धर्म/संस्कृति/ चारधाम यात्रा

तमिलनाडु से कार्तिक स्वामी धाम पहुंची भगवान मुरुगन की दुर्लभ प्रतिमा, सांस्कृतिक एकता का बनी प्रतीक

– राजेश्वरी राणा-
पोखरी, 30 मई। उत्तराखंड और तमिलनाडु के बीच आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक संबंधों को नई मजबूती देने वाली एक महत्वपूर्ण पहल के तहत तमिलनाडु के भगवान मुरुगन के परम भक्त जी.एस.के. गोपी ने भगवान मुरुगन (कार्तिकेय स्वामी) की दुर्लभ पंचधातु प्रतिमा कार्तिक स्वामी मंदिर को भेंट स्वरूप समर्पित की। श्रद्धालुओं ने इस अवसर को उत्तर और दक्षिण भारत की प्राचीन आध्यात्मिक परंपराओं के अद्भुत संगम के रूप में देखा।

भगवान मुरुगन के अनन्य उपासक जी.एस.के. गोपी लंबे समय से मुरुगन उपासना परंपरा तथा उससे जुड़े ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों पर अध्ययन एवं शोध कार्य कर रहे हैं। इसी क्रम में उन्हें हिमालय की गोद में स्थित प्राचीन कार्तिक स्वामी मंदिर के बारे में जानकारी मिली, जिसे भगवान कार्तिकेय से जुड़ा अत्यंत महत्वपूर्ण तीर्थ माना जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह धाम तमिलनाडु की मुरुगन परंपरा से भी गहरे आध्यात्मिक संबंध रखता है।

इसी आध्यात्मिक जुड़ाव से प्रेरित होकर जी.एस.के. गोपी ने भगवान मुरुगन की दुर्लभ पंचधातु प्रतिमा कार्तिक स्वामी मंदिर को समर्पित की। इस प्रतिमा की विशेषता यह है कि इसमें भगवान मुरुगन अपने पारंपरिक ‘वेल’ (भाला) धारण किए स्वरूप में नहीं, बल्कि दुर्लभ आशीर्वाद मुद्रा में विराजमान हैं। यह मुद्रा करुणा, कृपा, शांति और मानव कल्याण का प्रतीक मानी जाती है।
कार्तिक स्वामी मंदिर समिति के अध्यक्ष विक्रम नेगी ने इस पहल का स्वागत करते हुए कहा कि यह प्रतिमा केवल एक धार्मिक भेंट नहीं, बल्कि उत्तराखंड और तमिलनाडु के बीच सांस्कृतिक एकता, आध्यात्मिक समरसता और राष्ट्रीय एकात्मता का प्रतीक है।

उन्होंने कहा कि इससे दोनों राज्यों के श्रद्धालुओं के बीच धार्मिक एवं सांस्कृतिक संबंध और अधिक सुदृढ़ होंगे।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान मुरुगन ने हिमालय स्थित कार्तिक स्वामी धाम से दक्षिण भारत के प्रसिद्ध पलानी धाम तक आध्यात्मिक यात्रा की थी। ऐसे में तमिलनाडु से भगवान मुरुगन की प्रतिमा का कार्तिक स्वामी धाम पहुंचना श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है।

स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं ने इस पहल का स्वागत करते हुए इसे ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ की भावना को साकार करने वाला प्रेरणादायी प्रयास बताया। उनका कहना है कि इस प्रकार के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आदान-प्रदान से देश की विविध परंपराओं के बीच पारस्परिक सम्मान और एकता की भावना और अधिक मजबूत होती है।

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