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पार्किंसंस के इलाज में मददगार साबित होगा ‘स्मार्ट सेंसर’: अब स्मार्टफोन से तय होगी दवा की सही खुराक

चित्र 1: सिल्क फाइब्रोइन युक्त एस्पार्टिक एसिड-कम किए गए ग्रेफीन ऑक्साइड कोर-शेल क्वांटम डॉट्स के विकास के लिए एक सरल, जैव-अनुकूल संश्लेषण मार्ग। इस फ्लोरोसेंस नैनोप्रोब का उपयोग जलीय माध्यम और वास्तविक में एल-डोपा के स्मार्टफोन-आधारित तीव्र संवेदन के लिए किया जाता है।

वैज्ञानिक अनुसंधान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण सफलता हासिल करते हुए भारतीय शोधकर्ताओं ने एक ऐसी सस्ती, पोर्टेबल और उपयोग में बेहद आसान ‘स्मार्टफोन-आधारित सेंसर प्रणाली’ विकसित की है, जो पार्किंसंस रोग के प्रबंधन और उपचार में एक बड़ी क्रांति साबित हो सकती है। यह नया सेंसर मानव शरीर के जैविक नमूनों में एल-डोपा (L-Dopa) नामक महत्वपूर्ण रसायन की सांद्रता का सटीक पता लगाने में सक्षम है। इस तकनीक के माध्यम से डॉक्टरों के लिए पार्किंसंस के मरीजों के लिए दवा की बिल्कुल सटीक खुराक निर्धारित करना बेहद आसान और त्वरित हो जाएगा।

यह तकनीक विशेष रूप से भारत जैसे विशाल देश के दूरदराज और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए एक वरदान साबित हो सकती है, जहां आधुनिक प्रयोगशालाओं और महंगे नैदानिक (diagnostic) उपकरणों की भारी कमी है।

क्या है पार्किंसंस रोग और क्यों जरूरी है एल-डोपा?

पार्किंसंस एक प्रगामी तंत्रिका तंत्र संबंधी विकार (progressive neurological disorder) है, जो मुख्य रूप से शरीर के संचालन और गति को प्रभावित करता है। इस बीमारी में मस्तिष्क की वे न्यूरॉन कोशिकाएं धीरे-धीरे नष्ट या निष्क्रिय होने लगती हैं जो ‘डोपामाइन’ नामक न्यूरोट्रांसमीटर का उत्पादन करती हैं। डोपामाइन हमारे मस्तिष्क द्वारा शरीर के अंगों को भेजे जाने वाले संदेशों और शारीरिक संतुलन को नियंत्रित करने के लिए जिम्मेदार होता है। जब डोपामाइन का स्तर बहुत कम हो जाता है, तो मरीज को हाथों-पैरों में कंपन (tremors), मांसपेशियों में अकड़न, चलने-फिरने में असमर्थता और संतुलन बिगड़ने जैसी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

इस बीमारी के इलाज में एल-डोपा (L-Dopa) एक प्राथमिक और सबसे प्रभावकारी रसायन (दवा) की भूमिका निभाता है। जब एल-डोपा को दवा के रूप में मरीज को दिया जाता है, तो यह शरीर और मस्तिष्क में पहुंचकर डोपामाइन में परिवर्तित हो जाता है, जिससे डोपामाइन की कमी पूरी होती है और बीमारी के लक्षण नियंत्रण में रहते हैं।

खुराक का सटीक संतुलन: एक बड़ी चिकित्सा चुनौती

पार्किंसंस के इलाज में सबसे बड़ी चुनौती दवा की ‘सटीक खुराक’ (Optimal Dosage) तय करना है। पार्किंसंस एक निरंतर बढ़ने वाली बीमारी है, इसलिए जैसे-जैसे मरीज की उम्र बढ़ती है और न्यूरॉन्स का नुकसान अधिक होता है, वैसे-वैसे शरीर में एल-डोपा की आवश्यकता बदलती रहती है।

दवा की खुराक का संतुलन थोड़ा सा भी बिगड़ने पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं:

  • खुराक कम होने पर: यदि मरीज को पर्याप्त मात्रा में एल-डोपा नहीं मिलता, तो डोपामाइन का स्तर गिर जाता है और पार्किंसंस के लक्षण (जैसे कंपन और संतुलन की कमी) दोबारा उभर आते हैं।

  • खुराक अधिक होने पर: यदि शरीर को एल-डोपा की अधिक खुराक दी जाती है, तो इसके घातक दुष्प्रभाव देखने को मिलते हैं। इनमें डिस्केनेसिया (शारीरिक अंगों की अनियंत्रित और बेढंगी हरकतें), पैरानोया, भ्रम या मानसिक रोग (psychosis), पेट की गंभीर समस्याएं (gastritis) और ऑर्थोस्टेटिक हाइपोटेंशन (अचानक खड़े होने पर रक्तचाप का खतरनाक रूप से गिर जाना) शामिल हैं।

इसी वजह से मरीजों के रक्त, पसीने या मूत्र में एल-डोपा के स्तर की निरंतर और सटीक निगरानी (monitoring) करना बेहद आवश्यक होता है, ताकि दवा की सही मात्रा तय की जा सके।

कैसे काम करता है यह नया ‘स्मार्ट सेंसर’?

विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के स्वायत्त संस्थान ‘इंसटीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी इन Science and Technology’ (IASST) के वैज्ञानिकों ने इस समस्या का स्थायी समाधान खोजते हुए एक ‘फ्लोरोसेंस टर्न-ऑन’ ऑप्टिकल सेंसर विकसित किया है।

इस सेंसर की निर्माण प्रक्रिया और कार्यप्रणाली पूरी तरह से स्वदेशी, वैज्ञानिक नवाचार और हरित रसायन विज्ञान (green chemistry) पर आधारित है:

  1. सिल्क और ग्रेफीन का अनूठा मेल: शोधकर्ताओं ने बॉम्बेक्स मोरी (सिल्कवर्म) के सिल्क कोकून से प्राप्त सिल्क-फाइब्रोइन प्रोटीन की नैनो-लेयर को कम ग्रेफीन ऑक्साइड (reduced graphene oxide) नैनोकणों की सतह पर लेपित (coat) किया है। इससे कोर-शेल ग्रेफीन पर आधारित नैनो ‘क्वांटम डॉट्स’ बनते हैं, जिनमें उत्कृष्ट फोटोलुमिनेसेंस (प्रकाश उत्सर्जित करने वाले) गुण होते हैं।

  2. सूक्ष्म स्तर पर सटीक पहचान: यह सेंसर बहुत अधिक संवेदनशील है। यह मानव रक्त प्लाज्मा, पसीने और मूत्र जैसे जैविक नमूनों में 5 μM से 35 μM (माइक्रोमोलर) की सूक्ष्म रैखिक सीमा के भीतर भी एल-डोपा की मौजूदगी का त्वरित पता लगा लेता है।

  3. स्मार्टफोन से आसान संचालन: इस पूरी प्रणाली को बेहद व्यावहारिक बनाया गया है। इसमें एक छोटा इलेक्ट्रॉनिक डार्क चैंबर (अंधेरा बॉक्स) होता है, जिसमें 365 nm की LED लाइट लगी होती है। इस पूरे सेटअप को चलाने के लिए किसी भारी बिजली उपकरण की जरूरत नहीं है, बल्कि इसे एक सामान्य 5-वोल्ट के स्मार्टफोन चार्जर से ऊर्जा मिलती है।

जब मरीज का नमूना इस सेंसर में रखा जाता है, तो एल-डोपा की उपस्थिति में यह विशेष चमक (fluorescence) पैदा करता है। इसे स्मार्टफोन के कैमरे और उससे जुड़े सॉफ्टवेयर से स्कैन करके सेकंडों में एल-डोपा का सटीक स्तर माप लिया जाता है।

स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए यह खोज क्यों है खास?

वर्तमान समय में शरीर में एल-डोपा का परीक्षण करने के लिए महंगी, जटिल और भारी-भरकम प्रयोगशाला तकनीकों (जैसे HPLC या स्पेक्ट्रोफोटोमेट्री) का उपयोग किया जाता है। ये सुविधाएं केवल बड़े-बड़े महानगरीय अस्पतालों में ही उपलब्ध होती हैं और इनकी रिपोर्ट आने में भी काफी समय लगता है।

इसके विपरीत, नया स्मार्ट सेंसर:

  • किफायती और सुलभ है: इसकी निर्माण लागत बेहद कम है, जिससे यह आम मरीजों के लिए किफायती साबित होगा।

  • मौके पर जांच (Point-of-care testing): इसके लिए मरीज को अस्पताल में भर्ती होने या लैब के चक्कर लगाने की आवश्यकता नहीं है। डॉक्टर क्लिनिक में ही या मरीज के घर पर ‘ऑन-द-स्पॉट’ जांच कर सकते हैं।

  • तत्काल परिणाम: नमूना लेते ही तुरंत परिणाम मिल जाता है, जिससे डॉक्टर बिना समय गंवाए उसी समय दवा की खुराक को बढ़ा या घटा (adjust) सकते हैं।

भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा विकसित यह ‘स्मार्टफोन आधारित सेंसर प्रणाली’ स्वास्थ्य तकनीक के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी कदम है। यह न केवल पार्किंसंस के रोगियों के जीवन स्तर में सुधार लाएगी और उन्हें दवा के दुष्प्रभावों से बचाएगी, बल्कि भारत के सुदूर और ग्रामीण इलाकों में डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूती प्रदान करने में भी मील का पत्थर साबित होगी।

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