कीड़ा जड़ी का उचित मूल्य न मिलने से लाखों रुपये का नुकसान

–हरेंद्र बिष्ट की रिपोर्ट-
थराली, 26 जून। उच्च हिमालयी क्षेत्रों के ग्रामीणों को इस वर्ष कीड़ा जड़ी (यार्सागुम्बा) का उचित मूल्य नहीं मिलने से लाखों रुपये के नुकसान की आशंका है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग घटने के कारण व्यापारी अपेक्षित कीमत देने से कतरा रहे हैं, जिससे महीनों की कठिन मेहनत के बाद कीड़ा जड़ी एकत्र करने वाले किसानों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है।
कीड़ा जड़ी (यार्सागुम्बा) विश्व की सबसे मूल्यवान औषधीय जड़ी-बूटियों में से एक मानी जाती है। यह चीन, नेपाल, तिब्बत और भारत के उत्तराखंड में लगभग 3,500 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले बुग्यालों में पाई जाती है। सर्दियों में कई महीनों तक बर्फ से ढके रहने वाले इन क्षेत्रों में एक विशेष प्रकार के कीट के शरीर पर घोस्ट मॉथ (कॉर्डिसेप्स) नामक कवक विकसित होता है। धीरे-धीरे यह कवक कीट के पूरे शरीर को अपने भीतर समाहित कर देता है और अंततः कीट की मृत्यु हो जाती है। यही अद्भुत जैविक प्रक्रिया कीड़ा जड़ी का निर्माण करती है।
बर्फ पिघलने के बाद मई के प्रथम पखवाड़े से आसपास के गांवों के ग्रामीण ऊंचे बुग्यालों में डेरा डालकर कठिन परिस्थितियों में इसकी खोज और चुगान करते हैं। कई सप्ताह की मेहनत के बाद उन्हें सीमित मात्रा में ही कीड़ा जड़ी प्राप्त हो पाती है।
उत्तराखंड में कीड़ा जड़ी मुख्य रूप से चमोली जिले के देवाल, घाट और ज्योतिर्मठ विकासखंडों के बुग्यालों के अलावा उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, बागेश्वर और पिथौरागढ़ के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पाई जाती है।
घेस के पूर्व उपप्रधान एवं कृषक धन सिंह बिष्ट तथा किसान हुक्म सिंह दानू ने बताया कि पिछले वर्षों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीड़ा जड़ी की कीमत 15 से 50 लाख रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच जाती थी, जबकि स्थानीय स्तर पर व्यापारी और भेषज संघ किसानों से इसे 8 से 10 लाख रुपये प्रति किलोग्राम तक खरीदते थे। लेकिन इस वर्ष मांग में भारी गिरावट के चलते व्यापारी 5 लाख रुपये प्रति किलोग्राम की दर से भी खरीदने को तैयार नहीं हैं।
उन्होंने बताया कि घेस, हिमनी, बलाण, पिनाऊ, वाण और कुलिंग सहित कई गांवों के किसानों के पास कई किलोग्राम कीड़ा जड़ी का स्टॉक मौजूद है। कम कीमत मिलने के कारण किसान इसे बेचने के बजाय बेहतर दाम मिलने का इंतजार कर रहे हैं। यदि स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
कीड़ा जड़ी का उपयोग शारीरिक शक्ति, ऊर्जा, सहनशक्ति और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के अलावा कैंसर, श्वसन संबंधी बीमारियों सहित अनेक रोगों के उपचार में किया जाता है। अपनी औषधीय एवं कामोत्तेजक विशेषताओं के कारण इसे विश्वभर में ‘हिमालयी वियाग्रा’ (Himalayan Viagra) के नाम से भी जाना जाता है। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी मांग और कीमत दोनों लंबे समय से अत्यधिक रही हैं।
