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जंगली धान: भविष्य की खेती का ‘सुपर क्रॉप’

Wild rice, scientifically known as Oryza rufipogon, is considered the direct ancestor of the Asian cultivated rice (Oryza sativa) that is eaten around the world today. You can think of it as the “great-grandfather” of modern rice varieties. For thousands of years, this rice has been growing and thriving naturally in the marshy areas, pond edges, and naturally waterlogged regions of Assam — without any human intervention, chemical fertilizers, or pesticides. Compared to human-bred rice varieties, its grains are slightly thinner, reddish or darker in color, and they easily shatter and fall from the plant. This is a unique natural mechanism for its self-dispersal. This wild rice, being conserved in the Borjuli region, is a priceless treasure of nature. The genetic traits hidden within it are no less than a gold mine for modern science.

-उषा रावत  द्वारा 

भारत की कृषि संस्कृति और खाद्य सुरक्षा में धान (चावल) की भूमिका रीढ़ की हड्डी जैसी है। लेकिन बदलते मौसम चक्र, ग्लोबल वार्मिंग, और अप्रत्याशित बाढ़ व सूखे के इस दौर में पारंपरिक खेती के सामने एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है। ऐसे समय में, जब विज्ञान और प्रकृति के बीच तालमेल बिठाने की सबसे ज्यादा जरूरत है, असम के सोनितपुर जिले से एक बेहद उत्साहजनक खबर आई है। राष्ट्रीय वर्षा आधारित क्षेत्र प्राधिकरण (NRAA) द्वारा वित्त पोषित और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद–राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (ICAR-NBPGR) द्वारा संचालित ‘जंगली धान (ओरिज़ा रूफ़ीपोगोन) के यथास्थान संरक्षण और प्रबंधन’ परियोजना ने एक ऐतिहासिक मील का पत्थर हासिल किया है। इस परियोजना के तहत सोनितपुर जिले के बोरजुली क्षेत्र को एक ‘जैव विविधता धरोहर स्थल’ (Biodiversity Heritage Site) के रूप में अधिसूचित किया गया है। यह उपलब्धि केवल एक क्षेत्र को कानूनी संरक्षण देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस ‘जंगली धान’ (Wild Rice) के अद्भुत गुणों और उसकी असीम संभावनाओं को दी गई मान्यता है, जो हमारी आने वाली पीढ़ियों की थाली को सुरक्षित रख सकता है।

क्या है जंगली धान (ओरिज़ा रूफ़ीपोगोन)?

जंगली धान, जिसे वैज्ञानिक भाषा में ओरिज़ा रूफ़ीपोगोन (Oryza rufipogon) कहा जाता है, आज दुनिया भर में खाए जाने वाले एशियाई खेती वाले धान (ओरिज़ा सैटिवा) का सीधा पूर्वज माना जाता है। इसे आप आधुनिक धान के ‘दादा-परदादा’ की तरह समझ सकते हैं। हजारों सालों से यह धान असम के दलदली इलाकों, तालाबों के किनारों और प्राकृतिक जलभराव वाले क्षेत्रों में बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप, बिना रसायनिक खादों और बिना कीटनाशकों के खुद-ब-खुद उगता और फलता-फूलता आ रहा है। मानव निर्मित धान की किस्मों की तुलना में इसके दाने थोड़े पतले, लाल या गहरे रंग के होते हैं और यह आसानी से खेतों से झड़ जाते हैं, जो प्रकृति में इसके स्वतः प्रसार की एक अनूठी तकनीक है। बोरजुली क्षेत्र में संरक्षित किया जा रहा यह जंगली धान प्रकृति का एक ऐसा अनमोल खजाना है, जिसके भीतर छिपे आनुवंशिक गुण (Genetic Traits) आधुनिक विज्ञान के लिए किसी सोने की खदान से कम नहीं हैं।

अद्भुत जलवायु-सहिष्णुता और आंतरिक प्रतिरक्षण क्षमता

आधुनिक धान की फसलें मौसम में थोड़े से बदलाव, जैसे अत्यधिक गर्मी, बेमौसम बारिश या पानी की कमी से बर्बाद हो जाती हैं। इसके विपरीत, जंगली धान सदियों से प्रकृति के कड़े थपेड़ों को सहते हुए जीवित रहा है। असम के इस जंगली धान में बाढ़ और जलभराव का मुकाबला करने की असाधारण क्षमता है। यह हफ्तों तक गहरे पानी में डूबे रहने के बाद भी नहीं सड़ता और इसमें पानी के बढ़ते स्तर के साथ अपनी लंबाई बढ़ाने की अद्भुत क्षमता होती है। इसके साथ ही, इसके जीन्स में कड़े तापमान और सूखे को सहन करने की प्राकृतिक कोडिंग होती है। आजकल के किसानों का एक बड़ा खर्च फसलों को बीमारियों और कीड़ों (जैसे ब्लास्ट रोग या बीपीएच कीट) से बचाने में जाता है। जंगली धान चूंकि जंगलों और दलदलों में बिना इंसानी देखभाल के विकसित हुआ है, इसलिए इसमें बीमारियों और कीटों के खिलाफ एक अभेद्य प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) होती है। इसके जर्मप्लाज्म (Germplasm) का उपयोग करके ऐसी नई किस्में बनाई जा सकती हैं, जिनमें रासायनिक कीटनाशकों की जरूरत न के बराबर होगी।

पोषण का पावरहाउस और स्वास्थ्य के लिए वरदान

जंगली धान का एक और सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसकी आंतरिक पोषण गुणवत्ता है। वैज्ञानिक शोधों से पता चला है कि आम सफेद चावल की तुलना में जंगली धान (विशेषकर इसके लाल और काले जर्मप्लाज्म) में आयरन और जिंक जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों (Micronutrients) की प्रचुरता होती है। इसके साथ ही, इसमें एंटीऑक्सीडेंट्स और फाइबर की मात्रा बहुत अधिक होती है, जो आधुनिक जीवनशैली की बीमारियों जैसे मधुमेह (Diabetes) और मोटापे से लड़ने में मददगार साबित हो सकती है। इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स भी सामान्य चावल से काफी कम होता है, जो इसे स्वास्थ्य के लिहाज से बेहद उत्तम और गुणकारी बनाता है।

बोरजुली का संरक्षण और भारतीय कृषि का नया सवेरा

कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले NRAA के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) डॉ. चंद्र शेखर कुमार (IAS) ने इस परियोजना की सराहना करते हुए इसे ‘अमूल्य आनुवंशिक संपदा’ कहा है। इस जंगली धान को उसके मूल स्थान (In-situ) यानी बोरजुली में ही संरक्षित करना इसलिए जरूरी था क्योंकि जब हम किसी पौधे को उसकी प्राकृतिक प्रयोगशाला से निकालकर जीन बैंक में बंद कर देते हैं, तो बदलते पर्यावरण के साथ खुद को ढालने की उसकी प्राकृतिक विकास प्रक्रिया रुक जाती है। बोरजुली को जैव विविधता धरोहर स्थल बनाकर वैज्ञानिकों ने प्रकृति की उस लाइव लैबोरेट्री को सुरक्षित कर दिया है, जहाँ यह धान हर दिन बदलते पर्यावरण के साथ लड़ना और जीतना सीख रहा है। असम के सोनितपुर में मिली यह सफलता केवल धान तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। भारत की दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा और कृषि की स्थिरता को बनाए रखने के लिए हमें गेहूं, दलहन, तिलहन और बाजरा जैसी अन्य प्रमुख फसलों के ‘जंगली संबंधियों’ (Wild Relatives) को भी खोजना और संरक्षित करना होगा। जंगली धान की यह प्रजाति हमारे वैज्ञानिकों को एक ऐसा आधार सौंपती है, जिससे वे भविष्य के लिए एक ऐसी ‘सुपर क्रॉप’ विकसित कर सकते हैं, जो बाढ़ और सूखे को मात देकर इंसानी शरीर को भरपूर पोषण देगी।

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