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मनख्यों की जिन्दा मूर्ति त्वैं किलै नि फछांणि

— गोविंद प्रसाद बहुगुणा-
उत्तराखण्ड के प्रसिद्ध लोककवि एवं सर्वोदय समाजसेवी स्वर्गीय घनश्याम रतूड़ी ‘सैलानी’ का यह गीत मुझे अचानक याद आ गया, जब मैं अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त अश्वेत अमेरिकी उपन्यासकार Octavia E. Butler के बारे में पढ़ रहा था।
ऑक्टाविया का जन्म एक अत्यंत गरीब परिवार में हुआ था। उनकी माँ लोगों के घरों में चौका-बर्तन और भोजन बनाने का काम करती थीं, जबकि उनके पिता जूते पॉलिश कर मजदूरी करके परिवार का पालन-पोषण करते थे। विपरीत परिस्थितियों में पली-बढ़ी ऑक्टाविया ने ईश्वर की अवधारणा को अत्यंत गहन और व्यापक दृष्टि से देखा।
वे लिखती हैं—
“ईश्वर की कोई मूर्ति बनाने की आवश्यकता नहीं है। उसकी बनाई हुई मूर्तियों को ही स्वीकार कर लीजिए। वे हर जगह हैं, हर वस्तु में हैं। ईश्वर परिवर्तन है— बीज से वृक्ष, वृक्ष से वन; वर्षा से नदी, नदी से सागर; कीट से मधुमक्खी, मधुमक्खी से पूरा झुंड। एक से अनेक और अनेक से एक। निरंतर जुड़ता हुआ, बढ़ता हुआ, विलीन होता हुआ— सदैव परिवर्तनशील। यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड ईश्वर का स्वयं का चित्र है।”
“Create no images of God. Accept the images that God has provided. They are everywhere, in everything. God is Change— Seed to tree, tree to forest; Rain to river, river to sea; Grubs to bees, bees to swarm. From one, many; from many, one; Forever uniting, growing, dissolving— forever Changing. The universe is God’s self-portrait.”
— Octavia E. Butler

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