बदरीनाथ में श्रद्धालुओं का नया रिकॉर्ड, उच्च हिमालय पर बढ़ते दबाव की भी चुनौती
22 सितंबर तक पहुंचे 17.79 लाख श्रद्धालु, यात्रा जारी रहने से संख्या और बढ़ने की संभावना
देहरादून, 23 सितम्बर। बदरीनाथ धाम में इस वर्ष श्रद्धालुओं की संख्या पिछले वर्षों के रिकॉर्ड के करीब पहुंच गई है। पर्यटन विभाग के अनुसार 23 अप्रैल को शुरू हुई यात्रा में 22 सितंबर तक 153 दिनों में 17 लाख 79 हजार 805 श्रद्धालु भगवान बदरीविशाल के दर्शन कर चुके हैं। वर्ष 2023 में पूरे यात्रा काल में 17,80,429 श्रद्धालु पहुंचे थे, इसलिए उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2026 की संख्या अभी उससे 624 कम है। यात्रा के कई सप्ताह शेष होने के कारण इस वर्ष अंतिम संख्या पिछले सभी वर्षों से अधिक होने की संभावना है।
पर्यटन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक उत्तराखंड के गठन के वर्ष 2000 में बदरीनाथ पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की संख्या 6,95,332 थी। वर्ष 2007 में यह बढ़कर 7,68,107 हुई और 2008 तथा 2010 में संख्या 10 लाख से अधिक रही। वर्ष 2014 में यात्रियों की संख्या घटकर 1,59,575 रह गई। इसके बाद 2018 में 10,48,051 और 2019 में 12,44,993 श्रद्धालु पहुंचे। कोरोना काल में 2020 में 1,55,055 और 2021 में 1,99,409 यात्री ही बदरीनाथ पहुंच सके।
कोरोना के बाद चारधाम यात्रा में तेजी से वृद्धि हुई। वर्ष 2022 में बदरीनाथ में 17,63,578, वर्ष 2023 में 17,80,429, वर्ष 2024 में 17,74,264 और 2025 में 17,78,298 श्रद्धालु पहुंचे। मंगलवार को भी 6,685 श्रद्धालुओं ने दर्शन किए। मानसून के बाद मौसम में सुधार के साथ यात्रा के दूसरे चरण में श्रद्धालुओं की संख्या फिर बढ़ रही है।
रिकॉर्ड के साथ वहन क्षमता का सवाल भी
श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या जहां चारधाम यात्रा की लोकप्रियता और स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है, वहीं उच्च हिमालय की संवेदनशील पारिस्थितिकी के लिहाज से यह एक बड़ी प्रबंधन चुनौती भी है। बदरीनाथ जैसे उच्च हिमालयी क्षेत्र में सीमित भूमि, जलस्रोत, सड़क, पार्किंग, ठहरने की क्षमता और कचरा निस्तारण व्यवस्था पर एक साथ बड़ी आबादी पहुंचने से दबाव बढ़ता है।
जी.बी. पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान ने हिमालयी पर्यटन के संदर्भ में वहन क्षमता को महत्वपूर्ण माना है। संस्थान से जुड़े अध्ययनों में अत्यधिक पर्यटन से पर्यावरणीय क्षरण, कचरा प्रबंधन की समस्या, पानी की कमी, यातायात पर दबाव, वन्यजीवों पर प्रभाव तथा भूस्खलन और आपदा जोखिम जैसी चुनौतियों की ओर ध्यान दिलाया गया है। संवेदनशील हिमालयी स्थलों पर पर्यटकों और तीर्थयात्रियों की संख्या को क्षेत्र की क्षमता के अनुरूप नियंत्रित करने तथा पर्याप्त कचरा प्रबंधन की आवश्यकता भी रेखांकित की गई है।
ऐसे में चारधाम यात्रा की सफलता को केवल हर वर्ष बढ़ती श्रद्धालु संख्या से आंकने के बजाय सुरक्षित और टिकाऊ यात्रा व्यवस्था से जोड़ना भी जरूरी है। प्रतिदिन किसी धाम और उसके यात्रा मार्ग पर कितने यात्रियों को पर्यावरण, स्थानीय संसाधनों और सुरक्षा व्यवस्था पर अस्वीकार्य दबाव डाले बिना संभाला जा सकता है, इसका वैज्ञानिक आकलन भविष्य की यात्रा नीति का महत्वपूर्ण आधार हो सकता है।
बढ़ती संख्या स्थानीय होटल, परिवहन, व्यापार और रोजगार के लिए अवसर पैदा करती है, लेकिन अनियंत्रित भीड़ कचरे, सीवेज, यातायात जाम और जलस्रोतों पर दबाव बढ़ा सकती है। इसलिए रिकॉर्ड यात्री संख्या के साथ उच्च हिमालय की वहन क्षमता, पर्यावरण संरक्षण और आपदा सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना आने वाले वर्षों में चारधाम यात्रा प्रबंधन की बड़ी चुनौती होगी।
