शब्दयात्री-84 : राष्ट्रपत्नी : लेकिन भाषा सबंधी प्रश्न अभी बहस के लिए खुला हुआ है

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-सुशील उपाध्याय

राष्ट्रपति और राष्ट्रपत्नी शब्द से जुड़े विवाद के दो पहलू हैं। पहला, राजनीतिक और दूसरा भाषागत। राजनीतिक पहलू पर काफी बहस और छींटाकसी हो चुकी है। एक-दूसरे के लिए गालियां और अपमानजनक शब्दों का प्रयोग भी किया जा चुका है इसलिए मान लेते हैं कि इस मामले में राजनीति के स्तर पर जो कुछ होना था, वो हो चुका है, लेकिन भाषा सबंधी प्रश्न अभी बहस के लिए खुला हुआ है। असल में इस विवाद की शुरुआत कांग्रेस नेता अधीर रंजन चैधरी के बयान से नहीं हुई, बल्कि इससे पहले पंजाब के सांसद सिमरनजीत सिंह मान श्रीमती द्रौपदी मुर्मू के लिए राष्ट्रपति शब्द के प्रयोग पर आपत्ति जता चुके थे। उनका तर्क था कि ये भले ही ये अपमानजनक शब्द नहीं, लेकिन एक महिला प्रेसिडेंट के लिए राष्ट्रपति शब्द इस्तेमाल करना जेंडर के हिसाब से सही नहीं है। उन्होंने सुझाव दिया कि मौजूदा राष्ट्रपति को प्रेजिडेंट कहना सही है, हिंदुस्तानी में उन्हें सदर कह सकते है या फिर राष्ट्रप्रमुख नाम दिया जा सकता है। उनके इन सुझावों को लोकसभा की कार्यवाही में शामिल नहीं किया गया। इसकी वजह यह है कि देश के सर्वोच्च पद के लिए ‘राष्ट्रपति’ शब्द संविधान सभा की बहसों में तय हो चुका है। इस दृष्टि से यह एक पारिभाषिक शब्द है यानी व्यापक विमर्श के बाद इसका अर्थ तय किया गया है और अब सरकारी स्तर पर इस शब्द को प्रेजिडेंट शब्द के अर्थ के रूप में ही स्वीकार किया जाएगा।
ऐसा नहीं है कि इस शब्द पर पहली बार चर्चा हुई हो। श्रीमती प्रतिभा पाटिल के राष्ट्रपति बनने के वक्त भी यह चर्चा में आया था। इससे पहले श्रीमती इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने पर उनके लिए प्रधानमंत्राणी जैसे शब्द भी प्रयोग किए जाते रहे हैं। असल में राष्ट्रपति शब्द में ‘पति’ शब्द लोगों का ध्यान खींचता है और यह शब्द अक्सर मजाक का विषय भी बनता जबकि, इस शब्द के मामले में यह ध्यान रखने की जरूरत है कि राष्ट्रपति शब्द किन्हीं दो शब्दों का युग्म नहीं है। अतः इसका विच्छेद करके अर्थ ग्रहण नहीं किया जा सकता। यह एक शब्द है और एक विशिष्ट अर्थ के लिए रूढ़ हो चुका हैं। इसलिए यह बात हास्यास्पद होगी कि कोई इस शब्द को राष्ट्र के पति अर्थात मुल्क के शौहर के रूप में देखने लगे और यदि इस पद पर कोई महिला आरूढ़ हो जाए तो यह फिर यह पूछता फिरे कि कोई स्त्री पति कैसे हो सकती है। हिंदी में यह बात पूरी तरह स्थापित है कि पदों के लिए निर्धारित संज्ञाएं जेंडर-न्यूट्रल ही होती हैं। इस आधार पर राष्ट्रपति संज्ञा को इस आधार पर नहीं बदला जाएगा कि इस पद पर कोई पुरुष चुना गया है अथवा महिला।
जहां तक पति शब्द के प्रयोग की बात है तो उसका एक विशिष्ट संदर्भ भी है। शब्दकोशों के अनुसार, किसी स्त्री के लिए वह पुरुष, जिससे उसका विवाह हुआ हो, उसे पति कहा जाता है। लेकिन इसके और भी कई अर्थ हैं। जैसे, स्वामी, शासक और मालिक। इस कारण पति को मिलाकर अनेक शब्दों का गठन किया जाता है, लेकिन ऐसे मामलों में पति का अर्थ स्त्री के पति के स्थान पर स्वामी, संस्था-प्रमुख, मालिक या शासक के तौर पर ही ग्रहण किया जाएगा। यह शब्द संस्कृत में भी विभिन्न रूपों में प्रयोग किया गया है। वहीं से इसे हिंदी में तत्सम शब्द के रूप में स्वीकार किया गया है। इससे दैनिक जीवन के अनेक शब्दों का निर्माण होता है, लेकिन हरेक शब्द का एक सु-निर्धारित अर्थ है। उदाहरण के तौर पर सेनापति को सेना का शौहर या हसबैंड नहीं मान सकते, वहां इसका अर्थ संस्था-प्रमुख या हेड ऑफ द ऑर्गेनाइजेशन है। इसी तरह गणपति, कुलपति, सभापति, करोड़पति, लखपति, अरबपति, प्रजापति और लक्ष्मीपति आदि को भी देख सकतेहैं। इन शब्दों के सामने कुलपत्नी, सभापत्नी, करोड़पत्नी आदि शब्दों का गठन भाषा का विकास नहीं, बल्कि भाषा के साथ अनर्थ करना होगा। यदि कोई लक्ष्मीपति को भगवान विष्णु की बजाय मुहल्ले की लक्ष्मी नाम की किसी महिला का पति बताने लगे तो इसे मूर्खता ही माना जाएगा। वजह, लक्ष्मीपति शब्द का पहले से ही एक रूढ़ अर्थ मौजूद है। यदि कोई कुलवधु और नगरवधु को सामने रखकर वधु शब्द का समान अर्थ ग्रहण करेगा तो इससे यही पता चलेगा कि संबंधित प्रयोक्ता को भाषा के सही स्वरूप की जानकारी नहीं है। उसे भाषा के विकास और विकार का अंतर स्पष्ट नहीं है।
यह स्थापित सत्य है कि हर भाषा का एक मर्दवादी या पुरुषवादी चरित्र भी होता है। इसका प्रमाण केवल मानक भाषाओं में ही नहीं, बल्कि लोक भाषाओं में भी खूब मिलता हैै। सामान्य तौर पर देखें तो लोग और आदमी शब्द का अर्थ मनुष्य के तौर पर लिया जाएगा, लेकिन कौरवी-हरियाणवी में लोग, आदमी, मालिक का अर्थ पति भी है। यहां स्वामी भाव को साफ-साफ देखा जा सकता है। पति मतलब स्त्री का स्वामी। लेकिन, लोकतांत्रिक व्यवस्था में कोई व्यक्ति, वह चाहे स्त्री हो अथवा पुरुष, किसी देश का स्वामी या मालिक नहीं हो सकता/हो सकती। वह केवल कस्टोडियन है। कोई भी देश न तो संपत्ति मात्र है और न ही उसका कोई लैंगिक-वर्गीकरण संभव है, हालांकि परंपरा वश कुछ मामलों में मातृभूमि का प्रयोग किया जाता है (इसके साथ रूस आदि देशों में पितृभूमि भी प्रचलन में है)। भले ही लोक भाषाओं में घरवाला और घरवाली शब्द प्रचलन में हों, लेकिन घरवाली के संबंध में भी स्वामिनी शब्द का भाव नहीं है। यानी पति और पत्नी, दोनों बराबर के शब्द नहीं हैं। पत्नी शब्द का भाषिक परिप्रेक्ष्य भी उसे कमतर साबित करता दिखता है। अधीर रंजन द्वारा राष्ट्रपत्नी शब्द प्रयोग किया जाना भाषा के मर्दवादी चरित्र का प्रमाण भी है।
हिंदी में ऐसे अनेक शब्द मिल जाएंगे जो केवल पुरुषों की शक्ति, योग्यता और विशिष्टता का उद्घोष करते हैं। मसलन, महापुरुष। संभव है, कोई महादेवी शब्द का उदाहरण दे, लेकिन इसमें महापुरुष के बराबर का वजन नहीं दिखता। वो उदाहरण भी बहुत सारे लोगों को याद होगा जब इंदिरा गांधी के लिए मैडम की बजाय सर संबोधन किया जाने लगा था। इसका भाव ये भी है कि हमारे जेहन में स्त्री और उसके सम्मान के शब्दों का कमतर भाव वाला अर्थ मौजूद है। तर्क की दृष्टि से देखें तो जब स्त्री-पुरुष बराबर हैं तो उनसे जुड़े शब्दों भी बराबर ही होने चाहिए, लेकिन ऐसा होता नहीं है। इसीलिए राष्ट्रपत्नी शब्द न केवल बुरा है, बल्कि इसे अपमानजनक और उपहास उड़ाने वाला माना गया।
हालांकि शब्दों को जेंडर न्यूट्रल बनाने का सिलसिला भी चल रहा है। क्रिकेट में अब बैट्समैन और मैन ऑफ द मैच पुराने शब्द हो गए हैं। उनके स्थान पर बैटर (बॉलर की तर्ज पर) और प्लेयर ऑफ द मैच जैसे शब्द इस्तेमाल किए जा रहे हैंै। चेयरमैन भी अब चेयरपर्सन हो चुका है। हिंदी वाले अभी अध्यक्ष और अध्यक्षा में उलझे हुए हैं। अब अध्यक्ष के सामने अध्यक्षा या प्राचार्य के सामने प्राचार्य आ सकती हैं, लेकिन राष्ट्रपति के सामने राष्ट्रपत्नी निहायत बकवास शब्द होगा। जैसा कि इस टिप्पणी के शुरू में कहा गया कि पारिभाषिक शब्दों को उसी अर्थ में ग्रहण किया जाना चाहिए जैसा कि उनका अर्थ निर्धारित गया हैै। फिर भी किसी को दिक्कत हो तो हिंदी में राष्ट्राध्यक्ष शब्द चल सकता है।
कुल मिलाकर इस बात का ध्यान रखना ही होगा कि शब्दों के साथ मनमाने प्रयोग नहीं किए जा सकते। शब्दों के सही अर्थ को परिस्थितियों और संदर्भों के साथ ही ग्रहण किया जाना संभव होता है। इनके प्रयोग में सांस्कृतिक-सामाजिक अंतर को भी स्वीकार करना होगा क्योंकि बाई जैसा शब्द हिंदी, मराठी और बांग्ला में भिन्न अर्थों में प्रयोग किया जाता है। गौरतलब है कि द्रौपदी नाम को भी कई बार भिन्न अर्थों में प्रयोग किया जाता है, लेकिन ऐसा करने वाले इसलिए अक्षम्य होंगे क्योंकि संज्ञाओं को परिवर्तित नहीं किया जा सकता और उनके भावरूप को ही ग्रहण किया जाना चाहिए।

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