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रामलीला मैदान से विपक्ष की हुंकार : ‘वोट चोरी’ के आरोपों पर सरकार और निर्वाचन आयोग को घेरा

 

इंडिया गठबंधन की विशाल रैली में राहुल गांधी, खरगे, ममता, अखिलेश और तेजस्वी सहित विपक्ष के दिग्गज एक मंच पर; मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने और मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण में कथित अनियमितताओं की जांच की मांग

नई दिल्ली, 1 नवंबर। देश की राजधानी का ऐतिहासिक रामलीला मैदान रविवार को विपक्षी दलों के शक्ति प्रदर्शन और चुनावी व्यवस्था को लेकर उठाए जा रहे सवालों का प्रमुख केंद्र बन गया। विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ के आह्वान पर आयोजित ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ रैली में हजारों लोगों की भागीदारी के बीच कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल, वामपंथी दलों तथा अन्य विपक्षी संगठनों के शीर्ष नेताओं ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार और निर्वाचन आयोग पर तीखे हमले किए। विपक्ष ने आरोप लगाया कि मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया का इस्तेमाल वास्तविक मतदाताओं को उनके मताधिकार से वंचित करने के लिए किया जा रहा है। गठबंधन ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करते हुए चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता को अपना प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बनाया।

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी, कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव, राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव, तृणमूल कांग्रेस के अभिषेक बनर्जी, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव एम.ए. बेबी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव डी. राजा, भाकपा माले के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य, नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती सहित अनेक नेता इस प्रदर्शन में शामिल हुए।

रैली से पहले विपक्षी नेता कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के आवास पर एकत्र हुए। इसके बाद वे खुले वाहनों में मिंटो रोड और कनॉट प्लेस के समीप से रामलीला मैदान की ओर रवाना हुए। उनके साथ विभिन्न दलों के कार्यकर्ता और समर्थक पैदल चल रहे थे। जुलूस में विपक्षी दलों के झंडों, तख्तियों और नारों के माध्यम से मतदाता अधिकारों की रक्षा तथा निर्वाचन आयोग की जवाबदेही की मांग की गई।

राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और मुख्य निर्वाचन आयुक्त को घेरा

रैली को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि देश की चुनावी व्यवस्था में ऐसी अनियमितताएं हो रही हैं, जिनसे जनता के जनादेश की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।

राहुल गांधी ने वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव की वैधता पर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि निर्वाचन आयोग की भूमिका निष्पक्ष नहीं रही है और चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए सरकारी तंत्र का इस्तेमाल किया गया। हालांकि, उनके ये आरोप राजनीतिक दावे हैं और इन्हें किसी न्यायिक निर्णय से प्रमाणित तथ्य के रूप में नहीं देखा जा सकता।

राहुल गांधी ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर विशेष रूप से कठोर भाषा का इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा कि भविष्य में ज्ञानेश कुमार को अपने कथित कृत्यों के लिए कानूनी जवाबदेही का सामना करना पड़ेगा। उन्होंने यहां तक दावा किया कि उन्हें पद से हटाया जाएगा और देशद्रोह के आरोप में जेल जाना पड़ेगा। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के विरुद्ध भी कानूनी कार्रवाई की बात कही।

उन्होंने कहा कि यह संघर्ष केवल किसी राजनीतिक दल की सत्ता प्राप्ति का नहीं, बल्कि संविधान, लोकतंत्र और नागरिकों के मताधिकार की रक्षा का है। उनके अनुसार, किसानों, मजदूरों, युवाओं और आम नागरिकों की आवाज को दबाया नहीं जा सकता। उन्होंने विपक्ष के आंदोलन को देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता से जोड़ा।

खरगे बोले—ज्ञानेश कुमार के हटने तक जारी रहेगा संघर्ष

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने रैली को ऐतिहासिक बताते हुए आरोप लगाया कि केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली से महिलाओं, युवाओं, दलितों तथा समाज के कमजोर वर्गों के मतदान अधिकार प्रभावित हो रहे हैं।

उन्होंने कहा कि जब तक मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार अपने पद से नहीं हटते, तब तक विपक्ष का संघर्ष जारी रहेगा। खरगे ने आरोप लगाया कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता पर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं और निर्वाचन आयोग को अपनी निष्पक्षता तथा विश्वसनीयता सुनिश्चित करनी चाहिए।

खरगे ने विपक्षी दलों की एकजुटता पर जोर देते हुए कहा कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर साझा संघर्ष आवश्यक है। उन्होंने केंद्र सरकार की नीतियों की आलोचना करते हुए इसे जनता के संवैधानिक अधिकारों की लड़ाई बताया।

ममता बनर्जी ने चुनावी प्रक्रिया पर उठाए सवाल

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण तथा चुनावी प्रक्रिया को लेकर केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी पर गंभीर आरोप लगाए।

उन्होंने पश्चिम बंगाल के चुनावों का उल्लेख करते हुए दावा किया कि चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित किया गया। ममता बनर्जी ने कहा कि विभिन्न राजनीतिक दलों, समुदायों और सामाजिक वर्गों को लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के मुद्दे पर एकजुट होना चाहिए।

ममता बनर्जी की भागीदारी राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रही, क्योंकि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और वामपंथी दलों के साथ तृणमूल कांग्रेस के लंबे समय से राजनीतिक मतभेद रहे हैं। इसके बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर चुनावी व्यवस्था के प्रश्न पर इन दलों के नेताओं ने साझा मंच से अपनी बात रखी।

अखिलेश यादव ने रामलीला मैदान को बताया लोकतंत्र की हल्दीघाटी

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपने संबोधन में रामलीला मैदान को लोकतंत्र की ‘हल्दीघाटी’ बताया। उन्होंने कहा कि मताधिकार की रक्षा के लिए विपक्षी दलों को एकजुट होकर संघर्ष करना होगा।

अखिलेश यादव ने मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण पर सवाल उठाते हुए कहा कि लोकतंत्र में प्रत्येक पात्र नागरिक को मतदान का अधिकार मिलना चाहिए। उन्होंने आशंका व्यक्त की कि मतदाता सूचियों से नाम हटाए जाने की प्रक्रिया का असर गरीबों और वंचित वर्गों पर पड़ सकता है।

उनका कहना था कि चुनावी व्यवस्था के प्रति जनता का विश्वास बनाए रखना निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी है। किसी भी पात्र मतदाता का नाम अनुचित तरीके से मतदाता सूची से नहीं हटाया जाना चाहिए।

तेजस्वी यादव ने चुनावी संघर्ष को बताया धर्मयुद्ध

राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव ने महाभारत का उल्लेख करते हुए मताधिकार की रक्षा के संघर्ष की तुलना धर्मयुद्ध से की। उन्होंने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका की आलोचना करते हुए उन्हें महाभारत के शकुनि से जोड़ा।

तेजस्वी यादव ने आरोप लगाया कि मतदाता सूचियों में कथित गड़बड़ियों का असर समाज के कमजोर वर्गों पर पड़ सकता है। उन्होंने विपक्षी दलों से चुनावी प्रक्रिया की निगरानी करने और पात्र मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए संगठित प्रयास करने का आह्वान किया।

वामपंथी दलों ने उठाया संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता का मुद्दा

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव एम.ए. बेबी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव डी. राजा और भाकपा माले के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने भी चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता तथा संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता का मुद्दा उठाया।

वामपंथी नेताओं ने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की बुनियादी शर्त हैं। उन्होंने मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण की प्रक्रिया में पारदर्शिता, जवाबदेही और पात्र मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा पर जोर दिया।

नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने के दावों का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया कि आखिर इतने अधिक लोगों को मतदाता सूची से बाहर किए जाने का औचित्य क्या है। उन्होंने निर्वाचन आयोग से इस संबंध में जवाबदेही की मांग की।

पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने भी विपक्ष के साझा आंदोलन का समर्थन करते हुए लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा पर बल दिया।

मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण बना विवाद का केंद्र

रैली का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा निर्वाचन आयोग द्वारा संचालित मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण रहा। विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया में बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं, जिससे गरीब, प्रवासी, अल्पसंख्यक और अन्य वंचित समुदायों के मताधिकार प्रभावित हो सकते हैं।

विपक्षी दलों ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने के अतिरिक्त विशेष गहन पुनरीक्षण की विवादित प्रक्रिया को निरस्त करने और मतपत्रों के माध्यम से मतदान की व्यवस्था बहाल करने की मांग भी उठाई है।

दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग और सरकार का पक्ष है कि मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण का उद्देश्य मृत, स्थानांतरित, दोहराए गए और अन्य अपात्र नामों को हटाकर मतदाता सूची को शुद्ध एवं अद्यतन बनाना है। इस प्रकार विवाद का मूल प्रश्न यह है कि मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने की प्रक्रिया में किसी पात्र नागरिक का मतदान अधिकार प्रभावित न हो।

भाजपा ने भी निकाला विरोध मार्च

विपक्षी गठबंधन की रैली के समानांतर भारतीय जनता पार्टी ने भी दिल्ली में विरोध प्रदर्शन किया। भाजपा ने वर्ष 1984 के सिख विरोधी दंगों का मुद्दा उठाते हुए विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस, पर निशाना साधा।

भाजपा नेताओं ने विपक्ष की रैली की आलोचना करते हुए इसे राजनीतिक प्रदर्शन बताया। सत्तापक्ष का कहना था कि मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण को लेकर विपक्ष अनावश्यक विवाद पैदा कर रहा है।

इस प्रकार रविवार को दिल्ली में एक ओर विपक्षी गठबंधन ने निर्वाचन आयोग और केंद्र सरकार के विरुद्ध प्रदर्शन किया, वहीं दूसरी ओर भाजपा ने कांग्रेस के विरुद्ध अपना राजनीतिक अभियान चलाया।

दिल्ली में सुरक्षा के व्यापक प्रबंध

विपक्ष की रैली और दोनों पक्षों के राजनीतिक कार्यक्रमों को देखते हुए राजधानी में सुरक्षा के व्यापक प्रबंध किए गए थे। दिल्ली पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती के साथ प्रमुख मार्गों पर यातायात संबंधी व्यवस्थाएं बदली गईं।

रामलीला मैदान और आसपास के क्षेत्रों में बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी एकत्र हुए। देश के विभिन्न हिस्सों से आए विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं के साथ छात्र संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और नागरिक समूहों की भी भागीदारी रही।

रैली में अधिवक्ता प्रशांत भूषण, सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव और अभिनेता प्रकाश राज सहित विभिन्न क्षेत्रों के लोगों की उपस्थिति भी दर्ज की गई।

आगामी विधानसभा चुनावों से पहले विपक्ष की साझा रणनीति

रामलीला मैदान की यह रैली ऐसे समय आयोजित हुई है, जब वर्ष 2027 में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब सहित कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। इन चुनावों से पहले मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण, निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता और कथित चुनावी अनियमितताओं के आरोप राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श के प्रमुख मुद्दे बन रहे हैं।

रैली में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल और वामपंथी दलों के नेताओं की एक साथ उपस्थिति ने चुनावी व्यवस्था के मुद्दे पर विपक्ष की साझा राजनीतिक स्थिति को सामने रखा। हालांकि, इन दलों के बीच विभिन्न राज्यों में चुनावी गठबंधन और सीटों के बंटवारे को लेकर अलग-अलग परिस्थितियां बनी हुई हैं।

रामलीला मैदान की रैली ने यह भी स्पष्ट किया कि विपक्ष आगामी राजनीतिक अभियानों में मतदाता सूची, चुनावी पारदर्शिता और संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता के प्रश्नों को प्रमुखता देना चाहता है।

इस आंदोलन का आगे क्या स्वरूप होगा और निर्वाचन आयोग के विरुद्ध उठाई गई मांगों पर सरकार तथा संवैधानिक संस्थाओं की क्या प्रतिक्रिया सामने आती है, यह आने वाले दिनों में महत्वपूर्ण होगा। फिलहाल एक नवंबर की रैली ने मताधिकार और चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर चल रही राजनीतिक बहस को राष्ट्रीय स्तर पर फिर प्रमुखता से सामने ला दिया है।

 

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