लोकसभा में महिला आरक्षण संविधान संशोधन विधेयक गिरा
नई दिल्ली, (विशेष संवाददाता)। लोकसभा में महिला आरक्षण को शीघ्र लागू करने से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक पर शुक्रवार शाम करीब 7:45 बजे हुए मत विभाजन में सरकार आवश्यक दो-तिहाई बहुमत जुटाने में असफल रही, जिसके कारण यह महत्वपूर्ण विधेयक सदन में ही गिर गया। इस घटनाक्रम से महिला आरक्षण को जल्द लागू करने की योजना को बड़ा झटका लगा है और अब इसके लागू होने में लंबी देरी की आशंका बढ़ गई है।
मत विभाजन के दौरान सरकार के पक्ष में 298 वोट पड़े, जबकि 230 सदस्यों ने इसके विरोध में मतदान किया। संविधान संशोधन पारित कराने के लिए उस समय सदन में उपस्थित सदस्यों के आधार पर 352 वोट आवश्यक थे, लेकिन सरकार इस आंकड़े तक नहीं पहुंच सकी। परिणामस्वरूप यह विधेयक पारित नहीं हो सका और निरस्त हो गया। संसदीय मामलों के जानकारों के अनुसार, इतने महत्वपूर्ण विधेयक का गिरना राजनीतिक दृष्टि से सरकार के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है।
सरकार का उद्देश्य पहले से पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 को शीघ्र लागू करना था। मौजूदा प्रावधानों के अनुसार महिला आरक्षण नई जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन के पश्चात ही लागू होना है, जिसमें कई वर्षों का समय लग सकता है। इसी देरी को कम करने के लिए सरकार ने यह नया संविधान संशोधन प्रस्तावित किया था।
प्रस्ताव के अनुसार 2011 की जनगणना को आधार बनाकर परिसीमन की प्रक्रिया को जल्द पूरा करने का प्रावधान रखा गया था, ताकि महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण का लाभ 2029 के लोकसभा चुनावों से ही मिल सके। इसके साथ ही लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 816 करने का भी प्रस्ताव शामिल था, ताकि नई जनसंख्या संरचना के अनुसार प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके।
हालांकि इस विधेयक को लेकर विपक्षी दलों, विशेषकर दक्षिण भारत के राज्यों के प्रतिनिधियों ने कड़ा विरोध जताया। विपक्ष का तर्क था कि 2011 की जनगणना के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण करने से उन राज्यों को नुकसान होगा, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन किया है। उनका कहना था कि इससे देश के संघीय ढांचे का संतुलन प्रभावित हो सकता है।
कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों ने इस विधेयक को राजनीतिक दृष्टि से भी संवेदनशील बताते हुए इसे महिलाओं के नाम पर चुनावी नक्शे को प्रभावित करने की कोशिश बताया। विपक्षी नेताओं ने इसे संविधान के मूल ढांचे पर प्रभाव डालने वाला कदम भी करार दिया।
विधेयक के गिरने के तुरंत बाद सरकार ने इससे जुड़े दो अन्य प्रस्तावित विधेयकों—परिसीमन विधेयक, 2026 तथा संघ राज्य विधि संशोधन विधेयक, 2026—को भी आगे नहीं बढ़ाने का निर्णय लिया। माना जा रहा है कि सरकार अब इस विषय पर आगे की रणनीति तय करने से पहले व्यापक राजनीतिक सहमति बनाने की कोशिश कर सकती है।
इस घटनाक्रम का सबसे बड़ा असर महिला आरक्षण की समय-सीमा पर पड़ने की संभावना है। अब नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 अपने मूल स्वरूप में ही लागू रहेगा, जिसके अनुसार महिला आरक्षण नई जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन के बाद ही प्रभावी होगा। अनुमान है कि यह पूरी प्रक्रिया 2034 या उसके बाद तक पूरी हो सकती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम आने वाले वर्षों में परिसीमन और महिला आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दों पर राष्ट्रीय स्तर पर नई बहस को जन्म दे सकता है। जहां सरकार इसे एक महत्वपूर्ण अवसर के चूक जाने के रूप में देख रही है, वहीं विपक्ष इसे संसदीय प्रक्रिया और संवैधानिक व्यवस्था की जीत के रूप में प्रस्तुत कर रहा है।
