कमजोर मानसून की आशंका: पहाड़ी राज्यों, किसानों और अर्थव्यवस्था के सामने नई चुनौती
The monsoon outlook for 2026 indicates below-normal rainfall in Uttarakhand, placing the state among the most vulnerable hill regions. The forecast suggests national rainfall at about 92% of the long-period average, but Uttarakhand faces a 35–65% probability of deficient rains. Reduced snow cover in the northern hemisphere and a likely El Niño phase are key factors weakening monsoon circulation. For Uttarakhand, this raises concerns over water resources, agriculture, and hydropower, all heavily dependent on monsoon rainfall. Uneven rainfall may also increase landslide risks. The situation highlights the need for preparedness, water conservation, and support to small farmers.

–जयसिंह रावत
देश में वर्ष 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून को लेकर जारी पूर्वानुमानों ने विशेष रूप से पहाड़ी राज्यों के लिए चिंता बढ़ा दी है। मौसम विभाग के दीर्घकालिक आकलन के अनुसार उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के बड़े हिस्सों में इस वर्ष सामान्य से कम वर्षा होने की आशंका है। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर के कुछ क्षेत्रों में भी वर्षा सामान्य से कम रहने का अनुमान जताया गया है, जबकि लद्दाख में सामान्य से अधिक वर्षा हो सकती है। यह स्थिति केवल जलवायु की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि कृषि, जल संसाधनों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी गंभीर प्रभाव डाल सकती है।
मौसम विभाग के अनुसार, इस वर्ष देश में कुल मानसूनी वर्षा दीर्घकालिक औसत (एलपीए) का लगभग 92 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो सामान्य श्रेणी से नीचे की स्थिति को दर्शाता है। विशेष रूप से उत्तराखंड में सामान्य से कम वर्षा की संभावना 35 से 65 प्रतिशत के बीच बताई गई है। यह संकेत करता है कि पहाड़ी क्षेत्रों में जल स्रोतों, सिंचाई और पेयजल व्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।
इस वर्ष कमजोर मानसून की आशंका के पीछे एक प्रमुख कारण उत्तरी गोलार्ध में सर्दी और वसंत ऋतु के दौरान हिम आवरण (स्नो कवर) का सामान्य से कम रहना बताया गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार, हिम आवरण का क्षेत्रफल कम होने से भूमि और वायुमंडल के बीच तापमान का अंतर कमजोर पड़ जाता है। यह अंतर मानसून की गति और उसकी तीव्रता को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब यह तापीय अंतर कम हो जाता है, तो मानसूनी हवाओं की शक्ति भी कमजोर पड़ सकती है, जिससे वर्षा की मात्रा प्रभावित होती है।
वैश्विक जलवायु संकेतक भी इस वर्ष मानसून पर प्रभाव डाल सकते हैं। वर्तमान में ला-नीना की कमजोर होती स्थिति के कारण जलवायु तटस्थ अवस्था की ओर बढ़ रही है, जबकि मानसून के महीनों के दौरान अल-नीनो की संभावना जताई जा रही है। अल-नीनो की स्थिति आमतौर पर भारत में वर्षा की कमी से जुड़ी होती है, क्योंकि इसके दौरान प्रशांत महासागर का तापमान बढ़ जाता है और मानसूनी हवाओं की दिशा व गति प्रभावित होती है। हालांकि, वैज्ञानिकों का मानना है कि बाद के महीनों में हिंद महासागर द्विध्रुव (आईओडी) की स्थिति सकारात्मक हो सकती है, जिससे वर्षा की कमी को आंशिक रूप से संतुलित किया जा सकता है।
पहाड़ी राज्यों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से संवेदनशील मानी जा रही है, क्योंकि यहां मानसून वर्षा जल संसाधनों, कृषि और जलविद्युत उत्पादन का प्रमुख आधार है। उत्तराखंड और हिमाचल जैसे राज्यों में नदियों का प्रवाह, जलाशयों का स्तर और सिंचाई व्यवस्था काफी हद तक मानसून पर निर्भर रहती है। यदि वर्षा सामान्य से कम रहती है, तो इससे जलविद्युत परियोजनाओं के उत्पादन पर भी प्रभाव पड़ सकता है। साथ ही, असमान वर्षा की स्थिति में भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं का खतरा भी बढ़ जाता है, क्योंकि कभी-कभी कम कुल वर्षा के बावजूद अचानक तेज वर्षा की घटनाएं अधिक नुकसान पहुंचा सकती हैं।
देश की अर्थव्यवस्था पर भी कमजोर मानसून का असर पड़ना स्वाभाविक है। यद्यपि विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान परिस्थितियों में भारत की समग्र अर्थव्यवस्था इतनी कमजोर नहीं है कि वह पूरी तरह संकट में आ जाए, फिर भी कृषि क्षेत्र पर इसका सीधा प्रभाव पड़ सकता है। देश की सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान अभी भी लगभग एक-चौथाई के आसपास है, और यह क्षेत्र मुख्य रूप से वर्षा पर निर्भर है। भारत में लगभग 70 प्रतिशत कृषि भूमि को आवश्यक नमी मानसून से ही प्राप्त होती है। कई राज्यों में तो आधे से अधिक खेत वर्षा आधारित हैं।
कमजोर मानसून का सबसे अधिक प्रभाव छोटे और सीमांत किसानों पर पड़ता है। उदाहरण के लिए, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में गेहूं की लगभग आधी खेती वर्षा पर निर्भर है, जबकि महाराष्ट्र में वर्षा आधारित खेती का अनुपात 80 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। अल-नीनो के वर्षों में दालों का उत्पादन अक्सर घट जाता है, कभी-कभी यह गिरावट 25 प्रतिशत से अधिक तक पहुंच जाती है। इसका सीधा असर देश की खाद्य सुरक्षा और बाजार में कीमतों पर पड़ सकता है।
जल संसाधनों पर दबाव बढ़ने का एक और कारण भूमिगत जल का अत्यधिक दोहन है। जब वर्षा कम होती है, तो किसान ट्यूबवेल और पंपसेट का अधिक उपयोग करते हैं, जिससे भूजल स्तर तेजी से नीचे चला जाता है। इसके साथ ही जलाशयों में पानी की उपलब्धता भी घट जाती है, जिससे सिंचाई और बिजली उत्पादन दोनों प्रभावित होते हैं।
इस वर्ष स्थिति को और जटिल बनाने वाले कुछ अतिरिक्त कारक भी सामने आए हैं। मार्च और अप्रैल में हुई असामयिक वर्षा ने देश के कई हिस्सों में खड़ी फसलों को नुकसान पहुंचाया है, जिससे किसानों की आर्थिक स्थिति पहले से ही कमजोर हुई है। इसके अतिरिक्त, पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण उर्वरकों की आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका है। यदि यह स्थिति लंबी चली, तो डीजल जैसे ईंधनों की कीमतों में वृद्धि भी संभव है, जिससे खेती की लागत बढ़ सकती है।
हालांकि कुछ सकारात्मक संकेत भी सामने आए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि देश की बैंकिंग व्यवस्था और औद्योगिक क्षेत्र अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में हैं, जिससे अर्थव्यवस्था को पूरी तरह अस्थिर होने से बचाया जा सकता है। यदि कच्चे तेल की कीमतें नियंत्रित रहती हैं, तो सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर पर पड़ने वाला प्रभाव सीमित रह सकता है। पिछले वर्ष कृषि क्षेत्र ने अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, और इस वर्ष भी यदि उचित सरकारी सहायता मिलती है, तो किसान इस चुनौती से उबर सकते हैं।
कमजोर मानसून की स्थिति में सरकार की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। समय पर बीज, उर्वरक और सिंचाई सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना आवश्यक होगा। साथ ही, छोटे किसानों के लिए वित्तीय सहायता और फसल बीमा योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करना भी जरूरी होगा। जल संरक्षण और वर्षा जल संचयन जैसी दीर्घकालिक योजनाओं पर भी तेजी से काम करने की आवश्यकता है, ताकि भविष्य में ऐसी परिस्थितियों का सामना बेहतर तरीके से किया जा सके।
अंततः यह कहा जा सकता है कि वर्ष 2026 का मानसून केवल एक मौसमी घटना नहीं, बल्कि देश की कृषि, जल संसाधन और अर्थव्यवस्था की स्थिरता से जुड़ा एक महत्वपूर्ण कारक है। यदि वर्षा सामान्य से कम रहती है, तो इसके प्रभाव दूरगामी हो सकते हैं। हालांकि, जलवायु प्रणाली में होने वाले बदलावों के कारण अंतिम परिणाम में कुछ सुधार की संभावना भी बनी रहती है। विशेष रूप से यदि हिंद महासागर द्विध्रुव की स्थिति सकारात्मक होती है, तो वर्षा की कमी को कुछ हद तक संतुलित किया जा सकता है।
इन परिस्थितियों में आवश्यक है कि सरकार, वैज्ञानिक संस्थान और किसान सभी मिलकर सतर्कता और तैयारी के साथ आगे बढ़ें, ताकि संभावित संकट को अवसर में बदला जा सके और देश की खाद्य एवं जल सुरक्षा को बनाए रखा जा सके।
(लेख में प्रकट विचार लेखक के निजी हैं -एडमिन)
