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परिवर्तन संकल्प सम्मेलन में अनुशासन पर सख्ती: क्या उत्तराखंड कांग्रेस में ‘नई कार्यशैली’ का संकेत?

उषा रावत
उत्तराखंड कांग्रेस ने पिथौरागढ़ में आयोजित परिवर्तन संकल्प सम्मेलन के दौरान कथित अनुशासनहीनता के मामले में तीन नेताओं को कारण बताओ नोटिस जारी कर तथा महिला कांग्रेस की जिलाध्यक्ष को पदमुक्त कर एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश देने का प्रयास किया है। यह कार्रवाई केवल तीन नेताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रदेश कांग्रेस के भीतर संगठनात्मक अनुशासन, नेतृत्व की स्वीकार्यता और आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारी से भी जुड़ी हुई मानी जा रही है।
प्रदेश कांग्रेस इन दिनों राज्यभर में ‘परिवर्तन संकल्प सम्मेलन’ आयोजित कर कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने, संगठन को पुनर्गठित करने और भाजपा के विरुद्ध जनमत तैयार करने का प्रयास कर रही है। ऐसे अभियान का उद्देश्य पार्टी के भीतर एकजुटता का प्रदर्शन करना होता है। लेकिन यदि ऐसे ही मंचों पर असंतोष, विरोध या अनुशासनहीनता सामने आए तो उससे जनता के बीच पार्टी की छवि कमजोर पड़ती है। यही कारण है कि पिथौरागढ़ की घटना पर नेतृत्व ने तत्काल कार्रवाई करना उचित समझा।
प्रदेश कांग्रेस महामंत्री (संगठन) राजेन्द्र सिंह भंडारी के अनुसार, सम्मेलन के दौरान महेन्द्र सिंह लुंठी, दीपक लुंठी और महिला कांग्रेस की जिलाध्यक्ष भावना नगरकोटी द्वारा मंच पर कथित अभद्रता और अनुशासनहीनता की गई। इसके बाद तीनों नेताओं को तीन दिन के भीतर स्पष्टीकरण देने के निर्देश दिए गए, जबकि महिला कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष ज्योति रौतेला ने भावना नगरकोटी को पदमुक्त कर जिला महिला कांग्रेस कमेटी को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया।
राजनीतिक दृष्टि से यह कार्रवाई कई संकेत देती है। पहला, प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल के नेतृत्व में कांग्रेस अब यह संदेश देना चाहती है कि संगठन में अनुशासन सर्वोपरि होगा और सार्वजनिक मंचों पर किसी भी प्रकार की गुटबाजी या शक्ति प्रदर्शन को स्वीकार नहीं किया जाएगा। दूसरा, पार्टी यह भी दिखाना चाहती है कि निर्णय लेने में अब विलंब नहीं होगा और अनुशासनहीनता पर त्वरित कार्रवाई की जाएगी।
उत्तराखंड कांग्रेस लंबे समय से गुटीय राजनीति की चुनौती से जूझती रही है। पूर्व मुख्यमंत्रियों, वरिष्ठ नेताओं और क्षेत्रीय प्रभाव वाले नेताओं के अलग-अलग शक्ति केंद्र समय-समय पर सामने आते रहे हैं। कई अवसरों पर टिकट वितरण, संगठनात्मक नियुक्तियों और नेतृत्व परिवर्तन को लेकर असंतोष भी सार्वजनिक रूप से दिखाई देता रहा है। यही कारण है कि कांग्रेस के सामने केवल भाजपा से मुकाबला करने की चुनौती नहीं है, बल्कि अपने संगठन को भीतर से मजबूत बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि भाजपा अक्सर कांग्रेस पर गुटबाजी और नेतृत्व संकट का आरोप लगाती रही है। ऐसे में यदि कांग्रेस के कार्यक्रमों में सार्वजनिक विवाद सामने आते हैं तो उसका राजनीतिक लाभ प्रतिद्वंद्वी दल को मिल सकता है। इसलिए कांग्रेस नेतृत्व इस प्रकार की घटनाओं को शुरुआती स्तर पर ही नियंत्रित करने की रणनीति अपनाता दिखाई दे रहा है।
हालांकि, अनुशासनात्मक कार्रवाई का दूसरा पक्ष भी है। यदि असंतुष्ट नेताओं की शिकायतें केवल दंडात्मक कार्रवाई तक सीमित रह जाएं और संवाद की प्रक्रिया कमजोर पड़े, तो इससे स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं में असंतोष बढ़ने की संभावना भी रहती है। किसी भी राजनीतिक दल के लिए अनुशासन और आंतरिक लोकतंत्र के बीच संतुलन बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती होती है। इसलिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नोटिस मिलने के बाद संबंधित नेताओं का पक्ष क्या सामने आता है और पार्टी नेतृत्व उस पर किस प्रकार निर्णय लेता है।
आगामी समय में उत्तराखंड कांग्रेस का सबसे बड़ा लक्ष्य संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करना और भाजपा के विरुद्ध मजबूत राजनीतिक विकल्प के रूप में स्वयं को स्थापित करना होगा। इसके लिए केवल अनुशासनात्मक कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी। नेतृत्व को कार्यकर्ताओं के बीच संवाद बढ़ाना, स्थानीय असंतोष का समय पर समाधान करना तथा सभी गुटों को साथ लेकर चलने की रणनीति भी अपनानी होगी।
पिथौरागढ़ की घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कांग्रेस नेतृत्व अब संगठनात्मक अनुशासन को लेकर पहले की तुलना में अधिक सख्त दिखाई देना चाहता है। लेकिन इस सख्ती की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या पार्टी अनुशासन बनाए रखने के साथ-साथ संगठन के भीतर विश्वास, संवाद और सामंजस्य भी स्थापित कर पाती है। यदि ऐसा हुआ तो परिवर्तन संकल्प सम्मेलन केवल राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि कांग्रेस के संगठनात्मक पुनर्निर्माण की शुरुआत भी साबित हो सकते हैं।
इस विश्लेषण में तथ्यों और राजनीतिक संदर्भों के आधार पर निष्कर्ष प्रस्तुत किए गए हैं तथा किसी भी पक्ष के बारे में अपुष्ट या निर्णायक दावे करने से बचा गया है।

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