामने आते हैं और इन निष्कर्षों की पुष्टि करते हैं।
कुछ वर्षों बाद चिकित्सा संगठन अपने दिशानिर्देशों में बदलाव करते हैं। वे डॉक्टरों को सलाह देते हैं कि बुजुर्ग मरीजों को संबंधित दवा देने से बचा जाए या कम से कम बहुत सोच-समझकर उसका इस्तेमाल किया जाए। ऐसी दवा को अमेरिकन जेरिएट्रिक्स सोसाइटी की बीअर्स क्राइटेरिया (Beers Criteria) सूची में भी शामिल किया जा सकता है। यह बुजुर्ग मरीजों के लिए संभावित रूप से अनुपयुक्त या जोखिम वाली दवाओं की महत्वपूर्ण सूची मानी जाती है।
यदि किसी दवा का इस्तेमाल बीमारी की रोकथाम के लिए किया जा रहा हो, तो स्वतंत्र विशेषज्ञों का पैनल यूएस प्रिवेंटिव सर्विसेज टास्क फोर्स भी उसके इस्तेमाल को लेकर सावधानियां जारी कर सकता है। इसी तरह गंभीर दुष्प्रभावों की आशंका होने पर अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) दवाओं पर गंभीर चेतावनियां जारी कर सकता है।
इसके कुछ साल बाद शोधकर्ता राष्ट्रीय स्तर के आंकड़ों का विश्लेषण कर यह जानने की कोशिश करते हैं कि नई जानकारियों और बदले हुए दिशानिर्देशों के बाद उस दवा का इस्तेमाल वास्तव में कम हुआ या नहीं। अक्सर जवाब होता है—हां, लेकिन उतना नहीं जितना अपेक्षित था। कुछ मामलों में इस्तेमाल में बहुत मामूली कमी आती है और कभी-कभी तो इसका उपयोग बढ़ता हुआ भी दिखाई देता है।
कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, सैन फ्रांसिस्को के जेरिएट्रिशियन और यूएस डिप्रेस्क्राइबिंग रिसर्च नेटवर्क के सह-निदेशक डॉ. माइकल स्टीनमैन इस स्थिति को दिलचस्प उपमा देते हैं। उनके अनुसार, “दवाएं बार्नेकल जैसी होती हैं। उन्हें शुरू करना आसान होता है, लेकिन बंद करना मुश्किल।”
इस चिकित्सकीय जड़ता की एक वजह नए शोध निष्कर्षों और दिशानिर्देशों को चिकित्सकों तक पहुंचने में लगने वाला समय भी है। डॉ. स्टीनमैन कहते हैं, “डॉक्टरों को लाखों बातें जाननी और ध्यान में रखनी होती हैं। नई जानकारी उन तक पहुंचने में समय लग सकता है।”
लेकिन मामला सिर्फ जानकारी पहुंचने में देरी का नहीं है। उनके मुताबिक, डॉक्टर और मरीज कुछ बीमारियों तथा स्थितियों का एक खास तरीके से इलाज करने के अभ्यस्त हो जाते हैं और धीरे-धीरे ये आदतें गहरी होती चली जाती हैं। किसी पुराने उपचार का विकल्प तलाशना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। ऐसे में जिस उपचार को डॉक्टर और मरीज पहले से जानते हैं, उसी को जारी रखना आसान लग सकता है।
बुजुर्ग अमेरिकियों में व्यापक रूप से इस्तेमाल होने वाली तीन दवाओं अथवा दवा वर्गों पर हुए हाल के अध्ययन इसी समस्या की ओर ध्यान दिलाते हैं।
बेंजोडायजेपाइन्स : राहत के साथ बढ़ते जोखिम
वैज्ञानिकों ने बेंजोडायजेपाइन्स के इस्तेमाल को लेकर 20 साल से भी पहले चेतावनी देना शुरू कर दिया था। नींद न आने और चिंता जैसी समस्याओं के लिए लिखी जाने वाली ये दवाएं मरीजों को तेजी से राहत दे सकती हैं।
कोलंबिया विश्वविद्यालय के मनोचिकित्सक और महामारी विज्ञानी डॉ. मार्क ओल्फसन के मुताबिक, ये दवाएं “तुरंत राहत देती हैं।” यही कारण है कि मरीजों और चिकित्सकों के लिए इनका इस्तेमाल आकर्षक बना रहता है।
लेकिन समस्या इनके संभावित दुष्प्रभावों की है। बेंजोडायजेपाइन्स में वैलियम, जैनेक्स और एटिवन जैसी दवाएं शामिल हैं। इनके अलावा इनसे संबंधित नींद की तथाकथित “जेड” दवाओं में एम्बियन और लूनेस्टा शामिल हैं।
डॉ. ओल्फसन के अनुसार, ये दवाएं व्यक्ति के संतुलन, शारीरिक समन्वय और संज्ञानात्मक क्षमता को प्रभावित कर सकती हैं। नतीजतन गिरने, हड्डियां टूटने और सड़क दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है। यदि कोई मरीज दर्द कम करने के लिए ओपिओइड दवाएं भी ले रहा हो तो इनके साथ बेंजोडायजेपाइन्स का इस्तेमाल ओवरडोज का जोखिम भी बढ़ा सकता है।
एक और बड़ी समस्या इन दवाओं पर निर्भरता विकसित होने की है। डॉ. ओल्फसन कहते हैं, “एक बार आप इन्हें कुछ समय तक लेते रहते हैं तो निर्भरता पैदा हो जाती है। जब इन्हें छोड़ते हैं तो विथड्रॉल के लक्षण हो सकते हैं।”
बढ़ती उम्र में शरीर इन दवाओं के प्रभावों के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकता है। ऐसे में सवाल उठता है कि तमाम चेतावनियों और दिशानिर्देशों के बावजूद बुजुर्गों में बेंजोडायजेपाइन्स का इस्तेमाल कितना कम हुआ है?
Annals of Internal Medicine में प्रकाशित दवाएं लिखे जाने के रुझानों के हालिया अध्ययन में डॉ. ओल्फसन और उनकी टीम ने इस मामले में कुछ प्रगति दर्ज की। अध्ययन के मुताबिक, 65 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में 2015 से 2024 के बीच बेंजोडायजेपाइन्स का कुल इस्तेमाल 14 प्रतिशत से घटकर 11.5 प्रतिशत रह गया।
यह गिरावट महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन तस्वीर पूरी तरह संतोषजनक नहीं है। वर्ष 2020 के बाद इनके इस्तेमाल में कमी का सिलसिला लगभग रुक गया। शोधकर्ताओं का मानना है कि इसके पीछे कोविड महामारी से जुड़ी परिस्थितियां भी एक कारण हो सकती हैं।
और भी चिंताजनक तथ्य 75 वर्ष से अधिक आयु के लोगों से संबंधित है। इस आयु वर्ग में बेंजोडायजेपाइन्स का इस्तेमाल घटने के बजाय बढ़ा। वर्ष 2020 में करीब 12 प्रतिशत लोग इनका इस्तेमाल कर रहे थे, जबकि चार साल बाद यह आंकड़ा लगभग 13 प्रतिशत तक पहुंच गया।
लंबे समय तक देखभाल करने वाली सुविधाओं में फार्मेसियों के जरिए इन दवाओं का वितरण दोगुने से भी अधिक हो गया। इतना ही नहीं, लगभग एक-तिहाई उपयोगकर्ता छह महीने से अधिक समय तक इन दवाओं का सेवन कर रहे थे। लंबे समय तक इस्तेमाल से निर्भरता की आशंका बढ़ सकती है।
डॉ. ओल्फसन ने इस स्थिति को “चिंताजनक” बताया।
हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि लंबे समय से बेंजोडायजेपाइन्स लेने वाला कोई मरीज इन्हें अचानक बंद कर दे। विशेषज्ञ खास तौर पर चेतावनी देते हैं कि इन दवाओं को अपने आप और अचानक बंद करना नुकसानदेह हो सकता है, क्योंकि इससे विथड्रॉल के लक्षण पैदा हो सकते हैं।
डॉ. ओल्फसन के मुताबिक, इन्हें बंद करने के लिए चिकित्सकीय निगरानी में धीरे-धीरे खुराक कम करना जरूरी होता है और इस प्रक्रिया में कई सप्ताह लग सकते हैं।
एंटीबायोटिक्स : जब जरूरत न हो, तब भी इस्तेमाल
कई वर्षों तक डायवर्टीकुलाइटिस का मानक उपचार एंटीबायोटिक्स माना जाता रहा। डायवर्टीकुलाइटिस बड़ी आंत यानी कोलन की दीवार में बनने वाली छोटी थैलियों में सूजन की स्थिति है। इसके इलाज के लिए मुख्य रूप से फ्लोरोक्विनोलोन श्रेणी की दवाएं, जैसे सिप्रो और लेवाक्विन, अथवा एमोक्सिसिलिन-क्लैवुलनेट यानी ऑगमेंटिन का इस्तेमाल किया जाता रहा।
वीए मिनियापोलिस हेल्थ केयर के फार्मासिस्ट और शोधकर्ता जेसी सटन के मुताबिक, लंबे समय तक इस उपचार पद्धति पर शायद ही सवाल उठाए गए।
वे कहते हैं, “एंटीबायोटिक्स सुरक्षित और प्रभावी, शानदार तथा जीवनरक्षक दवाएं हैं। इसलिए सोच यह थी कि अगर संदेह हो तो उनका इस्तेमाल कर लिया जाए।”
लेकिन समय के साथ शोध ने इस धारणा को चुनौती दी। वर्ष 2015 में American Gastroenterological Association ने “अनकॉम्प्लिकेटेड” डायवर्टीकुलाइटिस के मामलों में नियमित रूप से एंटीबायोटिक्स लिखने के खिलाफ सिफारिश की। डायवर्टीकुलाइटिस के अधिकांश मामले इसी श्रेणी में आते हैं। बाद में अन्य चिकित्सा संगठनों ने भी इसी दिशा में अपने दिशानिर्देश बदले।
क्लिनिकल परीक्षणों में पाया गया कि ऐसे मरीजों में एंटीबायोटिक्स देने से मृत्यु दर, सर्जरी की जरूरत, जटिलताओं अथवा बीमारी दोबारा होने की आशंका पर बहुत कम या कोई उल्लेखनीय प्रभाव नहीं पड़ा।
डॉ. सटन के शब्दों में, “उन्होंने कुछ भी बेहतर नहीं किया।”
इसके बावजूद एंटीबायोटिक्स नुकसान से पूरी तरह मुक्त नहीं हैं। किसी दूसरी दवा की तरह इनके भी दुष्प्रभाव और अनचाहे परिणाम हो सकते हैं।
डॉ. सटन बताते हैं कि एंटीबायोटिक्स के दुष्प्रभावों के कारण बड़ी संख्या में मरीजों को आपातकालीन चिकित्सा की जरूरत पड़ती है। इनमें मतली, उल्टी और दस्त जैसी समस्याएं शामिल हैं। एंटीबायोटिक्स के इस्तेमाल से खतरनाक सी. डिफिसाइल संक्रमण का जोखिम भी बढ़ सकता है।
इसके साथ एक व्यापक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या भी जुड़ी है—एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध। जितना अधिक और अनावश्यक रूप से एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल किया जाएगा, भविष्य में उनके प्रभावहीन होने की आशंका उतनी ही बढ़ सकती है।
डॉ. सटन कहते हैं, “आप जितना ज्यादा एंटीबायोटिक्स इस्तेमाल करेंगे, भविष्य में वे उतनी ही कम प्रभावी हो सकती हैं।”
विश्व स्वास्थ्य संगठन एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध को दुनिया के सामने मौजूद प्रमुख स्वास्थ्य खतरों में शामिल कर चुका है।
इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए डॉ. सटन और उनके सहयोगियों ने 120 वेटरन्स अफेयर्स चिकित्सा सुविधाओं में करीब 70,000 मरीज विजिट्स के उपचार का अध्ययन किया। शोधकर्ताओं को उम्मीद थी कि बदले हुए चिकित्सा दिशानिर्देशों के बाद पिछले एक दशक में अनकॉम्प्लिकेटेड डायवर्टीकुलाइटिस के लिए एंटीबायोटिक्स के इस्तेमाल में उल्लेखनीय कमी आई होगी।
लेकिन परिणाम उनकी अपेक्षाओं के विपरीत निकले।
उन्होंने हाल ही में Annals of Internal Medicine में बताया कि दिशानिर्देश बदलने के बावजूद करीब 97 प्रतिशत विजिट्स में एंटीबायोटिक्स लिखे जाते रहे। यानी उनका इस्तेमाल लगभग सार्वभौमिक बना रहा।
इन मरीजों की औसत आयु 63 वर्ष थी। शोध के मुताबिक, इनमें से अनेक मरीजों को कुछ दिनों तक टाइलेनॉल और साफ तरल आहार जैसी सामान्य देखभाल से भी उतना ही लाभ मिल सकता था।
बढ़ती उम्र में सामने आने वाली दूसरी स्थितियों में भी एंटीबायोटिक्स के जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल की समस्या देखी जाती है। इनमें बिना परेशानी वाले लक्षणों की स्थितियों में मूत्र मार्ग संक्रमण से जुड़ी परिस्थितियां और ऊपरी श्वसन तंत्र के ऐसे संक्रमण शामिल हैं, जिनमें से अधिकांश बैक्टीरिया के बजाय वायरस के कारण होते हैं।
डॉ. सटन का सुझाव है कि यदि ऐसी स्थिति में डॉक्टर एंटीबायोटिक लिखते हैं तो मरीज यह पूछ सकते हैं कि दवा की आवश्यकता क्यों है। उनके अनुसार मरीज को अपने चिकित्सक से एंटीबायोटिक दिए जाने का कारण समझने में संकोच नहीं करना चाहिए।
एस्पिरिन : हर किसी के लिए बचाव का उपाय नहीं
एस्पिरिन का मामला दूसरी दवाओं से कुछ अलग है। यह सस्ती है और बिना चिकित्सकीय पर्चे के आसानी से उपलब्ध हो जाती है। इसलिए कोई भी व्यक्ति खुद से इसे लेना शुरू कर सकता है। लाखों बुजुर्ग अमेरिकी ऐसा करते भी रहे हैं, क्योंकि लंबे समय से यह धारणा रही है कि रोजाना कम खुराक वाली एस्पिरिन लेने से हार्ट अटैक और स्ट्रोक जैसी हृदय संबंधी समस्याओं को रोकने में मदद मिल सकती है।
लेकिन यहां यह समझना महत्वपूर्ण है कि हृदय रोग की सेकंडरी प्रिवेंशन और प्राइमरी प्रिवेंशन दो अलग स्थितियां हैं।
जिन लोगों को पहले हार्ट अटैक या स्ट्रोक हो चुका है अथवा स्टेंट लगाने या बाईपास सर्जरी जैसी हृदय संबंधी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा है, उनके लिए सेकंडरी प्रिवेंशन के तौर पर रोजाना कम खुराक वाली एस्पिरिन दूसरी हृदय संबंधी घटना का जोखिम कम कर सकती है। विभिन्न अध्ययनों ने इसका लाभ दिखाया है।
लेकिन उन लोगों की स्थिति अलग है, जिन्हें पहले कभी ऐसी हृदय संबंधी घटना नहीं हुई है और जो भविष्य में हार्ट अटैक या स्ट्रोक रोकने के उद्देश्य से एस्पिरिन लेते हैं। इसे प्राइमरी प्रिवेंशन कहा जाता है।
वर्ष 2019 में इस संबंध में दिशानिर्देश बदल गए। American College of Cardiology और American Heart Association ने 70 वर्ष या उससे अधिक आयु के लोगों में प्राइमरी प्रिवेंशन के उद्देश्य से नियमित एस्पिरिन इस्तेमाल की सिफारिश नहीं की।
बाद में U.S. Preventive Services Task Force ने और आगे बढ़ते हुए 60 वर्ष की आयु से प्राइमरी प्रिवेंशन के लिए एस्पिरिन शुरू करने के खिलाफ चेतावनी दी।
इन बदलावों के पीछे बड़े क्लिनिकल परीक्षणों से मिले प्रमाण थे। अध्ययनों में पाया गया कि प्राइमरी प्रिवेंशन के रूप में एस्पिरिन से मिलने वाला लाभ बहुत सीमित हो सकता है, जबकि इससे नुकसान का जोखिम मौजूद रहता है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण खतरा जठरांत्र संबंधी रक्तस्राव है।
पिट्सबर्ग विश्वविद्यालय के इंटर्निस्ट और वहां के Prescribing Wisely Lab के निदेशक डॉ. टिमोथी एंडरसन बताते हैं, “जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, रक्तस्राव का खतरा भी बढ़ता जाता है।”
दुर्लभ लेकिन अधिक गंभीर मामलों में एस्पिरिन मस्तिष्क में रक्तस्राव का कारण भी बन सकती है।
पिछले वर्ष JAMA में प्रकाशित एक अध्ययन में डॉ. एंडरसन और उनके सह-लेखकों ने पाया कि चिकित्सा जगत की चेतावनियों का संदेश कुछ हद तक लोगों तक पहुंच रहा है। National Health and Nutrition Examination Survey के आंकड़ों के अनुसार, प्राइमरी प्रिवेंशन के लिए एस्पिरिन का इस्तेमाल 2011 से 2023 के बीच काफी कम हुआ।
फिर भी एक महत्वपूर्ण सवाल बाकी है। अध्ययन में पाया गया कि 70 वर्ष या उससे अधिक आयु के लोगों में एक-तिहाई से ज्यादा लोग अब भी प्राइमरी प्रिवेंशन के उद्देश्य से एस्पिरिन ले रहे थे।
हालांकि एस्पिरिन को लेकर तस्वीर पूरी तरह सीधी नहीं है। हृदय रोग के अत्यधिक जोखिम वाले कारकों वाले बुजुर्गों के एक सीमित समूह को प्राइमरी प्रिवेंशन के लिए एस्पिरिन से लाभ हो सकता है। इसके अलावा कुछ प्रमाण यह भी संकेत देते हैं कि जो बुजुर्ग मरीज पहले से लंबे समय से एस्पिरिन ले रहे हैं, उनमें अचानक इसे बंद करने से हृदय रोग संबंधी जोखिम बढ़ सकता है।
इसलिए विशेषज्ञ एस्पिरिन को अपने आप शुरू या बंद करने के बजाय डॉक्टर से चर्चा करने की सलाह देते हैं।
डॉ. एंडरसन कहते हैं, “पहला कदम अपने प्राथमिक देखभाल चिकित्सक से एस्पिरिन के बारे में बात करना है। उनसे पूछें—क्या बढ़ती उम्र के साथ यह दवा अब भी मेरे लिए सही है?”
एस्पिरिन लेने वाले बहुत से बुजुर्ग मरीज वास्तव में अपने स्वास्थ्य को लेकर सजग होते हैं। कई लोग बिना किसी चिकित्सकीय मार्गदर्शन के इसे इसलिए लेते हैं, क्योंकि वे हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा कम करना चाहते हैं।
डॉ. एंडरसन के मुताबिक, “वे सक्रिय और स्वस्थ रहने की कोशिश कर रहे हैं।”
लेकिन हृदय रोग की रोकथाम के लिए चिकित्सा के पास अब दूसरे प्रभावी उपाय भी उपलब्ध हैं। रक्तचाप को नियंत्रित करने वाली दवाओं और कोलेस्ट्रॉल कम करने के लिए इस्तेमाल होने वाली स्टैटिन जैसी दवाओं के साथ हृदय संबंधी जोखिम घटाने की रणनीतियां पहले से बेहतर हुई हैं।
डॉ. एंडरसन कहते हैं कि इस उद्देश्य के लिए “हमारे पास एस्पिरिन से बेहतर रणनीतियां हैं।”
इन तीनों उदाहरणों का संदेश यह नहीं है कि बेंजोडायजेपाइन्स, एंटीबायोटिक्स या एस्पिरिन खराब दवाएं हैं। उचित मरीज, उचित परिस्थिति और उचित अवधि में इनका इस्तेमाल महत्वपूर्ण और कभी-कभी जीवनरक्षक भी हो सकता है। असली सवाल यह है कि उम्र बढ़ने और चिकित्सा प्रमाण बदलने के साथ क्या वर्षों पहले शुरू की गई किसी दवा की जरूरत आज भी उतनी ही है।
यही कारण है कि बुजुर्ग मरीजों की दवाओं की समय-समय पर चिकित्सकीय समीक्षा महत्वपूर्ण मानी जाती है। खासकर लंबे समय से ली जा रही दवाओं को खुद से शुरू, बंद या उनकी खुराक में बदलाव करने के बजाय डॉक्टर से उनके मौजूदा लाभ और जोखिम पर चर्चा करना अधिक सुरक्षित रास्ता है।

